सिर्फ महंगी स्कूल फीस काफी नहीं! बच्चों में 'संस्कारों' का निवेश ही देगा सबसे बड़ा रिटर्न
आज के तकनीक-प्रतिस्पर्धा वाले बचपन में अभिभावकों को आधुनिकता और संस्कारों में संतुलन बनाना होगा। ...और पढ़ें

कहीं डिजिटल दुनिया छीन तो नहीं रही आपके बच्चे का बचपन? (Image Source: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जलज कुमार अनुपम, नई दिल्ली। तकनीक और प्रतिस्पर्धा के दबाव में सिमटता जा रहा है आज का बचपन। आगे बढ़ने की इस होड़ में आधुनिकता और संस्कारों के बीच संतुलन बनाना अभिभावकों की जिम्मेदारी है। जलज कुमार अनुपम का मानना है कि यदि आज आप बच्चों में समय, संस्कार और रचनात्मकता का निवेश करेंगे तो उनका भविष्य स्वतः ही सुरक्षित और उज्ज्वल हो जाएगा...

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बचपन में घुल जाएं संस्कार के रंग
समय तेजी से बदल रहा है और इसके साथ बचपन भी बदल रहा है। सवाल यह नहीं कि बदलाव हो रहा है, बल्कि यह है कि क्या इस बदलाव में हम बच्चों के संस्कार बचा पा रहे हैं? आज बच्चों की दुनिया सिर्फ स्कूल और खेल तक सीमित नहीं है। मोबाइल, इंटरनेट और बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने उनके जीवन को काफी व्यस्त बना दिया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस भागदौड़ के बीच बच्चों में अच्छे संस्कार कैसे बनाए रखें। सच तो यह है कि बचपन कच्ची मिट्टी की तरह है, हम उसे जैसा आकार देंगे, भविष्य वैसा ही बनेगा।
व्यक्तित्व के विकास में कला
बचपन जीवन की वह नींव है, जिस पर पूरा व्यक्तित्व खड़ा होता है। इसी उम्र में बच्चे सही गलत समझना सीखते हैं, दूसरों के प्रति संवेदनशील बनते हैं और अनुशासन का महत्व जानते हैं। कला इसमें बड़ी मददगार साबित हो सकती है। अक्सर हम कला (संगीत, चित्रकला, अभिनय) को एक ‘अतिरिक्त गतिविधि' मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। जबकि जब बच्चा चित्र बनाता है, गाना गाता है या मंच पर बोलता है, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। हमें कला को बच्चों की पढ़ाई और विकास का जरूरी हिस्सा मानना होगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि संस्कार वह पूंजी है जो जीवन भर साथ रहती है। संस्कार सिखाए नहीं जाते, दिखाए जाते हैं।

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आज सुरक्षित करें भविष्य
बच्चे किताबों और विरासत से धीरे-धीरे इतना दूर हो जा रहे हैं कि आपको भी यह दूरी धीरे-धीरे मिटानी होगी। उन्हें पुस्तक मेलों, संग्रहालयों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लेकर जाएं, ताकि वे अपनी परंपराओं को समझ सकें । स्कूलों में भी बात करें और यह प्रस्ताव रखें कि बच्चों को भारतीय संस्कृति, कला और सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ा जाए, क्योंकि वहीं से बच्चे मिल-जुलकर रहना और जिम्मेदारी लेना सीखते हैं । जब स्कूल की तरफ से ऐसा कुछ हो, तब बच्चों को भाग लेने के लिए अवश्य प्रेरित करें । इस बात का भी ध्यान रखें कि हर बच्चे की अपनी रुचि होती है, इसलिए तुलना करने के बजाय उसे समझने की कोशिश करें। संस्कारवान और समझदार बच्चे आगे चलकर बेहतर समाज बनाते हैं । हाथों में हुनर और दिल में अच्छे मूल्य होंगे, तो भविष्य अपने आप मजबूत होगा। बस ध्यान रखना है कि आधुनिकता के साथ- साथ बच्चों की मासूमियत और संस्कार भी बने रहें। अगर हमने उनका बचपन संभाल लिया, तो भविष्य खुद संभल जाएगा।
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माता-पिता के लिए जरूरी चेकलिस्ट
- डिजिटल डिटाक्स का समय तय करें, उस दौरान बच्चों से खूब सारी बातें करें।
- सप्ताह में कम से कम दो बार बच्चों को कोई प्रेरक लोककथा, महापुरुषों के प्रसंग या परिवार के अपने पुराने किस्से सुनाएं। इनमें आपके बचपन की यादें, बातें और अनुभव भी हो सकते हैं।
- बच्चे की तुलना करने के बजाय उसकी मेहनत और छोटी-छोटी सफलताओं की सराहना करें ताकि उनमें आत्मविश्वास विकसित हो।
- महीने में एक बार किसी संग्रहालय, पुस्तकालय, बगीचे या ऐतिहासिक स्थल पर ले जाएं। उन्हें अपनी विरासत और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाएं।
जड़ों की ओर हो वापसी
आज शहरों में एकल परिवार बढ़ रहे हैं। पहले दादी-नानी की कहानियां बच्चों को जीवन की छोटी-बड़ी सीख दे जाती थीं । वे कहानियां सिर्फ मनोरंजन नहीं होती थीं, बल्कि रिश्तों की ताकत और अनुभवों की विरासत थीं। कभी कहीं सुना था कि जिस घर में कहानियां खत्म हो जाती हैं, वहां बचपन थोड़ा अकेला हो जाता है। एकल होते परिवारों में अब यह जिम्मेदारी माता-पिता को निभानी होगी। इसके लिए बहुत बड़े प्रयास नहीं करने हैं, बस थोड़ा सा अतिरिक्त समय निकालना है। बच्चों को खिलौने याद नहीं रहते, लेकिन उन्हें दिया गया समय याद रहता है। रोज नहीं तो सप्ताह में ही सही कुछ समय बातचीत या फिर कहानियों के लिए बनाया जा सकता है। बच्चों के साथ बैठकर बात करें, उनकी सुनें, उन्हें लोककथाएं और प्रेरक प्रसंग सुनाएं। मोबाइल का समय कम करके उन्हें किताबें पढ़ने, चित्रकला, संगीत या किसी रचनात्मक काम की ओर प्रेरित करें।
(लोक कला-संस्कृति के चिंतक व युवा साहित्यकार)
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