कहीं आपकी सख्ती टॉक्सिक तो नहीं बन गई? बच्चे में दिखें ये 5 वार्निंग साइन तो हो जाएं अलर्ट
बच्चों को अनुशासन में रखने के लिए पेरेंट्स की सख्ती एक हद तक सही होती है, लेकिन इसका हद से ज्यादा होना टॉक्सिक पेरेंटिंग बन जाती है। ...और पढ़ें
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जानें कब आपकी सख्ती बन रही है नुकसानदायक (Picture Credit- AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सख्ती के साथ बच्चों की परवरिश करने वाले माता-पिता का सारा फोकस रूल बनाने, अनुशासन पर होता है। ऐसे पेरेंट्स बच्चों को छूट तो देते हैं लेकिन उम्मीदें इससे कई गुना ज्यादा रखते हैं।
पेरेंट्स इस सख्ती को यह कहते हुए सही करार देते हैं कि वो उसे एक बेहतर भविष्य के लिए तैयार कर रहे हैं। लेकिन सख्ती का यह डोज कब ओवरडोज में बदल जाता है पेरेंट्स को पता नहीं चलता। फिर भी कहीं ना कहीं इसके लक्षण इस तरह सामने नजर आने लगते हैं।
बच्चों के प्रयासों को नकारना
मां-बाप को बच्चे की मेहनत तभी सफल लगती है जब वो उनकी उम्मीदों के अनुसार रिजल्ट देते हैं। इस दौरान बच्चे ने कितनी मेहनत की है या उन्होंने क्या सीखा है उस पर बिलकुल भी ध्यान नहीं देते।
जरूरत से ज्यादा कंट्रोल
सभी पेरेंट्स अपने बच्चों का भला ही चाहते हैं लेकिन कई बार इस भलाई में कंट्रोल ज्यादा नजर आता है। बच्चों को किससे बात करनी चाहिए, किससे नहीं, उन्हें कौन-सा करियर चुनना है, उन्हें क्या पहनना है और उन्हें कहां जाना, ये सबकुछ ही पेरेंट्स अपने हिसाब से तय करना शुरू कर देते हैं। इस तरह के बिहेवियर को वो केयर का नाम देते हैं।
इमोशन दिखाने की परमिशन नहीं मिलती
बच्चे का उदास होना, एंग्जाइटी जैसे इमोशन को टॉक्सिक पेरेंट्स ड्रामे का नाम दे देते हैं। उन्हें लगता है कि बच्चों का इस तरह इमोशन दिखाना उनकी कमजोरी है। वो इसे बच्चे का बहाना मानकर नजरअंदाज करने की भी कोशिश करते हैं। इस तरह लगातार अपनी भावनाओं को दबाने से बच्चों में डिप्रेशन या इमोशनल डिटैचमेंट की समस्या हो सकती है।
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प्यार में भी होती है शर्त
जब तक बच्चा पेरेंट्स की बातों को मानता रहता है या उनके कहे अनुसार ही काम करता है तब तक उसे शाबासी मिलती है। लेकिन इसमें थोड़ी भी गलती हो जाने पर या उनकी बातों को अनसुना करने पर या अपनी चॉइस से कुछ करने पर ताने दिए जाते हैं या सशर्त प्यार या तारीफ मिलती है।
अपनी मर्जी थोपने की कोशिश
हेल्दी कम्युनिकेशन या बातचीत तभी सफल होती है जब यह दोतरफा हो। अगर एक पक्ष हमेशा ही अपनी बात मनवाने पर अड़ा रहे तो फिर कम्युनिकेशन एकतरफा ही रह जाता है। अपनी आवाज उठाने या फिर अपनी बात रखने पर बच्चे को डपट दिया जाता है या फिर चुप रहने की हिदायत दी जाती है।