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क्यों एक तारीफ पूरी जिंदगी याद रहती है और एक डांट भी? समझिए क्या है 'टीचर इफेक्ट' का माइंड गेम

Published: Fri, 04 Sep 2026 03:09 PM (IST)

स्टूडेंट के लिए टीचर एक रोल मॉडल है, उनकी कही हर बात मन में गहराई तक बैठ जाती है।

बच्चे के मन में घर कर जाती है टीचर की कही बात (Image Source: AI Generated)

बच्चे के मन में घर कर जाती है टीचर की कही बात (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। इंसानी दिमाग की सबसे बड़ी खासियत ही यही है कि वह किसी की कही गई बात को सालों साल और कई बार तो जिंदगी भर याद रख सकता है। इसमें भी अगर टीचर ने कोई सीख दी हो या डांट लगाई हो तो इसका प्रभाव जिंदगी भर रह सकता है जिसे आसान भाषा में टीचर इफेक्ट और साइकोलॉजी की दुनिया में पिग्मेलियन इफेक्ट कहते हैं। 

आइए जानते हैं आखिर क्या है पिग्मेलियन इफेक्ट और इसका असर जिंदगी भर क्यों रहता है। 

क्या है टीचर इफेक्ट? 

टीचर इफेक्ट शिक्षा शास्त्र और मनोविज्ञान का महत्वपूर्ण विचार है, जो कहता है कि किसी टीचर के गुण, व्यवहार और पढ़ाने का स्टाइल स्टूडेंट के भविष्य पर गहरा प्रभाव डालता है। इसे उदाहरण से समझें तो अगर टीचर अपने किसी स्टूडेंट से ज्यादा उम्मीदें रखता है तो उसका प्रदर्शन भी उतना ही बेहतरीन होता है। 

हालांकि इस थ्योरी का जन्म क्लासरूम में हुआ लेकिन इसका उपयोग मैनेजमेंट, बिजनेस और स्पोर्ट्स साइकोलॉजी में किया जा रहा है। 

बच्चे के मन में घर कर जाती है टीचर की कही बात

इसी तरह टीचर यानी पिग्मेलियन इफेक्ट का असर विद्यार्थी के दिमाग पर बहुत गहरा पड़ता है। तभी तो टीचर के तारीफ किए जाने या डांट लगाने पर भी यह बात जिंदगी भर याद रहती है। सिर्फ याद ही नहीं रहती, बल्कि हमारा दिमाग इसे सच भी मानने लगता है। इसे ही साइकोलॉजी की भाषा में आत्म-पूर्ति भविष्यवाणी यानी सेल्फ फुलफिलिंग भविष्यवाणी कहा जाता है। 

मान लीजिए कि टीचर ने क्लास में किसी बच्चे को कहा कि ‘तुम बहुत होनहार हो’, बच्चा इसे सच मानकर वैसा ही बनने की कोशिश में लग जाता है। जबकि अगर शिक्षक इसके उलट यह कहे कि ‘तुम्हें कुछ नहीं आता’ तो यह भी बच्चे के लिए भविष्यवाणी जैसा होता है, जिसका असर उसकी आगे की जिंदगी पर देखने को मिलता है। 

1965 में हुई थी पहली बार पहचान 

टीचर इफेक्ट को अमेरिकी शिक्षाविदों रॉबर्ट रोसेन्थल और लेनोर जैकबसन ने पहली बार साल 1965 में पहचाना था। यही वजह है कि इसका तीसरा नाम रोसेन्थल इफेक्ट भी है। उनका मानना था कि किसी छात्र की बौद्धिक क्षमताओं को बढ़ाने या घटाने में शिक्षक की सकारात्मक और नकारात्मक अपेक्षाएं बड़ी भूमिका निभाती हैं। यह इफेक्ट साफतौर पर बताता है कि कैसे दूसरों का व्यवहार और अपेक्षाएं किसी व्यक्ति की क्षमता को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। 

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