आपके इलाके में क्यों बरस रही है ज्यादा आग, क्या है एक ही शहर में अलग-अलग तापमान का असली कारण?
एक ही शहर के अलग-अलग इलाकों में तापमान में अंतर देखा गया है। इसके पीछे शहरीकरण का बड़ा हाथ है। ...और पढ़ें
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एक ही शहर के अलग-अलग इलाकों में तापमान में अंतर (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारत के शहर लगातार गर्म होते जा रहे हैं, लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि एक ही शहर के अलग-अलग हिस्सों में गर्मी एक जैसी महसूस नहीं होती। जी हां, यह सच है।
एक ही शहर के अलग-अलग इलाकों में जमीन के तापमान में काफी अंतर देखने को मिल रहा है। ऐसे में सवाल आता है कि ऐसा कैसे हो सकता है? आइए समझें एक ही शहर में तापमान में अंतर के पीछे क्या कारण हैं।
सैटेलाइट तस्वीरों से खुला बड़ा राज
नासा और यूएस जियोलॉजिकल सर्वे के एक साझा मिशन लैंडसैट सैटेलाइट की तस्वीरों के एनालिसिस से एक चौंकाने वाली बात सामने आई है। इन तस्वीरों से पता चलता है कि शहरों के जिन इलाकों में इमारतों का जाल बिछा हुआ है और कंक्रीट का निर्माण ज्यादा है, वहां जमीन की सतह का तापमान बहुत ज्यादा था। वहीं, जिन इलाकों में पार्क, पेड़-पौधे या पानी के स्रोत मौजूद हैं, वहां की जगहें काफी कम गर्म थीं।
तेजी से बदल रही है दिल्ली की तस्वीर
अगर देश की राजधानी दिल्ली की बात करें, तो साल 2000 और 2020 के बीच यहां के निर्माण क्षेत्र में काफी विस्तार हुआ है। इन दो दशकों में दिल्ली के बाहरी हिस्सों में कंस्ट्रक्शन सबसे ज्यादा बढ़ा है, खासकर उत्तर-पश्चिम के बवाना और नरेला इलाकों में।
इसके अलावा द्वारका, नजफगढ़, और पूर्वी व दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के बाबरपुर और सरिता विहार जैसे इलाकों में भी कंस्ट्रक्शन के काम में काफी बढ़ोतरी देखी गई है।
इस अंधाधुंध निर्माण का नतीजा यह हुआ कि दिल्ली में खाली जमीनें 80% तक कम हो गईं और खेती की जमीन में भी 15% की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, दिल्ली के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों में हरियाली मौजूद है और इसमें लगातार बढ़ोतरी भी देखने को मिली है।
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क्या है अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट?
पिछले दो दशकों में भारत में अर्बनाइजेशन बहुत तेजी से हुआ है। इस वजह से कंक्रीट की इमारतों वाले क्षेत्र तो बढ़ गए, लेकिन हरियाली, खुली जगहें और खेती की जमीनें लगातार कम होती चली गईं।
दरअसल, सड़कें और इमारतें जंगलों, खेतों या जलाशयों के मुकाबले गर्मी को कहीं ज्यादा सोखते और बढ़ाते हैं। यही वजह है कि शहर अपने आस-पास के गांव या खुले इलाकों की तुलना में एक गर्म टापू जैसे बन जाते हैं। इसे ही अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट कहा जाता है।
2024 की नेचर सिटीज स्टडी के अनुसार, साल 2003 से 2020 के बीच भारत के शहरों का तापमान देश के बाकी हिस्सों के मुकाबले लगभग दोगुनी तेजी से बढ़ा है। शहरों के इस तरह भट्टी बनने में अकेले शहरीकरण का योगदान लगभग 38% रहा है।
आबादी का बोझ और एसी-कूलर की किल्लत
यह स्थिति आने वाले समय में और भी गंभीर हो सकती है। एक रिपोर्ट बताती है कि साल 2020 में भारत की शहरी आबादी 48 करोड़ थी, जो साल 2050 तक बढ़कर लगभग 95 करोड़ हो सकती है। इतनी बड़ी आबादी के लिए इस बढ़ती गर्मी से बच पाना एक बहुत बड़ी चुनौती है।
शहरों में रहने वाले हर परिवार के पास इस गर्मी से निपटने के साधन नहीं हैं। शहरी इलाकों के सिर्फ 12.6 फीसदी परिवारों के पास ही एसी की सुविधा है। वहीं सिर्फ 22 फीसदी परिवारों के पास कूलर है। यानी शहर की एक बहुत बड़ी आबादी के पास इस जानलेवा गर्मी से बचने का कोई साधन नहीं है और वे गर्मी की मार को झेलने पर मजबूर हैं।