क्या आपका बच्चा स्कूल के लिए तैयार है? काउंसलर से जानें आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए 40 दिनों का फॉर्मूला
पहली बार स्कूल की दहलीज पर कदम बच्चे के जीवन का बड़ा मोड़ होता है। इस बदलाव को आसान बनाने में क्या हो माता-पिता की भूमिका, बता रही हैं स्कूल काउंसलर कनि ...और पढ़ें

नए सत्र से पहले इन टिप्स से बढ़ाएं बच्चों का आत्मविश्वास (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। नए शैक्षणिक सत्र की आहट के साथ माता-पिता के मन में कई सवाल और चिंताएं जन्म लेने लगती हैं। बाजार नए बैगों और बोतलों से सज गए हैं, लेकिन क्या आपका बच्चा मानसिक रूप से उस बदलाव के लिए तैयार है, जो उसे घर के सुरक्षित सोफे से स्कूल के डेस्क तक ले जाएगा?
इस बारे में स्कूल काउंसलर कनिका मदान बताती हैं कि स्कूल जाने का मतलब सिर्फ नया बैग, कापी-किताबें या बोतल खरीदना नहीं है, बल्कि बच्चे को मानसिक रूप से तैयार करना है। यह बच्चे के आत्मविश्वास को गढ़ने की प्रक्रिया है। धैर्य और सही योजना के साथ, आप अपने बच्चे के क्लासरूम के पहले दिन को यादगार और खुशनुमा अनुभव बना सकते हैं।
समझें चुनौती को
आज के बच्चे पोस्ट-कोविड व्यवहारिक बदलावों से गुजर रहे हैं। क्लासरूम में उनके असहज होने के तीन मुख्य कारण हैं- अनुशासन का अभाव, सीमित सामाजिक दायरा और निर्भरता। घर पर सोने, जागने और खाने का कोई तय समय न होना।
स्कूल का अनुशासित वातावरण उन्हें बंधन लगने लगता है। बाहरी मेल-जोल की कमी के कारण बच्चे भीड़ व शोर से घबरा जाते हैं। हर छोटे काम (जैसे पानी पीना या वाशरूम जाना) के लिए माता-पिता पर निर्भर रहना उन्हें स्कूल में असुरक्षित महसूस कराता है।
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(Picture Courtesy: Freepik)
40 दिनों में करें डिटाक्स
बच्चे को स्क्रीन की लत छुड़ाना स्कूल जाने की तैयारी का पहला कदम है। मानव मस्तिष्क को किसी भी नए व्यवहार में ढलने के लिए 40 दिन की आवश्यकता होती है। सत्र शुरू होने से कम से कम चार से छह हफ्ते पहले स्क्रीन टाइम कम करना शुरू कर दें।
केवल बच्चे को ही फोन से दूर न रखें, बल्कि परिवार के सभी सदस्य दिन का एक घंटा 'नो फोन जोन' घोषित करें। स्क्रीन की जगह बोर्ड गेम्स, पेंटिंग या फिजिकल एक्टिविटी को जगह दें।
खेल-खेल में बढ़ाएं एकाग्रता
क्लासरूम में बैठने के लिए एकाग्रता अनिवार्य है। इसे खेल-खेल में विकसित किया जा सकता है। इसके लिए आप कहानी की एक पंक्ति बोलें और बच्चे से उसे आगे बढ़ाने को कहें।
यह बच्चों को सुनने और सोचने के लिए प्रेरित करता है। ऐसे खेल खेलें जिनमें उन्हें अपनी बारी का इंतजार करना पड़े। इससे उनमें सामाजिक धैर्य विकसित होता है। केवल भाग-दौड़ ही नहीं, बल्कि एक जगह बैठकर किए जाने वाले दिमागी खेलों पर भी जोर दें।
आसान बनाएं दूर जाना
मम्मी-पापा से दूर होने का डर बच्चों में सबसे बड़ा होता है। इसे दूर करने के लिए 'ट्रस्ट बिल्डिंग' यानी भरोसे का निर्माण जरूरी है।इसके लिए कुछ दिन बच्चे को छोटे अंतराल (10-20 मिनट) के लिए किसी भरोसेमंद व्यक्ति के पास छोड़ें।
यदि आपने कहा है कि आप '10 मिनट में आएंगे,' तो ठीक 10 मिनट में वापस आएं। इससे बच्चे के मन में यह विश्वास जगेगा कि दूर जाने का मतलब बिछड़ना नहीं है।
अति से बचें
अक्सर माता-पिता उत्साह या चिंता में स्कूल की इतनी चर्चा करते हैं कि बच्चा डर जाता है। स्कूल को किसी 'बड़ी घटना' की तरह पेश करने के बजाय एक सामान्य दिनचर्या की तरह बताएं।
'वहां बहुत मजा आएगा' जैसे भारी वादे न करें। इसके बजाय कहें, 'चलो देखते हैं वहां क्या-क्या नया सीखने को मिलेगा।' घर के बड़े-बुजुर्गों को भी इस बदलाव का हिस्सा बनाएं ताकि बच्चे को लगे कि पूरा परिवार उसके इस नए सफर में साथ है।