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    विदेशी नहीं, भारत की देन है पोलो! जानिए मणिपुर से कैसे दुनियाभर में छाया यह शाही खेल

    Updated: Sun, 29 Mar 2026 12:52 PM (IST)

    दुनिया के 70 से अधिक देशों में खेले जाने वाले खेल पोलो की जड़ें भारत के मणिपुर में हैं। लगभग 1400 ईसा पूर्व मणिपुर में इसे ‘सगोल कंगजई’ के नाम से जाना ...और पढ़ें

    पोलो का भारतीय मूल: मणिपुर से वैश्विक खेल तक का सफर (Picture Credit- Map Academy)

    पोलो का भारतीय मूल: मणिपुर से वैश्विक खेल तक का सफर (Picture Credit- Map Academy)

    HighLights

    1. आधुनिक पोलो की उत्पत्ति भारत के मणिपुर में हुई

    2. प्राचीन मैतेयी ग्रंथ 'कंगजीरओई' में 1400 ईसा पूर्व का उल्लेख

    3. ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे 'पोलो' नाम देकर विश्व में फैलाया

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। गूंजती टापें, सवारों के हाथों में घूमते सोटे, और दर्शकों की ऊंची आवाजों से गूंजता मैदान- पोलो का खेल पूरे जोश में है! यह कोई विदेशी भूमि नहीं, बल्कि मणिपुर के राजघराने का दृश्य है। क्या आपको पता है कि आधुनिक पोलो का उद्गम भारत के मणिपुर से हुआ है? पोलो का इतिहास बहुत पुराना है। दक्षिण एशिया में, प्राचीन मैतेयी ग्रंथ ‘कंगजीरओई’ के अनुसार, इस खेल की शुरुआत लगभग 1400 ईसा पूर्व में हुई, जब मणिपुर के वर्तमान क्षेत्र में स्थित प्राचीन राज्य ‘कंगलईपाक’ में राजा निंगथौ कंगबा का शासन था।

    प्राचीन ईरान में भी आज के पोलो जैसा घुड़सवारी पर आधारित एक खेल 600 ईसा पूर्व के आस-पास खेला जाता था। चीन में यह खेल सातवीं शताब्दी में तांग वंश के शासनकाल में प्रचलित था। परंपरागत रूप से पोलो में दो टीमों में सोलह-सोलह खिलाड़ी घोड़े पर सवार होकर खेलते थे। खिलाड़ियों के हाथों में अर्द्धचंद्राकार सिरे वाली छड़ियां होती थीं, जिनसे वे गेंद को प्रतिद्वंद्वी टीम के गोल में मारते थे। तब से पोलो के विभिन्न रूप दुनिया के कई हिस्सों में खेले जाते रहे हैं- चीन, तिब्बत, म्यांमार और हाल के समय में दक्षिणी अफ्रीका और अमेरिका में भी। भारतीय उपमहाद्वीप में यह खेल गिलगित-बाल्टिस्तान, लद्दाख और मणिपुर में खेला जाता था। इसके अलावा तुर्क-अफगान और मुगल शासन वाले उत्तरी भारत, राजपूत-शासित पश्चिमी भारत और दक्कन क्षेत्र में भी पोलो का प्रचलन था।

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    (Picture Credit- Map Academy)

    मणिपुर की शाही विरासत

    आज के दौर में पोलो को भले ही विशुद्ध ब्रिटिश खेल के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसकी जड़ें भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर में मिलती हैं। आरंभिक आधुनिक मणिपुर में ‘सगोल कंगजई’ यानी घोड़े पर खेला जाने वाला हाकी जैसा खेल, मणिपुर और बर्मा के राजघरानों के बीच लोकप्रिय शाही शौक था। 19वीं शताब्दी के बर्मा के चित्रित हस्तलेख, जिन्हें पराबैक कहा जाता है, इस खेल को शाही उत्सवों और समारोहों का हिस्सा बनाकर प्रस्तुत करते हैं। इन चित्रों में घोड़े पर सवार पुरुषों को हाथों में सोटे लिए खेलते हुए दिखाया गया है, जबकि शाही परिवार के सदस्य खेल को देख रहे होते हैं। जब 19वीं शताब्दी में बर्मा ने मणिपुर पर आक्रमण किया, तो दरबारी और स्थानीय लोग पड़ोसी क्षेत्रों- जो आज असम का हिस्सा हैं- की ओर पलायन कर गए और वहीं इस खेल को खेलते रहे।

    फुलु से पोलो का सफर

    इन्हीं क्षेत्रों में, 19वीं शताब्दी के मध्य के आस-पास, ब्रिटिश चाय बागान मालिकों और सेना अधिकारियों ने इस खेल को देखा और इसकी ओर आकर्षित हुए। इस खेल को ‘पोलो’ नाम दिया गया, जिसके बारे में माना जाता है कि यह तिब्बती शब्द ‘फुलु’ से आया है, जिसका अर्थ होता है ‘गेंद’। कुछ दशकों में ब्रिटिश अधिकारियों ने असम, बंगाल और अन्य स्थानों पर कई पोलो क्लब स्थापित किए- पहला क्लब वास्तव में 1861-62 के बीच कलकत्ता में दो ब्रिटिश सेना अधिकारियों, जोसेफ शेरर और राबर्ट स्टीवर्ड द्वारा स्थापित किया गया था।

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    (Picture Credit- Map Academy)

    शुरुआती दौर में ब्रिटिश लोग इस खेल को छोटे कद के घोड़ों पर, धीमी गति से और आठ-आठ खिलाड़ियों की टीमों के साथ खेलते थे। जैसे-जैसे प्रतियोगिताएं बढ़ने लगीं, खेल में बदलाव आया और यह बड़े घोड़ों पर खेला जाने लगा। पोलो 1868 में माल्टा और 1869 में इंग्लैंड पहुंचा, जहां इसे ढालकर चार खिलाड़ियों के उस संस्करण में बदला गया, जिसे हम आज जानते हैं। भारत में 1892 में इंडियन पोलो एसोसिएशन की स्थापना हुई और पहले विश्व युद्ध के बाद इस खेल के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों और विनियमों को औपचारिक रूप से तय किया गया।

    आधुनिकीकरण और वैश्विक विस्तार

    19वीं शताब्दी में ब्रिटिश अधिकारियों के बीच अश्वक्रीड़ा (घुड़सवारी से जुड़ा खेल) ही शिष्टाचार और कुलीनता का एक अहम हिस्सा माना जाता था। यही कारण है कि तेज रफ्तार, जोखिम भरा और महंगा खेल पोलो भारत में उनका एक प्रिय शौक बन गया। यह खेल शारीरिक फिटनेस बनाए रखने में मदद करता था और नए रंगरूटों को अनुभवी सीनियर अधिकारियों के साथ मेलजोल बढ़ाने का अवसर भी देता था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद पोलो ब्रिटिश कुलीनता और शौर्य के नए आदर्शों का प्रतीक बन गया। आज यह खेल दुनिया के 70 से अधिक देशों में खेला जाता है।

    (सौजन्य -   https://mapacademy.io)

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