अंधेरा होते ही सताता है अकेलापन और पुरानी यादें? क्या है रात में ज्यादा इमोशनल होने की असली वजह
क्या आप भी रात के समय ज्यादा इमोशनल महसूस करते हैं। दरअसल, इसके पीछे आपके दिमाग का खेल छिपा है। ...और पढ़ें

क्यों रात होते ही ज्यादा इमोशनल हो जाते हैं आप? (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि रात के समय आप ज्यादा इमोशनल हो जाते हैं? अक्सर लोगों को पुरानी यादें, चिंता या उदासी का एहसास रात के सन्नाटे में बढ़ जाता है, लेकिन ऐसा क्यों होता है? रात के समय ऐसा क्या होता है कि दिल टूटने का एहसास या अकेलापन इतना भारी लगने लगता है?
इस बारे में डॉ. मीनाक्षी जैन (सीनियर कंसल्टेंट, साइकायट्री, अमृता हॉस्पिटल, फरीदाबाद) बताती हैं कि इसके पीछे सिर्फ भावनाएं नहीं, बल्कि रात के समय इंसानी दिमाग का बदला हुआ बर्ताव और काम करने का तरीका जिम्मेदार है। रात का समय एक ऐसा मनोवैज्ञानिक माहौल तैयार करता है, जहां दबी हुई भावनाएं स्वाभाविक रूप से बाहर आ जाती हैं। आइए समझें ऐसा क्यों होता है।
दिन के डिसट्रैक्शन का कम होना
दिन के समय हमारा दिमाग काम, ट्रैफिक, जिम्मेदारियों, फोन कॉल्स, लोगों से मिलने-जुलने और सरवाइवल मोड में बिजी रहता है। इन सब के कारण हमें अपनी भावनाओं पर ध्यान देने का मौका नहीं मिलता, लेकिन जैसे ही रात होती है, बाहरी दुनिया का शोर और भटकाव खत्म हो जाते हैं।
ऐसे में शांत पड़े दिमाग को उन अनसुलझी भावनाओं को प्रोसेस करने की जगह मिल जाती है, जिन्हें हम दिनभर नजरअंदाज करते रहे थे। यही कारण है कि रात में उदासी, अकेलापन और ओवरथिंकिंग अचानक बढ़ जाते हैं।
हार्मोन्स का उतार-चढ़ाव और थका हुआ दिमाग
हमारे शरीर का इंटरनल क्लॉक भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है। रात के समय शरीर में कोर्टिसोल का स्तर गिरने लगता है। यह वही हार्मोन है जो हमें दिनभर सतर्क रखने और भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद करता है।
खबरें और भी
इसके साथ ही, दिनभर की भागदौड़ के बाद दिमाग काफी थक जाता है। एक थका हुआ दिमाग अपने इमोशनल रिएक्शन पर कंट्रोल नहीं रख पाता, जिसके कारण छोटी-सी चिंता भी रात में बहुत बड़ी दिखने लगती है।
लाइफस्टाइल
लाइफस्टाइल के बदलते पैटर्न इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं। काम के लंबे घंटे, देर रात तक स्क्रीन स्क्रॉल करना, आर्थिक दबाव और शहरी जीवन का अकेलापन मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित कर रहा है। लोग अपनी रातें स्क्रीन के साथ अकेले बिताते हैं, जहां सोशल मीडिया लगातार तुलना, इमोशनल डिपेंडेंसी और अकेलेपन की भावना पैदा करता है।
दबी हुई भावनाएं
हमारे समाज में आज भी कई घरों में खुलकर अपनी भावनाओं को जाहिर करने की मनाही होती है। लोगों को मजबूत बने रहने, शिकायत न करने और बस काम करते रहने की सीख दी जाती है। इस वजह से दिनभर जो भावनाएं अंदर ही अंदर दबी रहती हैं, वे रात के सन्नाटे में चुपके से बाहर निकल आती हैं।
नींद की कमी
खराब या अधूरी नींद हमारी इमोशनल सेंसिटिविटी को बढ़ा देती है और तनाव से निपटने की दिमाग की क्षमता को कम कर देती है। सिर्फ एक रात की अधूरी नींद भी इंसान के भीतर चिड़चिड़ापन, उदासी और ज्यादा इमोशनल रिएक्शन को बढ़ा सकती है।

(AI Generated Image)
कब लें एक्सपर्ट की सलाह?
अगर आपको हर रात लगातार उदासी, घबराहट, निराशा, रोने के दौरे या लगातार तेजी से बदलते विचारों का सामना करना पड़ रहा है, तो यह एंग्जायटी, डिप्रेशन, बर्नआउट या किसी ट्रॉमा का संकेत हो सकता है।
ऐसी स्थिति में डॉक्टर से सुझाव लें और एक बेहतर नाइट रूटीन बनाएं। सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करें, भावुक करने वाले कंटेंट से दूर रहें, सोने का समय फिक्स करें और अपनी भावनाओं के बारे में खुलकर बात करना शुरू करें।