असल जिंदगी में आपको पीछे धकेल सकता है सिर्फ 'डिग्री' के पीछे भागना! प्रोफेसर ने बताई सफलता की सही राह
आईआईएम लखनऊ के प्रोफेसर प्रदीप कुमार बताते हैं कि सिर्फ 'डिग्री' के पीछे भागना युवाओं के लिए हानिकारक हो सकता है। ...और पढ़ें

सिर्फ अच्छे नंबरों से नहीं मिलेगी कामयाबी! (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
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सुमन अग्रवाल, नई दिल्ली। आईआईएम देश का एक ऐसा प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थान है, जहां युवाओं को न केवल अच्छी नौकरी या फिर बेहतरीन करियर के लिए तैयार किया जाता है, बल्कि वास्तविक दुनिया की चुनौतियों का सामना करने के लिए मानसिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है। संस्थान कैसे युवाओं को तैयार करता है, इस बारे में बता रहे हैं आईआईएम लखनऊ के आईटी प्रोफेसर प्रदीप कुमार...
देश के प्रबंधन शिक्षा तंत्र में आईआईएम का दबदबा आज भी कायम है, इसमें कोई दोराय नहीं है। कठोर चयन प्रक्रिया, विश्व स्तरीय संकाय, मजबूत पूर्व छात्र नेटवर्क और उद्योग से मजबूत संबंध जैसे इन चार कारणों के चलते हो आईआईएम से डिग्री प्राप्त करने के लिए बड़ी संख्या में युवा उत्सुक रहते हैं। वहां ऐसे युवाओं को न केवल डिग्री दी जाती है, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से भी बनाया जाता है।

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अंकों से आगे देखें युवा
कई युवा केवल डिग्री, नंबर और प्रदर्शन के पीछे भागते रहते हैं और फिर असल जिंदगी कहीं पीछे छूट जाती है। दिमाग में हर समय अच्छे नंबर लाने की होड़ चलती है, लेकिन इस बीच मन कहीं अशांत रहता है। नए माहौल में खुद को एडजस्ट करने की कोशिश अंत तक जारी रहती है। इससे युवाओं के अंदर कई सारी चीजों को लेकर एक जद्दोजहद चलती है। इस जद्दोजहद को समझने में एक मैटर ही उनकी मदद कर सकता है, जो न केवल उनकी बुद्धिमत्ता को समझे, बल्कि उनकी भावनाओं को समझकर सही राह दिखा सके। आईआईएम यह जिम्मेदारी बखूबी निभाता है। ऐसे युवाओं को सलाह दी जाती है कि वे पढ़ाई के साथ-साथ अपनी भावनाओं की भी कद्र करें और खुद को समझें।
पढ़ाई के साथ हॉबी भी जरूरी
आईआईएम जैसे संस्थान में पढ़ाई करना आसान नहीं है। अगर अच्छा करियर बनाना है तो अच्छे अंकों से डिग्री हसिल करना जरूरी है, लेकिन कई बार युवा पढ़ाई के दबाव में आकर खुद को मूल जाते हैं। उन्हें लगता है कि अगर पढ़ाई में उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं हुआ तो बाकी सारी चीजें व्यर्थ हैं। नतीजा अवसाद, अकेलापन, उदासी उन्हें घेर लेती है। इसलिए बहुत जरूरी है कि पढ़ाई और निजी जिंदगी के बीच एक संतुलन बनाकर चला जाए। पढ़ाई के साथ-साथ कोई न कोई हॉबी अपनाएं, खेलकूद को भी समय दें। इससे उनके अंदर की रचनात्मक शक्ति भी जाग्रत रहती है।
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बच्चों पर न थोपें अपनी उम्मीदें
बच्चों पर पढ़ाई के दबाव के साथ-साथ माता- पिता की उम्मीदों का दबाव भी रहता है। अभिभावक चाहते हैं कि उनका बच्चा आईआईएम से पढ़ रहा है तो जरूर सफलता मिलेगी, उसका करियर अच्छा बनेगा। ऐसे में बच्चों के दिमाग में भी हर समय एक प्रतियोगिता की भावना बनी रहती है। इसलिए वे खूब मेहनत करते हैं, लेकिन जब मन-मुताबिक रिजल्ट नहीं ला पाते, तब निराश हो जाते हैं। जब वे दूसरों को अच्छा प्रदर्शन करते हुए देखते हैं तो और नकारात्मकता से भर जाते हैं। ऐसे में माता- 1 ता-पिता की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने बच्चों पर अपनी उम्मीदें न थोपें।
संस्थान की अहम भूमिका
कई बार पढ़ाई के दौरान बच्चों के मन में कई तरह की भावनाएं उमड़ती हैं, लेकिन वे किसी से बांट नहीं पाते। अंदर-अंदर हो घुटते रहते हैं। यह डर भी रहता है कि कहीं उनके मन की बातें दूसरों तक फैल न जाए। ऐसे समय में संस्थान की भूमिका अहम हो जाती है। वे बच्चों को तनावमुक्त करके उन्हें छात्र के हिसाब से नहीं, एक दोस्त की तरह देखें।
बढ़ता जा रहा है कौशल का महत्व
ऐसा नहीं है कि संस्थान आज भी पुराने ढांचे और कोर्सेज के आधार पर ही चल रहे हैं। इंडस्ट्री की मांग के हिसाब से संस्थान में करियर के स्वरूप बदलते रहते हैं। परामर्श, वित्त और विपणन जैसे पारंपरिक कारपोरेट भूमिकाओं को अब तकनीकी इस्तेमाल से नया रूप मिल रहा है। डाटा एनालिटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल ट्रांसफार्मेशन में कौशल तेजी से महत्त्वपूर्ण होते जा रहे हैं।