'पार चना दे दिस्से कुल्ली यार दी...' सुना तो बहुत होगा, लेकिन क्या जानते हैं इस गीत की असल कहानी
सोहनी-माहीवाल की अमर प्रेम कहानी और उससे जुड़े प्रसिद्ध पंजाबी लोकगीत "पार चना दे दिस्से कुल्ली यार दी..." को तो ...और पढ़ें

जानें 'पार चना दे दिस्से कुल्ली यार दी' लोकगीत का अर्थ (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
सोहनी-माहीवाल की अमर प्रेम कहानी का विस्तृत वर्णन
प्रसिद्ध पंजाबी लोकगीत 'पार चना दे दिस्से कुल्ली यार दी'
कच्चे घड़े के कारण प्रेमियों का दुखद अंत
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। जमाना चाहे कितना भी बदल गया हो, आज भी जब बात बेशुमार प्यार की आती है, तो लैला-मजून, हीर-रांझा का नाम जरूर लिया जाता है। इन्हीं में एक जोड़ी थी सोहनी-माहीवाल की, जिनके प्यार की कहानी आज भी पंजाब के लोकगीतों में सुनने को मिलती है। आइए जानते हैं इस लोकगीत और सोहनी-माहीवाल की अमर प्रेम कहानी-
कौन थे सोहनी- माहीवाल?
सोहनी यानी सुंदर, कुम्हारों के परिवार में जन्मी एक युवती थी, जो अपने पिता के मिट्टी के बर्तनों पर सुंदर चित्रकारी करती थी। इसी बीच व्यापार के सिलसिले में उनके गांव आए इज्जत बेग ने जब पहली बार पिता की दुकान पर सोहनी को देखा, तो देखते ही उन्हें अपना दिल दे बैठे।
बस फिर क्या था, प्यार के लिए बेग अपना समृद्ध जीवन त्याग दिया और अपने वतन को भुला दिया और सोहनी के घर में नौकर बनकर उनके मवेशी चराने का काम करने लगा। इसी कारण उन्हें माहीवाल (भैंस चराने वाला) के नाम से जाना जाने लगा।
जबरदस्ती कराई शादी
जब समाज और सोहनी के परिवार वालों को दोनों के इस प्यार के बारे में पता चला, तो उन्होंने इसके खिलाफ अपनी कड़ी नाराजगी जाहिर की। बाद में इस प्रेम कहानी को खत्म करने के लिए सोहनी की इच्छा के खिलाफ जाकर उसके परिवार वालों ने किसी दूसरे कुम्हार से उसकी शादी करा दी गई और शादी के बाद वह चिनाब नदी के दूसरी ओर स्थित अपने पति के साथ रहने लगी।
शुरू हुआ चोरी-छिपे मिलने का सिलसिला
सोहनी की शादी से दुखी माहीवाल ने भी अपनी नौकरी छोड़ दी और नदी पार ठीक सोहनी के नए घर के सामने एक छोटी सी कुटिया बनाकर रहने लगा। शादी के बाद भी सोहनी का दिल माहीवाल के पास ही थी और इसी कारण वह हर रात खतरनाक चिनाब नदी को पार करके माहीवाल से उसकी कुटिया में मिलने जाने लगी।
क्योंकि उसे तेज धाराओं में ठीक से तैरना नहीं आता था, इसलिए वह नदी को तैरकर पार करने के लिए एक बड़े, पके हुए मिट्टी के घड़े का इस्तेमाल करती थी। माहीवाल भी अपनी कुटिया में एक छोटा-सा दीया जलाकर रखता था, जिससे सोहनी को घोर अंधेरे में भी रास्ता दिखाई दे। अपने प्यार से मिलने के इसी संघर्ष को बताता है पंजाब का मशहूर लोकगीत "पार चना दे दिस्से कुल्ली यार दी...घड़िया, घड़िया…आवे घड़िया"
घड़िया घड़िया, आ वे घड़िया!
पार चना दे दिस्से कुल्ली यार दी,
घड़िया घड़िया, आ वे घड़िया!
अड़िये अड़िये, हां नी अड़िये!
पार चना दे दिस्से कुल्ली यार दी,
घड़िया घड़िया, आ वे घड़िया!
हां मैं ना-काम नी, हो मैं नाकाम नी,
कच्ची मेरी मिट्टी, कच्चा मेरा नाम नी!
हां मैं नाकाम नी,
कच्चियों दा हुंदा कच्चा अंजाम नी,
एह गल्ल आम नी!
अड़िये अड़िये, हां नी अड़िये!
रात हनेरी, नदी ठा-ठां मारदी,
अड़िये अड़िये, हां नी अड़िये!
अज्ज माही वालन मैं जाना मिल वे!
छल्ला पया ना छटी...
वे हा लेके लवे, अज्ज माही वालन मैं जाना मिल वे!
घड़िया घड़िया, आ वे घड़िया!
घड़िया घड़िया, आ वे घड़िया!
रात हनेरी, नदी ठा-ठां मारदी,
अड़िये अड़िये, हां नी अड़िये!
पार चना दे दिस्से कुल्ली...
हां कुल्ली! वे कुल्ली यार दी!
मौत के साथ अमर हुई एक और प्रेम कहानी
लेकिन हर प्रेम कहानी की तरह, अमर होने के लिए सोहनी-माहीवाल को भी अपनी जान देनी पड़ी। जब सोहनी की ननद को पता चला कि वह रोज रात अपने प्रेमी से मिलने नदी पार जाती है, तो उसने मजबूत, पक्के मिट्टी के घड़े को कच्चे घड़े से बदल दिया।
वह रात तूफान की थी और चिनाब उफान पर थी। जैसे ही सोहनी घड़ा लेकर उफनती नदी में उतरी कच्ची मिट्टी पानी में घुलने लगी। घड़े के पूरी तरह से घुल जाने सोहनी नदी में डूबने लगी और देख डूबता देख माहीवाल उसे बचाने के लिए नदी में कूद गया, लेकिन चिनाब की प्रचंड धारा दोनों को बहा ले गई और आखिरकार मौत ने ही उन्हें हमेशा के लिए एक कर दिया।
