बिन बुलाए घर पहुंचना और घंटों गप्पे मारना, आज सबसे ज्यादा याद आती है बचपन की वो बिना फिल्टर वाली दोस्ती
बचपन की दोस्ती की बेफिक्री, बिना अपॉइंटमेंट मिलने की आजादी और छोटी-छोटी खुशियों से बनी होती थीं। आज वयस्क होने के बाद बचपन के ये ही पल सबसे ज्यादा याद ...और पढ़ें

बचपन की दोस्ती के खूबसूरत पल (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बचपन के पल भी कितने सुकून भरे हुआ करते थे। न नौकरी की चिंता, न प्रोजेक्ट की डेडलाइन और किसी जिम्मेदारी का बोझ होता था।
हालांकि, जैसे-जैसे हम बड़े हुए बचपन के सभी हसीन पल पीछे छूटते चले गए। अब न हम दोस्तों के साथ शाम को खेलते हैं, न दिनभर गप्पे मारते हैं और न एक-दो रुपए की टॉफी से खुश हो जाते हैं। ऐसे में फ्रेंडशिप डे के मौके पर क्यों न दोस्तों के साथ बिताए गए उन्हीं पुराने पलों को फिर से याद किया जाए?
बेफिक्री और बिना वजह मिलने की आजादी
बचपन की सबसे खूबसूरत बात यही थी कि उस समय न कोई अपॉइंटमेंट होते थे और न कोई डेडलाइन। न ही दोस्तों से कॉल करके पूछना पड़ता था कि क्या तुम फ्री हो। बस दोस्त के बाहर खडे़ होकर एक बार जोर से आवाज लगानी होती थी और वह दौड़ते हुए बाहर आ जाता था।
आज हमारे पास पैसे तो हैं, लेकिन न हमारे पास वक्त है और न दोस्त के पास। एक-दूसरे से मिलने के महीनों पहले प्लान बनाते हैं, कैलेंडर मैच करते हैं और तब भी चांसेस होते हैं कि किसी लास्ट मिनट काम की वजह से प्लान पोस्टपोन हो गया।
छोटी-छोटी चीजों में मिलने वाली खुशी
बचपन में महंगे बैग्स या जूते खरीदने से खुशी नहीं होती थी। उस समय एक-दो रुपए की टॉफी मिल जाए और साथ में हमारा प्यारा दोस्त हो, बस उस में ही दिल खुशी से भर उठता था। बारिश में कागज की नाव बनाना, पतंग उड़ाना, क्रिकेट खेलना और दोस्तों के साथ मिलकर नए गेम्स बनाने का मजा ही कुछ और होता था। मम्मी की डांट का डर भी हमें दोस्तों के साथ देर तक खेलने से नहीं रोक पाता था। आज महंगी चीजों में भी वो सुकून नहीं मिल पाता।
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सीक्रेट्स और बिना फिल्टर की बातें
बचपन में आपके दोस्त को आपके बारे में सबकुछ पता होता था। चाहे स्कूल के किसी क्रश का नाम हो, टीचर की नकल उतारना हो या छिपकर की गई कोई शरारत हो, दोस्तों के इन सबके बारे में पता होता था। बचपन में दोस्त से जो मन में आए बोल सकते थे और अगर झगड़ा हो भी जाए, तो अगले दिन खुद ही दोस्ती हो जाती थी। हालांकि, अब ऐसा नहीं रहा है। अब कुछ भी बोलने से पहले सोचना पड़ता है कि कहीं कोई जज न करे, लेकिन बचपन में बातों में कोई बनावट और जजमेंट नहीं होती थी।
लड़े झगड़े और तुरंत पैच-अप
आज हमारा किसी से झगड़ा हो जाए, तो ईगो के कारण हम कई दिनों तक उससे बात नहीं करते या बात बिल्कुल ही बंद कर देते थे। बचपन में ऐसा नहीं था। बचपन की दोस्ती में कट्टी एक आम बात थी। तुमसे बात नहीं करूंगा जैसी धमकियां दिन में चार बार दी जाती थी, लेकिन कुछ मिनट बाद ही सब भूलकर फिर से एक साथ खेलना शुरू कर देते थे। बचपन की दोस्ती में ईगो की कोई जगह नहीं होती थी।