90s Nostalgia: स्कूल के दिनों की वो शरारतें, जिन्हें याद कर आज भी हंसने लगेंगे आप
आज के बच्चों के पास भले ही दुनिया भर के वीडियो गेम्स और स्मार्टफोन्स हों, लेकिन 80 और 90 के दशक के बच्चों का बचपन एकदम अलग था। ...और पढ़ें

90s Nostalgia: अगर आपने स्कूल में ये शरारतें नहीं कीं, तो अधूरा था आपका बचपन (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अगर 90 के दशक के स्कूल के दिनों पर कोई किताब लिखी जाए, तो यकीनन उसके सबसे ज्यादा पन्ने हमारी क्लासरूम की शरारतों से ही भरे होंगे। हम भले ही पढ़ाई में कितने भी कच्चे क्यों न हों, लेकिन नई-नई खुराफातें ईजाद करने में हम सब 'गोल्ड मेडलिस्ट' हुआ करते थे।
आइए, यादों के पिटारे से कुछ और ऐसी ही गुदगुदाने वाली स्कूल की शरारतें निकालते हैं, जिन्हें पढ़ते ही आपके मुंह से निकलेगा- "अरे हां, ये तो मैंने भी किया है!"
दोस्त की पीठ पर 'मैं पागल हूं' का पर्चा चिपकाना

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यह 90s के दौर का सबसे क्लासिक और हिट प्रैंक था। कॉपी का एक छोटा-सा पन्ना फाड़कर उस पर "मुझे मारो" या "मैं गधा हूं" लिखकर उसके पीछे सेलो-टेप लगाना। फिर पूरी चालाकी से दोस्त के पास जाकर उसे शाबाशी देने के बहाने उसकी पीठ पर वो पर्चा चिपका देना। जब वो दोस्त पूरे स्कूल में वो पर्चा चिपकाए घूमता था, तो पीछे से दोस्तों की जो हंसी छूटती थी, उसे कंट्रोल करना सबसे मुश्किल काम होता था।
किताबों की तस्वीरों का 'मेकओवर' करना

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आज के बच्चे भले ही स्नैपचैट और इंस्टाग्राम के फिल्टर यूज करते हों, लेकिन असली फिल्टर तो हमारी किताबों में होते थे। चाहे हिंदी की किताब के लेखक हों या विज्ञान की किताब के वैज्ञानिक, जैसे ही हमारे हाथ में पेन आता था, हम उनकी तस्वीरों पर मूंछें, दाढ़ी और चश्मे बना देते थे। कई बार तो उन महापुरुषों के सिर पर सींग या अजीबोगरीब टोपी पहनाकर हम खुद ही अपनी कलाकारी पर हंस-हंस कर लोटपोट हो जाते थे।
दोस्तों की 'प्रॉक्सी' अटेंडेंस लगाना

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"रोल नंबर 24?"..."प्रेजेंट सर!" जब भी कोई पक्का दोस्त स्कूल नहीं आता था, तो उसकी अटेंडेंस लगवाना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती थी। अपनी आवाज बदलकर या मुंह नीचे करके 'प्रेजेंट सर' या 'प्रेजेंट मैम' बोलने में जो मजा मिलता था, वो आज की फिंगरप्रिंट अटेंडेंस वाले बच्चे कभी नहीं समझ सकते हैं।
खबरें और भी
टेस्ट पेपर पर 'पेरेंट्स के जाली साइन' की प्रैक्टिस

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यूनिट टेस्ट में रेड पेन से कम नंबर मिलने पर घर पर डांट पड़ना तो तय था। ऐसे में, डायरी या टेस्ट पेपर पर खुद ही अपने पापा या मम्मी के साइन करने की जो भयंकर प्रैक्टिस की जाती थी, वो किसी सीक्रेट मिशन से कम नहीं थी। खिड़की के कांच पर पेपर रखकर साइन ट्रेस करना या किसी होशियार दोस्त से साइन करवाना- उस दौर में हर बच्चा अपने आप में एक 'हैंडराइटिंग एक्सपर्ट' हुआ करता था।
ब्रेक में दोस्त का बैग या जूते गायब करना

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पीटी पीरियड या लंच ब्रेक के बाद जब दोस्त अपनी सीट पर वापस आता, तो उसका बैग या जूते गायब मिलते थे। उसे परेशान होते हुए खोजना और फिर पूरी मासूमियत से कहना, "मुझे क्या पता, मैंने थोड़ी छुआ है!" यह दोस्तों के बीच का सबसे आम प्रैंक था। बैग अक्सर किसी दूसरी डेस्क के नीचे या क्लास की अलमारी के पीछे से बरामद होता था।
पानी पीने के बहाने पूरे स्कूल का 'निरीक्षण' करना

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"मे आई गो टू ड्रिंक वॉटर मैम?"- यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि बोरिंग क्लास से बाहर निकलने का पासपोर्ट हुआ करता था। और मजे की बात तो यह थी कि पानी पीने कभी कोई अकेला नहीं जाता था, हमेशा एक दोस्त की जरूरत पड़ती थी। नल तक जाने का वो 2 मिनट का रास्ता हम 15 मिनट में तय करते थे, क्योंकि रास्ते में दूसरी क्लास की खिड़कियों से झांकना और पूरे स्कूल का राउंड लगाना भी तो जरूरी था।
आज के इंटरनेट वाले दौर में ये सब बातें शायद बहुत छोटी लगें, लेकिन उस समय यही हमारी जिंदगी के सबसे बड़े एडवेंचर थे। स्कूल की वो इमारतें शायद आज भी वहीं खड़ी हैं, लेकिन वो मासूम शरारतें और वो बेफिक्री अब बस हमारी यादों के खूबसूरत एलबम में कैद होकर रह गई है।