‘केसरिया बालम आओ नी…’ स्वागत गीत नहीं है, विरह और इंतजार से जुड़ी है इसकी असली कहानी
राजस्थानी लोकगीत 'केसरिया बालम आओ नी', असर में एक विरह गीत है, जो ढोला-मारू की अमर प्रेम कहानी को दर्शाता है। आइए जानते हैं इस गीत का इतिहास। ...और पढ़ें

केसरिया बालम आओ नी की असली कहानी (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
'केसरिया बालम' असल में ढोला-मारू के विरह का गीत था
बचपन में शादी के बाद ढोला, मारू को भूल गए थे
मारू ने लोकगायकों से संगीत के जरिए संदेश भेजा था
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। केसरिया बालम आवो नी, पधारो म्हारे देस…गाने की इस पंक्ति को सुनते ही दिमाग में सबसे पहले राजस्थान की छवि ऊभरती है। यह लोकगीत इस राज्य से कुछ इस तरह जुड़-सा गया है कि अब यह राजस्थान की पहचान बन चुका है।
यह लोकगीत आज दुनियाभर में राजस्थानी आतिथ्य और शाही स्वागत का प्रतीक बन चुका है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस सुरीले गीत को असल में मेहमाननवाजी के लिए नहीं, बल्कि अपने प्यार पाने के लिए गाया गया था। जी हां, यह गीत विरह से जूझ रही एक पत्नी की अपने पति के लिए भेजी गई संगीतमय पुकार थी। आइए आपको बताते हैं इस गीत का दिलचस्प और भावुक करने वाला इतिहास-
बचपन का रिश्ता और दूरी
बात आठवीं शताब्दी की है, जब नरवर के राजकुमार ढोला और पूंगल की राजकुमारी मारू (मारवणी) की बचपन में ही शादी कर दी गई थी। उस समय ढोला सिर्फ तीन साल के थे और मारू महज डेढ़ साल की। बचपन में हुई इस शादी के बाद मारू अपने मायके पूंगल में ही रहीं। जैसे-जैसे समय बीतता गया, ढोला इस रिश्ते को पूरी तरह से भूल गए और बड़े होने पर उनका दूसरा विवाह हो गया।
विरह की आग में जलती मारू
एक तरफ जहां ढोला बचपन के रिश्त को पूरी तरह से भूल चुका था, वहीं दूसरी ओर सयानी हो चुकी मारू अपने पति के इंतजार में दिन-रात तड़पती रही। लंबे इंतजार के बाद भी जब ढोला मारू को लेने नहीं आए, तो उनके पिता ने ढोला को याद दिलाने के लिए कई संदेशवाहक भेजे, लेकिन ढोला की दूसरी पत्नी को जब इसका पता चला, तो उसने जलन के कारण सभी संदेशों को ढोला तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया।
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संगीत के जरिए दिल की पुकार
लाख कोशिशों के बाद ही जब ढोला तक संदेश नहीं पहुंच पाए, तो मारू ने राजस्थान के चतुर लोकगायकों को अपने विरह के दर्द भरे दोहे देकर नरवर भेजा। उसने गायकों से कहा कि वे ढोला के महल के बाहर जाकर ऐसी राग छेड़ें जो सीधे उसके दिल को छुए। तब गायकों ने नरवर पहुंचकर ऊंची आवाज में पुकारा- "केसरिया बालम आओ नी, पधारो म्हारे देस"।
राजस्थानी संस्कृति में 'केसरिया' रंग प्रेम, त्याग और शौर्य का प्रतीक माना जाता है। इसलिए यहां मारू अपने वीर पति को 'केसरिया बालम' कहकर अपने देस आने की गुहार लगा रही थी। पारंपरिक लोकगीत में आज भी ढोला और मारू के नाम का सीधा जिक्र मिलता है।
सुरों से हुआ मिलन
मारू के दर्द से भरे इन सुरों को सुनते ही ढोला को अपनी पुरानी यादें तुरंत याद आ गई और उन्हें अपनी पहली पत्नी मारू और बचपन में हुई शादी भी याद आ गई। इसके बाद ढोला तुरंत अपने सबसे तेज ऊंट पर सवार होकर पूंगल पहुंचे और बरसों से इंतजार कर रही मारू को अपना लिया।
प्रेम-संदेश से स्वागत गीत तक
ढोला और मारू के प्रेम का गवाह बना यह गीत सदियों तक विरह गीत की तरह रेगिस्तान में गूंजता रहा। बाद में मशहूर मांड गायिका अल्लाह जिलाई बाई ने इसे शास्त्रीय सुरों में पिरोया और यह एक व्यक्तिगत प्रेम-संदेश बनकर पूरे राजस्थान की आत्मा और दुनियाभर में स्वागत गीत बन गया।