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    आप सिर्फ दीदी की सुनती हो! यह सिर्फ बच्चों की शिकायत नहीं, एक इशारा है, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये गलती

    Updated: Sun, 01 Feb 2026 08:11 AM (IST)

    माता-पिता हमेशा कहते हैं कि उनके लिए उनकी हर संतान एक समान है। मगर इसमें भी कोई दोराय नहीं कि अगर परिवार में दो बच्चे हैं तो एक बच्चा ज्यादा प्यार या ...और पढ़ें

    माता-पिता का पक्षपात: क्या आप भी बच्चों में कर रहे हैं भेदभाव? (Picture Credit- AI Generated)

    माता-पिता का पक्षपात: क्या आप भी बच्चों में कर रहे हैं भेदभाव? (Picture Credit- AI Generated)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आप दीदी की ही बात क्यों मानती हैं? मैंने झूठ नहीं कहा और न ही मैंने दीदी की पेंसिल ली है। आपकी तो वही फेवरेट है! यह वाक्य एकदम तीर की तरह महसूस हुआ नोएडा की रहने वाली सुचिता को। बच्चों के बीच वो कभी भेदभाव नहीं करतीं, फिर उनकी छोटी बेटी को ऐसा क्यों लगा? सुचिता को अपना बचपन याद आ गया।

    वो भले ही अपने माता-पिता से इस तरह खुलकर शिकायत न कर पाईं मगर उनके बड़े भाई के प्रति दादी का लगाव सहज ही दर्शा देता था कि भैया को ज्यादा प्यार मिलता है। कभी नाराजगी में तो कभी यूं ही किसी पारिवारिक महफिल में बच्चे माता-पिता से यह प्रश्न पूछ ही लेते हैं कि ‘मम्मी, सच बताना! हम भाई-बहनों में आपका फेवरेट कौन है?’ जिसके लिए हर माता-पिता यही बात कहते हैं कि बच्चे तो माता-पिता की आंखों के समान हैं, जिनमें से एक को नहीं चुना जाता मगर यह प्रश्न सुनने में जितना मजाकिया लगता है, इसकी परतों के पीछे उतनी ही गहरी सच्चाई छिपी होती है। क्या ‘फेवरेटिज्म’ या भेदभाव महज एक मजाक है या यह बचपन के उन जख्मों की कहानी है जो बड़े होने के बाद भी नहीं भरते? 

    एक आदर्श या केवल कल्पना

    परिवार वह पहली पाठशाला है जहां बच्चा प्रेम, सुरक्षा और आत्म-सम्मान का पाठ पढ़ता है। माता-पिता का दावा हमेशा यही होता है, ‘हमें तो अपने दोनों बच्चे जान से प्यारे हैं।’ लेकिन वास्तविकता के धरातल पर कई बार व्यवहार में एक सूक्ष्म अंतर आ ही जाता है। कभी उम्र के नाम पर, कभी लिंग के नाम पर, तो कभी काबिलियत के तराजू पर बच्चों को तौला जाने लगता है। भेदभाव हमेशा कड़वे शब्दों में नहीं होता, यह अक्सर छोटे-छोटे व्यवहारों में छिपा होता है।

    जैसे- एक बच्चे के साथ ज्यादा समय बिताना, घर के कामों का बोझ एक पर ज्यादा डालना, भाई-बहनों की लड़ाई में हमेशा एक का पक्ष लेना, एक की उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटना और दूसरे की मेहनत को नजरअंदाज करना। अभिभावक अक्सर एक बच्चे को ज्यादा प्यार नहीं करते, बल्कि एक की तरफ ज्यादा ‘ध्यान’ देते हैं। यही अतिरिक्त ध्यान दूसरे बच्चे के मन में ईर्ष्या का बीज बो देता है।

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    क्यों होता है ‘अनचाहा’ पक्षपात

    कोई भी माता-पिता जानबूझकर अपने बच्चे का दिल नहीं दुखाना चाहते, फिर भी कुछ सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण इस भेदभाव को जन्म देते हैं। जिसमें आज भी कहीं न कहीं छिपा हुआ है रूढ़िवादी सोच। आज भी कई परिवारों में ‘बड़े बेटे’ को भविष्य का मुखिया मानकर सिर पर बिठाया जाता है या फिर ‘पराया धन’ समझकर बेटियों के अरमानों को कम प्राथमिकता दी जाती है।

    हालांकि, इसमें कभी-कभी रिवर्स भी हो जाता है, जहां पिता बेटियों के प्रति अतिरिक्त झुकाव रखते हैं और बेटों को लेकर उतना स्नेह नहीं दर्शाते। जिससे कई बार बेटे भी माता-पिता के साथ ही अपनी बहन के प्रति रोष पाल लेते हैं।  इसी तरह जो बच्चा पढ़ाई में तेज है या माता-पिता की हर बात मानता है या उनके सामने सिबलिंग सीक्रेट भी बता जाता है, वह अनजाने में ही फेवरेट बन जाता है। वहीं कभी-कभी माता-पिता के आपसी झगड़ों के बीच जो बच्चा किसी एक का साथ देता है, वह उस अभिभावक का सबसे करीबी बनता जाता है, जो कि दूसरे बच्चे के लिए खालीपन ले आता है।

    वयस्क जीवन में घातक परिणाम

    बचपन का यह भेदभाव वयस्क जीवन में घातक परिणाम लेकर आता है। साझा स्मृतियों से बनने वाला भाई-बहन का खूबसूरत लगाव ‘वैमनस्य’ और ‘प्रतिस्पर्धा’ की भेंट चढ़ जाता है। जो बच्चा उपेक्षित महसूस करता है, वह जीवनभर कमतर होने के एहसास  से जूझता रहता है।

    आधुनिक मनोविज्ञान में ‘इनर चाइल्ड हीलिंग’ का एक बड़ा हिस्सा इसी भेदभाव के घावों को भरने पर केंद्रित होता जा रहा है। अगर किसी मोड़ पर आपको एहसास हो कि आपने बच्चों से अनजाने में भेदभाव किया है, तो बच्चे चाहे उम्र के किसी भी पड़ाव पर हों, उनसे खुलकर बात करें। उनसे माफी मांगने में संकोच न करें। एक छोटी सी बातचीत बड़े हो चुके बच्चों के मन से सालों पुराना बोझ उतार सकती है!

    ऐसे सुधारें यह भूल

    अगर आप कहीं न कहीं इस तरह का व्यवहार कर रहे हैं, तो इन बदलावों से स्थिति को संभाल सकते हैं:

    • नियम दोनों बच्चों के लिए एक जैसे होने चाहिए। अगर सजा एक को मिलती है, तो छूट भी समान मिलनी चाहिए।
    • तुलना के जहर से बचें। ‘तुम अपने भाई जैसे क्यों नहीं हो?’— यह एक वाक्य बच्चे के आत्मविश्वास को खत्म करने के लिए काफी है।
    • हर बच्चा अपने आप में अलग है। उनकी अपनी खूबियों को सराहें।
    • परिवार के साथ घूमना, खेलना और त्योहार मनाना टीम वर्क की भावना जगाता है, जिससे पक्षपात की गुंजाइश खत्म होती है।

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