कानून में अपराध, समाज में शान: हर साल हजारों बेटियों को लील जाने वाली दहेज कुप्रथा शुरू कैसे हुई?
दहेज की आग में हर साल हजारों महिलाएं अपनी जान गंवा देती हैं, लेकिन हमेशा से यह कुप्रथा हमारे समाज में नहीं थी। ...और पढ़ें

हर दिन 16 बेटियों की मौत का जिम्मेदार 'दहेज' (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या शादी वाकई दो दिलों का मिलन है या सिर्फ एक सौदा, जहां एक बेटी की अहमियत इस बात से तय होती है कि वह अपने साथ कितना दहेज लेकर आई है? ट्विशा शर्मा और दीपिका नागर की दर्दनाक मौतें सिर्फ अखबार की सुर्खियां नहीं, बल्कि ये हमारे मॉडर्न समाज की सच्चाई हैं।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि साल 2024 में 5,737 महिलाएं दहेज कुप्रथा का शिकार हुई थीं। जरा सोचिए हर दिन लगभग 16 महिलाएं दहेज की आग में झुलस गईं। कानून की किताब में भले ही यह एक गंभीर अपराध है, लेकिन हमारे समाज में यह एक बीमारी की तरह फैल चुका है, जो थमने का नाम ही नहीं रहा।
पढ़े-लिखे समाज में भी दहेज से जुड़ी हिंसा की घटनाएं कम होने के बजाय तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन ऐसे में एक सवाल पूछना जरूरी है कि दहेज की कुप्रथा आखिर शुरू कैसे हुई? जो प्रथा हर साल हजारों बेटियों को खा जाती है, क्या वह हमेशा से ऐसी ही थी?
इतिहास के पन्नों को पलटें तो समझ आता है कि यह शुरुआत में कोई कुप्रथा नहीं, बल्कि महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा देने का एक तरीका थी, जिसने धीरे-धीरे इस कुप्रथा का रूप ले लिया। आइए जानते हैं कि समय के साथ इसमें कैसे और क्यों इतने खतरनाक बदलाव आए।
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बेटियों की आर्थिक सुरक्षा का जरिया
प्राचीन भारत या वैदिक काल में आज जैसी लालच से भरी दहेज प्रथा का कोई वजूद नहीं था। उस समय हिंदू धर्मग्रंथों में कन्यादान के साथ दक्षिणा या उपहार देने का जिक्र मिलता है। जब किसी लड़की की शादी होती थी, तो वह अपने पिता की संपत्ति का एक हिस्सा अपने साथ विवाह के बाद ले जाती थी।
सबसे खास बात यह थी कि यह पूरी व्यवस्था महिलाओं के लिए महिलाओं ही चलाती थीं। शादी के समय मिलने वाले धन और कीमती उपहार सीधे दुल्हन को दिए जाते थे, न कि दूल्हे या उसके परिवार को। इससे महिलाओं को समाज में आर्थिक स्वतंत्रता मिलती थी, ताकि वे किसी पर निर्भर न रहें और जरूरत पड़ने पर ये पैसे उनके काम आएं।
समाज में बनी शान का प्रतीक
समय बदला और मध्यकाल तक आते-आते यह प्रथा पूरी तरह बदलने लगी। यह दौर राजा-महाराजाओं और कुलीन परिवारों का था। खासतौर से राजपूत घरानों में अपनी बेटियों की शादी के समय भारी मात्रा में धन, जेवर और सेवकों को साथ भेजने का चलन शुरू हुआ, जिसे प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाने लगा।
इसी काल में जब मुगल शासकों ने राजपूत परिवारों के साथ वैवाहिक संबंध बनाने शुरू किए, तो इस प्रथा का दायरा और बढ़ गया। इन शादियों में मिलने वाले भारी-भरकम दहेज ने शाही खजाने को और समृद्ध किया, जिसके बाद यह चलन मुस्लिम समुदाय में भी फैल गया।
इस दौर में फैले सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उतार-चढ़ाव ने भी आग में घी का काम किया। बेटियों की सुरक्षा और उनकी जिम्मेदारी से जल्दी मुक्त होने के लिए माता-पिता भारी मात्रा में दहेज देने लगे, जिससे इस व्यवस्था ने समाज में अपनी जड़ों को और गहरा बना लिया।
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दहेज बना महिलाओं के गले का फंदा
दहेज प्रथा को सबसे ज्यादा विनाशकारी और हिंसक रूप ब्रिटिश शासनकाल के दौरान मिला। साल 1793 में बंगाल के परमानेंट सेटलमेंट ने भारतीय समाज का ताना-बाना बदल गया। जमीनदारी व्यवस्था के साथ लोगों के पास जमीनों पर मालिकाना हक रखने का अधिकार मिला। साथ ही, अंग्रेजों ने एक ऐसा नियम भी लागू किया जिसने महिलाओं की स्थिति को पूरी तरह कमजोर कर दिया।
इस नियम के तहत महिलाओं के किसी भी तरह की संपत्ति पर मालिकाना हक रखने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। इसका नतीजा यह हुआ कि शादी के समय दुल्हन को अपने माता-पिता से जो भी धन या संपत्ति मिलती थी, कानूनी रूप से उसका मालिक उसका पति बन जाता था।
पति के इस मालिकाना हक ने सदियों पुरानी इस प्रथा को लालच के एक खतरनाक खेल में बदल दिया। दूल्हे के परिवार अब आने वाली दुल्हन को केवल एक महिला के रूप में नहीं, बल्कि संपत्ति के रूप में देखने लगे। यहीं से विवाह जैसे पवित्र रिश्ते की नींव में लालच घुल गया।
इस तरह जो प्रथा कभी बेटी को नए घर में आर्थिक रूप से सुरक्षित और स्वतंत्र रखने के लिए शुरू हुई थी, वह आज एक स्टेटस सिंबल, फैशन और कुप्रथा का रूप ले चुकी है।