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    बारिश के देवता इंद्र को प्रसन्न करने के लिए गाया जाता है हुड़किया बौल, देवभूमि उत्तराखंड से जुड़ा है नाता

    Updated: Fri, 26 Jun 2026 09:00 AM (IST)

    उत्तराखंड में खेती के सीजन में एक खास लोकगीत गाया जाता है, जिसे हुड़किया बौल कहा जाता है। ...और पढ़ें

    इस गीत के बिना उत्तराखंड में पूरी नहीं होती धान की रोपाई! (AI Generated Image)

    इस गीत के बिना उत्तराखंड में पूरी नहीं होती धान की रोपाई! (AI Generated Image)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। उत्तराखंड की खूबसूरती वहां की वादियों के साथ-साथ लोक-संस्कृति में भी झलकती है। आज हम उत्तराखंड की लोक-संस्कृति से जुड़े हुड़किया बौल के बारे में बात करने वाले हैं। खेती के मौसम में उत्तराखंड के खेतों में मधुर लोकगीतों का स्वर गूंज उठता है। 

    ये गीत हुड़किया बौल कहलाते हैं, लेकिन ये बाकी लोकगीतों से अलग होते हैं और इनका महत्व भी अलग होता है। आइए जानें हुड़किया बौल क्या होता है और इसकी खासियत क्या है? 

    क्या है हुड़किया बौल?

    उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल मंडल के किसान खेतों में काम करते समय एक पारंपरिक गीत गाते हैं। इसे ही हुड़किया बौल कहा जाता है। धान की रोपाई और निराई का काम करते समय इन गीतों को गाया जाता है। 

    इस लोकगीत की खासियत यह है कि गाने के साथ-साथ इस दौरान नृत्य भी होता है। खेतों में काम करते समय किसानों के जोश को बनाए रखने के लिए हुड़किया बौल गाया जाता है और लोग इस पर मिलकर नृत्य भी करते हैं। 

    गीतों से सुनाते हैं कहानी

    हुड़किया बौल गाने का एक खास तरीका होता है। इसमें मुख्य गायक होता है, जिसके हाथ में हुड़का नाम का एक वाद्य यंत्र होता है। इसे बजाते हुए वह लोकगीत के जरिए कोई पौराणिक कहानी सुनाता है। इस मुख्य गायक का साथ खेतों में काम करने वाली महिलाएं देती हैं। खेतों में धान की रोपाई कर रही महिलाएं मुख्य गायक की उन पंक्तियों को गाकर दोहराती हैं। 

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    क्यों खास है हुड़किया बौल?

    दरअसल, इन गीतों में धरती, इंद्र देव और मेघ के देवताओं की गाकर वंदना की जाती है। इससे जुड़ी मान्यता है कि अच्छी बारिश के लिए इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए हुड़किया बौल गाया जाता है। इंद्र देव की वंदना के अलावा, इन गीतों में वीर रस और हास्य रस से भरी गाथाएं भी गाई जाती हैं, जैसे- राजुला मालूशाही की मशहूर कहानी। 

    कैसा दिखता है हुड़का

    हुड़िका बौल बिना हुड़का के नहीं गाया जाता। इस वाद्य यंत्र का आकार भगवान शंकर के डमरू जैसा होता है और इसे बजाने वाले कलाकारों को हुड़किया कहा जाता है। इस वाद्य यंत्र को लकड़ी से बनाया जाता है और इसके एक तरफ पशु की खाल मढ़ी जाती है। इसे उंगलियों की थाप से या एक पतली छड़ी से बजाते हैं। इसकी धुन इतनी मधुर होती है कि यह बहुत दूर तक सुनाई देती है।

    हुड़का का धार्मिक महत्व

    हुड़का का धार्मिक महत्व भी है। इससे जुड़ी मान्यता है कि इसका ताल देवताओं और पूर्वजों का आह्वान करने में मदद करती है।