पुराने समय में बिना फ्रिज कैसे जमती थी बर्फ? रेगिस्तान में राजा-महाराजाओं को 'कूल' रखती थी 'यखचाल' तकनीक
प्राचीन फारस में बिना बिजली के बर्फ बनाने और स्टोर करने के लिए 'यखचाल' नामक विशालकाय रेफ्रिजरेटर बनाए जाते थे। ...और पढ़ें

जब फ्रिज नहीं था, तो कैसे जमाई जाती थी बर्फ? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज की चिलचिलाती गर्मियों में अगर हमें ठंडा पानी या बर्फ चाहिए हो, तो हम बस फ्रिज का दरवाजा खोलते हैं और राहत पा लेते हैं लेकिन जरा सोचिए, जब बिजली का नामोनिशान तक नहीं था, तब लोग तपती गर्मी में बर्फ कैसे जमाते होंगे? वह भी प्राचीन फारस जैसे भयंकर गर्म रेगिस्तानी इलाकों में?
पढ़ने में यह किसी कोरी कल्पना जैसा लग सकता है, लेकिन यह सोलह आने सच बात है। हजारों साल पहले, ईरानियों ने महज हवा और पानी की जुगलबंदी से ऐसे विशालकाय 'नेचुरल रेफ्रिजरेटर' तैयार कर लिए थे, जिनकी बेजोड़ इंजीनियरिंग आज के आधुनिक वैज्ञानिकों को भी दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर देती है। मिट्टी से बने इन अद्भुत ढांचों को फारसी भाषा में 'बर्फ का गड्ढा' कहा जाता था, जिनका असली नाम था- यखचाल (Yakhchāl)।

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हजारों साल पुराना इतिहास
यखचाल केवल बर्फ को सुरक्षित रखने के गोदाम नहीं थे, बल्कि यह अपने आप में बर्फ बनाने की पूरी फैक्ट्री थे। इतिहास के पन्नों को पलटें, तो इनका सबसे पहला इस्तेमाल 400 ईसा पूर्व के आसपास मिलता है। हखामनी, सफविद और काजार राजवंशों के दौर में इनका खूब इस्तेमाल हुआ। ईरान के सूखे और गर्म इलाकों में आज भी 20 मीटर तक ऊंचे ये गुंबद देखे जा सकते हैं, जो इंसानी बुद्धिमत्ता की गवाही देते हैं।
मिट्टी के छत्ते जैसी इंजीनियरिंग
पहली नजर में कोई भी यखचाल मिट्टी से बने किसी विशालकाय मधुमक्खी के छत्ते जैसा नजर आता है, लेकिन इसका यह डिजाइन कोई दिखावा नहीं, बल्कि विशुद्ध विज्ञान था:
- विशाल शंक्वाकार गुंबद: जमीन के ऊपर का गुंबद 10 से 18 मीटर तक ऊंचा होता था। इसे बनाने में 'सरूज' नाम के एक बेहद खास गारे का इस्तेमाल होता था। इस गारे में रेत, मिट्टी, राख, चूने के साथ-साथ बकरी के बाल और अंडे की सफेदी मिलाई जाती थी। यह मिश्रण पानी को अंदर आने से रोकता था और गजब का इंसुलेशन देता था।
- हवा का शानदार प्रवाह: इस गुंबद की दीवारें नीचे की तरफ 2 मीटर तक चौड़ी होती थीं और ऊपर की तरफ पतली होती जाती थीं। विज्ञान का सीधा-सा नियम है कि गर्म हवा हल्की होकर ऊपर उठती है। इस डिजाइन की वजह से सारी गर्म हवा गुंबद के ऊपरी हिस्से से बाहर निकल जाती थी और ठंडी हवा नीचे बैठ जाती थी।
- भूमिगत स्टोरेज: गुंबद के ठीक नीचे जमीन में एक बहुत गहरा गड्ढा खोदा जाता था, जिसकी क्षमता 5,000 घन मीटर तक होती थी। जमीन के अंदर की प्राकृतिक ठंडक बर्फ को पिघलने से रोकती थी।

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रात के अंधेरे में होता था असली कमाल
गुंबद के बिल्कुल करीब ही पत्थर से बने उथले पानी के कुंड होते थे, जिन्हें 'मोहब्बत' कहा जाता था। बर्फ बनाने का असली खेल इन्हीं कुंडों में होता था।
सर्दियों की रातों में इन कुंडों में पानी भर दिया जाता था। रेगिस्तान की हवा में नमी कम होती है और आसमान बिल्कुल साफ रहता है। ऐसे में 'रेडिएटिव कूलिंग' की वैज्ञानिक प्रक्रिया के कारण पानी अपनी सारी गर्मी खुले आसमान में छोड़ देता था। हैरानी की बात यह है कि अगर बाहर का तापमान शून्य से ऊपर भी हो, तब भी इस तकनीक से पानी रातों-रात बर्फ की मोटी सिल्लियों में तब्दील हो जाता था। बाद में इन सिल्लियों को तोड़कर जमीन के नीचे वाले गड्ढे में स्टोर कर दिया जाता था।
बिना ईंधन का एयर कंडीशनर
इन यखचालों की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इनमें कोई ईंधन नहीं लगता था। बर्फ बनाने के लिए साफ और ठंडा पानी 'कनात' से आता था, जो कि जमीन के नीचे बनी पानी की लंबी नहरें हुआ करती थीं।
तापमान को और भी ज्यादा ठंडा रखने के लिए कुछ यखचालों में 'बदगीर' यानी हवा पकड़ने वाले ऊंचे टावर लगाए जाते थे। ये टावर रेगिस्तान की हवा को खींचकर नीचे तहखाने की तरफ धकेलते थे। ठंडी हवा बर्फ के चारों तरफ घूमती थी और गर्म हवा ऊपर से बाहर निकल जाती थी। इस तकनीक से यखचाल के अंदर का तापमान बाहर की गर्मी के मुकाबले 15 से 20°C तक कम रहता था।

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शर्बत, फालूदा और शाही शान-ओ-शौकत
प्राचीन फारस में बर्फ का होना किसी विलासिता से कम नहीं था। इसी बर्फ का इस्तेमाल गर्मियों में ठंडे 'शर्बत' और 'फालूदा' बनाने के लिए किया जाता था। बाजारों में बर्फ बिकती थी और अमीरों के घरों में खास तौर पर पहुंचाई जाती थी।
यज़्द और करमान जैसे बड़े शहरों में विशाल यखचालों का होना शाही रुतबे और अमीरी की निशानी था। आज भी आधुनिक फारसी भाषा में फ्रिज को 'यखचाल' ही कहा जाता है।
कुछ प्रमुख यखचाल जो आज भी मौजूद हैं:
- यखचाल-ए-मोयदी: 20 मीटर ऊंचा यह ढांचा आज भी बेहतरीन हालत में है।
- मेबद यखचाल: इसे कारवां सरायों के साथ बनाया गया था, ताकि थके हुए यात्रियों को आराम मिल सके।
- अबरकुह आइस हाउस: यह एक 4,000 साल पुराने ऐतिहासिक सरू के पेड़ के पास बना हुआ है।
आज के वैज्ञानिकों की मुहर
पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना चीजों को ठंडा रखने का यह तरीका आज की दुनिया के लिए एक मिसाल है। साल 2017 में ब्रिटेन की इंजीनियरिंग फर्म 'मैक्स फोर्डहम एलएलपी' ने कंप्यूटर सिमुलेशन के जरिए इन यखचालों की क्षमता को परखा। उनके शोध ने यह साबित कर दिया कि वाष्पीकरण और रेडिएशन आधारित यह प्राचीन तकनीक पूरे साल बर्फ को सुरक्षित रखने में पूरी तरह सक्षम थी।
आज जब पूरी दुनिया बिजली के बढ़ते बिलों और जलवायु परिवर्तन से घबराई हुई है, तब यखचाल हमें बताते हैं कि टिकाऊ विकास का रास्ता आधुनिक मशीनों में नहीं, बल्कि हमारी पुरानी और समझदार तकनीकों में छिपा हो सकता है।