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    'बेटी को दिया है तो बेटे में लेंगे...' साइकोलॉजिस्ट ने बताया क्यों आज भी लोग खुशी-खुशी देते हैं दहेज

    Updated: Thu, 21 May 2026 07:41 PM (GMT+05:30)

    समय के साथ भारत में दहेज प्रथा का स्वरूप भी बदला है। अब लोग स्वेच्छा से दहेज देते और लेते हैं। मनोवैज्ञानिक मोनिका शर्मा से जानते हैं इसके पीछे की प्र ...और पढ़ें

    मनोवैज्ञानिक ने बताया क्यों आज भी लोग खुशी-खुशी देते हैं और लेते हैं दहेज (Picture Credit- AI Generated)

    मनोवैज्ञानिक ने बताया क्यों आज भी लोग खुशी-खुशी देते हैं और लेते हैं दहेज (Picture Credit- AI Generated)

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    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। ट्विशा शर्मा हो या दीपिका नागर और इससे पहले न जाने कितनी ही बेटियां दहेज (Dowry System in India) की आग में अपनी जीवन जला चुकी है। सदियों में हमारे देश में महिलाएं दहेज प्रथा चली आ रही है। समय बीतने के साथ ही इसका स्वरूप भी बदल चुका है।

    पहले जहां लोग जबरदस्ती डरा-धमकाकर या लड़के वाले होने की धौंस जताकर शादी में लेन-देन करते थे, वहीं अब इच्छा से दहेज देने का चलन बढ़ चुका है। ऐसे में हमने सीनियर साइकोलॉजिस्ट मोनिका शर्मा से बातचीत कर उन कारणों के बारे में जाना, जिसके चलते लोग आज अपनी इच्छा से दहेज लेते और देते हैं। 

    बेटी के खुशहाल जीवन का डर 

    कई माता-पिता ससुराल में अपनी बेटी के खुशहाल जीवन के लिए इच्छा से दहेज देते हैं। वह एक भव्य दहेज को अपनी बेटी के भविष्य के आराम के लिए एक बीमा पॉलिसी की तरह देखते हैं।

    उन्हें डर रहता है कि अगर वे अपनी बेटी को पर्याप्त दहेज के साथ नहीं भेजेंगे, तो ससुराल वाले उसे नीचा दिखाएंगे, उसका उपहास करेंगे या उसके साथ दुर्व्यवहार करेंगे।

    दहेज को दिया गिफ्ट का नाम

    कानूनी दांवपेंचों (Dowry Law) और किसी भी तरह के अपराधबोध से बचने के लिए, समाज ने दहेज को उपहार, स्त्रीधन या इच्छा से दिए जाने वाले दान जैसे सौम्य शब्दों का नया रूप दे दिया है।

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    माता-पिता खुद को यह विश्वास दिलाते हैं कि अपनी बेटी को अपनी जीवन भर की बचत के एक महत्वपूर्ण हिस्से के साथ विदा करना उनका कर्तव्य है।

    ‘लोग क्या कहेंगे’ की चिंता

    कई समुदायों में, शादियां हैसियत और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन होती हैं। महंगे उपहारों वाली भव्य शादी को सम्मान बढ़ाने वाला और साधारण शादी को अक्सर आर्थिक तौर पर कमजोर या "समझौते" का संकेत मानकर गपशप का मुद्दा बना लिया जाता है।

    इसके अलावा रिश्तेदारों और पड़ोसियों को भारी दहेज देते देखकर एक मानदंड बनता है। ऐसे में माता-पिता समाज में अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए उन स्टैंडर्ड को पूरा करने या उनसे भी आगे निकलने के लिए बाध्य महसूस करते हैं।

    दहेज दिया है तो लेंगे भी

    समाज में दहेज लेने-देने की यह परंपरा अक्सर पीढ़ियों के बीच चले आ रहे लेन-देन से जुड़ी निष्पक्षता की भावना से प्रेरित होता है। हमारे आसपास कई ऐसे लोग हैं, जिनका यह मानना है कि अगर बेटी के लिए भारी दहेज दिया है, तो बेटे की शादी दहेज लेकर भरपाई भी करेंगे।

    यह मानसिकता एक ऐसे चक्र को जन्म देती है, जो लगातार चलता रहता है और कई बार इसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ता है।