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    'अमुवा की डार पे बैरन कोयलिया...' : सिर्फ एक फल नहीं, बचपन की मीठी यादों और संस्कृति का 'इमोशन' है आम

    Updated: Sun, 28 Jun 2026 08:42 AM (IST)

    भारत में आम सिर्फ एक फल नहीं। यह धूप, मिट्टी की सुगंध, बचपन की दोपहरी और संस्कृति का रस है। मालिनी अवस्थी का आलेख। ...और पढ़ें

    क्यों इतना 'खास' है फलों का राजा आम? (AI Generated Image)

    क्यों इतना 'खास' है फलों का राजा आम? (AI Generated Image)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। यदि मैं कहूं कि भारत में लोग जेठ की गर्मी और लू की तपिश एक फल के सहारे जी जाते हैं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। याद करिए बचपन! गर्मी की छुट्टियां यानी आम। हर किस्म का आम। 

    कच्ची अमिया चुराकर आपस में बाटकर नमक मिर्च से खाना ! वो आम का अचार जो नानी धूप में सुखाती थीं। वो आम का पना जो लू से बचने के लिए आदतन पिलाया जाता था, वो आमरस-पूरी की दावत जो पूरे कुनबे को जोड़ती थी।

    वह बगीचे के आम का पककर चूना! वह छत पर खटिया लगाकर बाल्टी में ठंडे पानी में भरे आम और घर भर की चारों ओर जुटी भीड़! अंगुलियों से रस टपकना, कुहनी तक बहना- और मां का डांटना: 'जरा तमीज़ से खाओ'। आज छुरी से कटे हुए फल खाने वाले नहीं समझ सकते, कि आम के असली चाहक आम और स्वाद के बीच किसी प्रकार का अवरोध नहीं चाहते। 

    आम को धोया दबाया और सीधे आम के रस के आनंद में मग्न! समय बदल गया है लेकिन आम की दीवानगी बरकरार है। आम का पेड़ एक तरह से 'कल्पवृक्ष' है। इसका कुछ भी व्यर्थ नहीं।  पत्ते तोरण कलश, हवन हर शुभ काम में। यज्ञ हो या अनुष्ठान, आम की लकड़ी समिधा के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। 

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    विवाह का खंभ आम की लकड़ी का ही बनता है। सभी मांगलिक कार्यों में आम का पीढ़ा प्रयुक्त होता है। कलश पर आम्र पल्लव रखे जाते हैं और बसंत फागुन में आम्र मंजरी को सबसे शुभ मानकर इसका पूजा में प्रयोग किया जाता है।

    यही कारण है कितने ही लोकगीत मिलते हैं जिनमें आम का बाग लगाने की बात कही गई है जिससे लोगों को फल खाने को मिलें और कर्म के पुण्य सिद्ध हों।

    अमवा लगाए कौन फल मोरे साहब मिलही हो।

    राही बाटे जउन अमवा खहिहैं तब फल मिलिये सुनहु हो।

    आम पर बौर का आना और फल का लगना जीवन चक्र में नित्य नयापन और पूर्णता का सुंदर प्रतीक है। आम के साथ कोयल का संयोग भी रस साहचर्य का संकेत देता है। आम की डाल पर कोयल का बैठना और कुहुकना इस संयोग ने अशेष कवि, साहित्यकारों, गीतकारों, चित्रकारों को प्रेरणा दी है:

    अमुवा की डार पे कुहुक गई रे,

    सखि बैरन कोयलिया कुहुक गई रे

    वैदिक काल से आम को फलों का राजा माना गया है

    रूपेण सुभगो रम्यो वसन्तदूतप्रियः सदा।आम्रवृक्षो रसालानां राजा भवति सर्वदा।।

    अर्थ: आम का पेड़ वसंत ऋतु का प्रिय और सदा रमणीय होता है। यह सभी रसीले फलों का राजा माना जाता है। आम को रसाल, माकंद, सहकार, कामांग, मधुदूत या वसंतदूत, कामवल्लभ और पिकावल्लभ भी कहा गया है। आज भारत में आम की लगभग 1500 से ज्यादा किस्में पाई जाती हैं।

    हर जमीन ने आम को अपना रंग-रूप दे दिया है। उत्तर भारत में दशहरी आम सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। लखनऊ मलिहाबाद का दशहरी आम यानी पतला छिलका, गुठली छोटी, मिठास में इसका कोई सानी नहीं! लखनऊ का आम्रपाली और मेरा प्रिय सफेदा आम अहा, स्वाद मानो अमृत!

    बनारस का लंगड़ा आम देखिए- बिना रेशे का, जैसे मुंह में घुल जाए!

    हरदोई का, बिहार का चौसा आम देर से पकता है, जुलाई की शान है। रत्नागिरी, महाराष्ट्र का अल्फांसो कहें या हापुस- यह आम विदेश में भारत की पहचान है। गुजरात का केसर आम! स्वाद में अद्भुत है, यह पूजा में चढ़ता है। बड़े आकार के गूदादार में आम आंध्र प्रदेश का बंगनपल्ली सबसे पहले आता है, तोतापरी (दक्षिण भारत) तोते की चोंच जैसा, अचार के लिए उत्तम! 

    दक्षिण का ही नीलम और स्वर्णरेखा। इसी तरह बिहार का मालदा व चटक पीले रंग का जर्दालू, बंगाल का बड़े आकार का फाजली आम, लखनऊ का गुलाबखस, गुलाब जामुन, गोरखपुर का प्रसिद्ध गौड़जीत! सबका स्वाद अलग और स्वादिष्ट!

    सबसे शानदार स्वाद होता है देसी टपका आम का! पेड़ पर ही पककर टपकने के कारण इसे टपका आम कहा जाता है, कई जगह इसे चुसना आम कहते हैं। अचार के लिए भी यही देसी आम सबसे अच्छा माना जाता है। आज देसी आम के पेड़ कम दिखते हैं। यह देसी टपका आम भारत का मूल फल था, आज आम की नई नई प्रजातियां पैदा की जा रही हैं, लेकिन मूल देसी आम का यह ह्रास देखना दुखद है।

    आम हमारी संस्कृति में इस तरह व्याप्त है कि रस स्वाद से कहीं भीतर हमारे चित्त में बैठ गया है। मंदिरों के शिल्प हों या आभूषण, हर प्रकार के परिधानों में 'आम' के आकार का मोटिफ सदाबहार है। सदियों पुराना, बेहद पसंदीदा कैरी यानी अमिया का यह क्लासिक पैटर्न विभिन्न साड़ियों में अलग-अलग तरीकों से बुना या सजाया जाता है, साड़ी जरी और/या कढ़ाई की, बनारसी हो या कांजीवरम, साड़ियों के पल्लू और बार्डर पर 'अमिया' (कैरी) का बहुत आकर्षक काम दिखता है। इसी तरह आभूषणों में गले के हार, कान के बुंदों में भी अमिया का यह पारंपरिक बूटा दिखता है। 

    बुजुर्गों ने आम पर अनगिनत कहावते रची हैं जो आज भी आम जुबान पर हैं। 'आम के आम गुठलियों के दाम' 'बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय' या फिर 'पेड़ लगे आम का और खाय कोई और' यानी अगली बार आम का स्वाद लेते हुए गौर से देखिएगा, यह आम नहीं बहुत बहुत खास है।

    (लेखिका पद्मश्री से अलंकृत लोकगायिका हैं)