भगवान शंकर को खुश करने के लिए लंकापति ने बनाया था ‘रावण हत्था’, आज भी राजस्थानी लोकसंगीत की है जान
रावण हत्था, राजस्थान और गुजरात का एक प्राचीन वाद्य यंत्र है, जिसका संबंध लंकापति रावण से माना जाता है। ...और पढ़ें

रावण के नाम पर रखा है राजस्थान के इस वाद्य यंत्र का नाम (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। राजस्थान का नाम लेते ही आंखों के सामने इसके पुराने भव्य किले आते हैं, लेकिन इस राज्य की पहचान इसके लोकगीतों और संगीत से भी है। राजस्थानी संगीत की दुनिया में एक ऐसा ही वाद्य यंत्र है, जिसे रावण हत्था कहा जाता है।
ये वाद्य यंत्र राजस्थान के साथ-साथ गुजरात के इलाकों में भी बजाया जाता है। इस यंत्र को इसकी मधुर आवाज के लिए जाना जाता है, लेकिन इसकी खासियत यही खत्म नहीं होती। इस वाद्य यंत्र का कनेक्शन लंकापति रावण से भी जुड़ा है। आइए जानें राजस्थानी लोकसंगीत का अहम हिस्सा माने जाने वाले रावण हत्था की कहानी।
क्या है रावण से कनेक्शन?
ऐसा माना जाता है कि रावण हत्था का आविष्कार रावण ने ही किया था। जब लंकापति भगवान शकंर की आराधना कर रहा था, तब उसने इस वाद्य यंत्र का आविष्कार किया था। इसलिए इस यंत्र का नाम रावण हत्था रखा गया। हालांकि, यह सिर्फ एक लोककथा है। इसके सच होने का कोई प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन ये कहानी लोगों के बीच काफी मशहूर है।
वायलन और सारंगी का पूर्वज है रावण हत्था
रावण का हत्था इतिहास एक हजार साल से भी ज्यादा पुराना है। संगीत के विद्वान और इतिहासकार इसे भारतीय धनुष के आकार से बजाए जाने वाले वाद्यों की प्राचीन परंपरा का हिस्सा मानते हैं। कई जानकारों का ये भी कहना है कि आज के दौर की आधुनिक सारंगी और वायलिन जैसे वाद्य यंत्रों का जन्म भी रावण हत्था से ही हुआ है। इसी के डिजाइन से प्रभावित होकर सारंगी और वायलिन जैसे वाद्य यंत्र बनाए गए।
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लोकदेवताओं की वीरगाथाएं
इस वाद्य यंत्र को राजस्थान के भोपा-भोपी समुदाय से जोड़कर देखा जाता है। वहां के लोकगायक इसे बजाते हुए धार्मिक कथाएं और स्थानीय देवताओं की वीरगाथाएं सुनाते हैं। खासतौर से लोकदेवता पबुजी और देवनारायण जी की गाथाओं के गायन में रावण हत्था ही बजाया जाता है। जब इसके तारों से धुन निकलती है, तो ये पूरी कहानी जिंदा हो उठती है।
कैसे बनता है रावण हत्था?
रावण हत्था की बनावट काफी खास होती है। इस वाद्य यंत्र के मुख्य हिस्से यानी साउंड बॉक्स पर बकरी या किसी जानवर की खाल मढ़ी जाती है, जिससे इसकी खास गूंजती हुआ ध्वनि पैदा होती है। इसमें धुन पैदा करने के लिए बांस या किसी मजबूत लकड़ी की डंडी का इस्तेमाल किया जाता है।
पुराने समय में इसमें केवल घोड़े के बाल और प्राकृतिक रेशों के तारों का इस्तेमाल होता था, लेकिन बदलते वक्त के साथ आज इसमें मेटल के तारों का इस्तेमाल होने लगा है। इसे बजाने के लिए भी घोड़े के बालों से बना एक खास धनुष होता है, जिसे इसके तारों पर रगड़कर धुन पैदा की जाती है।