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    लोग इसलिए नहीं करते घायलों की मदद: 'बायस्टैंडर इफेक्ट' के चलते दूसरों के आगे आने का इंतजार करती है भीड़

    By Niharika PandeyEdited By: Harshita Saxena
    Updated: Thu, 25 Jun 2026 07:39 PM (IST)

    मदद का हाथ ना बढ़ा पाना संवेदना की कमी नहीं, इसके पीछे कई साइकोलॉजिकल और सोशल कारण हो सकते हैं। ...और पढ़ें

    सड़क हादसों में मदद से क्यों कतराते हैं लोग (Picture Credit- AI Generated)

    सड़क हादसों में मदद से क्यों कतराते हैं लोग (Picture Credit- AI Generated)

    HighLights

    1. भीड़ में हर कोई दूसरों के मदद करने का इंतजार करता है

    2. कानूनी पचड़ों और अस्पताल के चक्करों से बचने की सोच

    3. मदद करने वालों को प्रशिक्षण और प्रोत्साहन देना जरूरी

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हम आए दिन टीवी, अखबार या सोशल मीडिया पर एक्सीडेंट की खबरें देखते हैं। ऐसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं लेकिन मदद के हाथ कम हो रहे हैं। शायद आप भी कभी ऐसी घटना के चश्मदीद रहे हों और आपके अंदर मदद करने का भाव आया भी हो, लेकिन किसी वजह से आपने अपने हाथ पीछे खींच लिए हों। आखिर इस सोच की वजह क्या है बता रहे हैं, साइकोलॉजिस्ट राजेश पाण्डेय

    पता नहीं होता

    लोगों को रोड सेफ्टी के बारे में कम जानकारी होती है। खुद की वजह से एक्सीडेंट हो गया है या किसी ने एक्सीडेंट कर दिया है तो उस स्थिति में क्या कदम उठाने चाहिए लोगों को पता नहीं होता। इमरजेंसी के बारे में पता ना होने पर लोग मदद का हाथ चाहते हुए भी नहीं बढ़ा पाते।

    कारण क्या हैं

    • कोई और कर देगा: घटना वाली जगह मौजूद भीड़ में सब यही सोचते हैं कि इतने सारे लोग हैं कोई ना कोई तो मदद कर देगा। सब एक-दूसरे की तरफ इसी उम्मीद से देखते हैं।
    • मैं ही क्यों: कुछ लोग ये भी सोचते हैं कि इतने सारे लोग खड़े हैं फिर मैं ही मदद क्यों करूं।
    • ग्रुप एक्टिविटी न होना: लोग इतने व्यस्त हो गए हैं कि उनके पास औरों की मदद करने या सोसाइटी के लिए मिलकर कुछ करने का वक्त नहीं होता।
    • वीडियो बनाते हैं: वीडियो बनाने या तस्वीरें लेने के नए चलन की वजह से भी कई बार लोग मदद का हाथ नहीं बढ़ाते या देरी से एक्शन लेते हैं। हम लोगों का दर्द महसूस करने की बजाय उस वीडियो या फोटो को कैसे इस्तेमाल करना है उस पर ज्यादा फोकस करते हैं।
    • थाने और अस्पताल के चक्कर: हमारा सिस्टम कई बार हमारे कदम रोक लेता है। हमें लगता है कि कौन अपना काम छोड़कर अस्पताल के चक्कर लगाए या फिर एक्सीडेंट के बारे में थाने जाकर सवालों के जवाब देता रहे। लोग पचड़े में फंसाने वाली चीजों से दूर रहने के लिए भी ऐसा करते हैं।

    इस तरह आसान हो सकती है ये मुश्किल

    • जिन भी लोगों के पास लाइसेंस है उनके लिए कुछ घंटे या एक दिन का ट्रेनिंग सेशन होना चाहिए। लोगों को बताया जाए कि एक्सीडेंट होने की स्थिति में कैसे मदद कर सकते हैं। किसी को पानी देना है या फिर कार्डिएक सपोर्ट करना है। मदद करने वाले लोगों को सर्टिफिकेट या फिर ईनाम देने जैसा सिस्टम भी बनाया जा सकता है।
    • इसके साथ ही लीगल स्तर पर भी अधिकारी लोगों को जागरूक कर सकते हैं। इससे लोगों में सही तरीके से मदद करने का आत्मविश्वास आएगा।
    • हर हॉस्पिटल में एक्सीडेंट के पीड़ितों के लिए एक सेक्शन हो और उसका सिस्टम आसान होना चाहिए। इससे मदद करने वाले इसे पचड़ा ना मानकर अपनी जिम्मेदारी निभाने से पीछे नहीं हटेंगे।

    मदद करना एक सीखा जाने वाला बिहेवियर है

    अपनी सेफ्टी के बारे में सबसे पहले सोचना एक नेचुरल साइकोलॉजी है, लेकिन दूसरों की मदद करना एक सीखा जाने वाला बिहेवियर है। हम दूसरों को देखकर इसे सीखते हैं। शहरों में ज्यादातर न्यूक्लियर परिवार ही होते हैं और उनकी जिंदगी एक सीमित दायरे में रहती है। इसकी वजह से दूसरों की केयर करना या इमरजेंसी की स्थिति में क्या करना है इसकी जानकारी भी सीमित होती है। इसका असर हमारे ब्रेन डेवलपमेंट और पर्सनैलिटी पर पड़ता है।

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