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    ससुराल में ताने और अकेलापन: बंद दरवाजों के पीछे दहेज का मेंटल टॉर्चर छीन रहा बेटियों के जीने की इच्छा

    Updated: Wed, 20 May 2026 05:33 PM (IST)

    दहेज के कारण आज भी देश में कई बेटियां अपनी जान गंवा देती हैं। इस कुप्रथा की चोट सिर्फ शरीर पर ही नहीं, बेटी के मन पर भी निशान छोड़ती है। ...और पढ़ें

    दहेज सिर्फ शरीरिक यातना नहीं, मानसिक प्रताड़ना की भी वजह

    दहेज सिर्फ शरीरिक यातना नहीं, मानसिक प्रताड़ना की भी वजह

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या एक बेटी की जिंदगी की कीमत चंद पैसों या सामान से तय की जा सकती है? ट्विशा शर्मा, दीपिका नागर और पलक रजक की हालिया मृत्यु ने इस सवाल को फिर से हमारे सामने लाकर खड़ा कर दिया है। इन तीनों महिलाओं की मृत्यु के पीछे दहेज के लिए ससुराल में प्रताड़ना की खबरें सामने आ रही हैं। 

    भारतीय समाज में दहेज एक ऐसी कुप्रथा है, जो सालों से अपनी आग में बेटियों को झुलसा रही है। हम अक्सर यह तो देखते हैं कि दहेज एक परिवार को आर्थिक रूप से कैसे तोड़ता है, लेकिन उस बंद दरवाजे के पीछे एक बेटी किस खौफ और मानसिक यातना से गुजरती है, वह अक्सर अनदेखा रह जाता है। यह कुप्रथा केवल शरीर पर घाव नहीं देती, बल्कि एक महिला के आत्मविश्वास, उसके आत्मसम्मान और यहां तक कि उसकी जीने की इच्छा को भी तार-तार कर देती है।

    इसलिए दहेज के कारण एक महिला किस तरह की मानसिक प्रताड़ना से गुजरती है इस मुद्दे पर बात करना बहुत जरूरी हो गया है।आइए सीनियर साइकोलॉजिस्ट डॉ. मोनिका शर्मा से जानते हैं कि दहेज प्रथा महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर कितना गहरा असर डालती है। 

    लगातार तनाव और गंभीर एंग्जायटी 

    शादी के बाद जब किसी महिला को कम दहेज लाने के लिए ताने दिए जाते हैं या लगातार और पैसों की मांग की जाती है, तो वह हर पल डर के साए में जीने लगती है। उसके ससुराल वाले आगे क्या करेंगे या आज कैसे उसे अपमानित किया जाएगा? का यह डर उसे लगातार स्ट्रेस और एंग्जायटी की ओर धकेल देता है। वह अपने ही घर में असुरक्षित महसूस करने लगती है, जिससे उसका नर्वस सिस्टम हमेशा फाइट या फ्लाइट मोड में रहता है।

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    डिप्रेशन और अकेलापन

    जब मानसिक और भावनात्मक शोषण रोज की बात बन जाता है, तो महिला धीरे-धीरे गहरी निराशा में डूब जाती है। मायके से दूर, नए माहौल में जब उसे सहारा मिलने की बजाय केवल प्रताड़ना मिलती है, तो वह सोशल आइसोलेशन यानी सामाजिक अलगाव का शिकार हो जाती है। अपनी बात किसी से न कह पाने और ससुराल में अकेले पड़ जाने के कारण वह डिप्रेशन के जाल में फंस जाती है, जहां उसे अपना भविष्य पूरी तरह अंधेरे में नजर आने लगता है।

    आत्मसम्मान की कमी और खुद को दोष 

    दहेज प्रथा की सबसे क्रूर मार महिला के आत्मसम्मान पर पड़ती है। जब उसके माता-पिता अपनी क्षमता से बाहर जाकर दहेज देते हैं और फिर भी ससुराल वाले संतुष्ट नहीं होते, तो महिला खुद को अपने माता-पिता पर एक बोझ मानने लगती है। वह सोचने लगती है कि उसके जन्म या उसकी शादी की वजह से उसके माता-पिता कर्ज में डूब गए। यह गिल्ट उसकी मानसिक ताकत को अंदर से खोखला कर देता है।

    पोस्ट-ट्रैमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) और सुसाइडल टेंडेंसी

    दहेज के लिए दी जाने वाली शारीरिक और मानसिक यातनाएं किसी बड़े हादसे से कम नहीं होतीं। ऐसी परिस्थितियों से गुजरने वाली कई महिलाओं में PTSD के लक्षण देखे जाते हैं, जैसे अचानक पुरानी बातें याद आना, पैनिक अटैक आना या नींद न आना। जब यह प्रताड़ना बर्दाश्त से बाहर हो जाती है, तो निराशा में डूबकर महिलाएं आत्महत्या जैसा खौफनाक कदम उठाने पर मजबूर हो जाती हैं।

    बचपन से ही मानसिक विकास पर असर

    दहेज का असर सिर्फ शादी के बाद ही शुरू नहीं होता। जिस समाज में दहेज को सामान्य माना जाता है, वहां बेटियों के जन्म से ही माता-पिता उनके लिए दहेज जो़ड़ने की चिंता में डूब जाते हैं। लड़कियां बचपन से ही खुद को लड़कों से कमतर और एक बोझ के रूप में देखती हैं। यह असुरक्षा की भावना उनके वयस्क होने तक उनके मानसिक विकास और आत्मविश्वास को प्रभावित करती है।