ट्रेन की बर्थ पर करवटें बदलते कट जाती है रात? साइंस से समझिए सफर में नींद न आने का दिलचस्प कारण
कई लोगों को ट्रेन में नींद नहीं आती। दरअसल, इसके पीछे दिमाग से जुड़े कई दिलचस्प कारण जिम्मेदार हैं। ...और पढ़ें

क्या आपको भी ट्रेन में नहीं आती नींद? (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। ट्रेन का सफर अपने आप में एक खूबसूरत अनुभव होता है। खिड़की से पीछे छूटते नजारे, चाय-चाय की जानी-पहचानी आवाज और पटरियों की रिदम वाली छुक-छुक, यह सब दिन में अच्छा लगता है, लेकिन जैसे ही रात होती है, यह सफर कई लोगों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं रह जाता।
करवटें बदलते-बदलते पूरी रात कट जाती है, लेकिन आंखों से नींद गायब रहती है। क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? दरअसल, ट्रेन में नींद न आने की वजह सिर्फ आरामदेह बिस्तर की कमी नहीं, बल्कि इसके पीछे कुछ दिलचस्प कारण भी छिपे हैं। आइए डॉ. गौरव गुप्ता (सीनियर साइकायट्रिस्ट, सीईओ, तुलसी हेल्थकेयर, नई दिल्ली) से जानते हैं आखिर सफर के दौरान हमारी नींद क्यों उड़ जाती है।
फर्स्ट नाइट इफेक्ट
जब हम किसी नए या अपरिचित माहौल में सोते हैं, तो हमारा दिमाग पूरी तरह शांत नहीं होता। इसे फर्स्ट नाइट इफेक्ट कहा जाता है। इंसानी दिमाग खुद को सुरक्षित रखने के लिए नए माहौल में सतर्क रहता है। ट्रेन में सोते समय भी आपका दिमाग अलर्ट रहता है, ताकि किसी भी खतरे या असामान्य आवाज पर आपको तुरंत जगा सके। यही वजह है कि घर जैसी गहरी नींद नहीं आ पाती।
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(AI Generated Image)
मोशन सिकनेस और पटरियों का कंपन
ट्रेन लगातार चलती और हिलती रहती है। जब आप बर्थ पर लेटते हैं, तो आपका शरीर ट्रेन के इस कंपन और गति को महसूस करता है। हमारे कान के अंदरूनी हिस्से में मौजूद वेस्टिबुलर सिस्टम दिमाग को लगातार गति के सिग्नल भेजता है, जबकि आपकी आंखें बंद होती हैं। इस मिसमैच के कारण दिमाग भ्रमित हो जाता है, जिससे हल्की बेचैनी या मोशन सिकनेस हो सकती है, जो नींद में बड़ी बाधा है।
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सहयात्रियों का शोर और लाइट का खलल
ट्रेन एक सार्वजनिक जगह है। भले ही रात में लाइटें बंद कर दी जाएं, लेकिन सहयात्रियों का खर्राटे लेना, देर रात तक फोन पर बात करना, बार-बार वॉशरूम जाने के लिए उठना और हर स्टेशन पर होने वाली हलचल आपकी नींद को बार-बार तोड़ती है। इसके अलावा, खिड़की से आने वाली स्टेशनों की फ्लैशलाइट या मोबाइल की स्क्रीन की रोशनी हमारे शरीर में स्लीप हार्मोन के लेवल को बिगाड़ देती है।
अनकम्फर्टेबल बर्थ और शारीरिक थकान
ट्रेन की बर्थ घर के गद्देदार बिस्तर जैसी नहीं होती। अपर या मिडिल बर्थ पर जगह सीमित होती है, जिससे आप खुलकर सीधे या करवट लेकर नहीं सो पाते। इसके अलावा, यात्रा की शुरुआत में सामान उठाने और भागदौड़ करने से शरीर थक जाता है, लेकिन मानसिक तनाव के कारण वह थकान नींद में बदलने के बजाय शरीर को और ज्यादा बेचैन कर देती है।