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    बचपन का वो डर जो बड़े होने पर भी पीछा नहीं छोड़ता, पढ़ें टॉक्सिक पेरेंटिंग कैसे बदल देती है इंसान का व्यक्तित्व?

    By Niharika PandeyEdited By: Harshita Saxena
    Updated: Wed, 14 Jan 2026 03:11 PM (IST)

    अगर किसी का बचपन सही परवरिश में नहीं बीता हो, तो उसका प्रभाव बड़े होने पर भी नजर आता है। बड़े होने पर उनके व्यवहार, इमोशन, सफलता-असफलता, रिश्ते, निर्ण ...और पढ़ें

    बचपन का डर जो वयस्क जीवन में भी पीछा नहीं छोड़ता (Picture Credit- AI Generated)

    बचपन का डर जो वयस्क जीवन में भी पीछा नहीं छोड़ता (Picture Credit- AI Generated)

    HighLights

    1. बचपन में मिली परवरिश का असर व्यक्ति के पूरे जीवन रहता है।

    2. टॉक्सिक पेरेंटिंग वाले बच्चों को दूसरों पर भरोसा करने में कठिनाई होती है

    3. ऐसे बच्चे विवाद से बचने के लिए झूठ का सहारा लेते हैं

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पेरेंटिंग का सबका अपना स्टाइल होता कई मां-बाप सिर्फ सख्ती को ही पेरेंटिंग का सही स्टाइल मानते हैं, तो कई को यह सही नहीं लगता। कई ज्यादा प्रोटेक्टिव होते हैं, तो कई बिलकुल ही बेपरवाह। लेकिन पेरेंटिंग में असंतुलन का असर सिर्फ बचपन में ही नहीं बड़े होने पर भी नजर आता है। आइए जानते हैं टॉक्सिक पेरेंटिंग या इस असंतुलन के उन लक्षणों के बारे में जानते हैं, जो एडल्टहुड में भी देखे जा सकते हैं।  

    इमोशन महसूस नहीं करते

    किसी दुखद या उदासी भरी स्थिति में भी इमोशन्स महसूस नहीं करते या डिस्कनेक्टेड रहते हैं। दरअसल, दिमाग अतीत के उस ट्रॉमा से या स्ट्रेस से सुरक्षित रहने के लिए यह तरीका अपनाता है।

    प्यार में दिखता है खोट

    अगर किसी का बचपन मुश्किलों भरा रहा है तो बड़े होने पर उन्हें लगता है कि वो प्यार के काबिल ही नहीं। उनके दिल के किसी कोने में यह एहसास दबा होता है कि उनकी कोई परवाह नहीं कर सकता। भले ही लोग उनके साथ अच्छा व्यवहार भी क्यों न कर रहे हों।

    नहीं चाहते परिवार

    टॉक्सिक पेरेंटिंग के शिकार बच्चे बड़े होने पर शादी या बच्चे की बात को टालते रहते हैं। उन्हें लगता है कि वो अपने बचपन का ट्रॉमा या दर्द कहीं अपने परिवार पर ही न डाल दें।

    मौजूदगी नहीं जताना चाहते

    बात-बात पर टोकाटाकी करने वाले पेरेंटिंग स्टाइल में बड़े हुए लोग अपनी मौजूदगी दूसरों पर जाहिर नहीं करना चाहते। यदि बचपन में उन्हें बात-बात पर ताने दिए गए हों या उनकी कमियां निकाली गई हों तो बड़े होने पर खुद को जाहिर करने से बचते हैं।

    विवाद से बचने के लिए झूठ का सहारा

    टॉक्सिक पेरेंटिंग के शिकार लोग बड़े होने पर विवाद से बचने के लिए झूठ का सहारा लेते हैं। घर की शांति बनाए रखने या तनाव से बचने के लिए वो ऐसा करते हैं। कई बार अचानक ही उनका यह गुबार बाहर निकल जाता है।

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    नहीं करते भरोसा

    ऐसे मां-बाप के साथ बड़े हुए बच्चे जो बात-बात पर शक करते हैं या उन पर यकीन नहीं करते, बड़े होने पर यह उनके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है। उनके लिए आसानी से दूसरों पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है।

    भूलना चाहते हैं उन यादों को

    जिनका बचपन बुरे माहौल में बीता है वो अपने बचपन की बातों को बड़े होने पर याद नहीं करना चाहते। वो बचपन की उन मेमोरीज को ब्लॉक कर देते हैं या उन पर बात करना पसंद नहीं करते।

    औरों की जरूरत पहले रखते हैं

    ऐसे लोग बार-बार अपनी इच्छाओं को दबाते रहते हैं और दूसरों को खुश रखने में ही अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं। उन्हें दूसरों से मदद मांगना भी पसंद नहीं आता।

    छोटी-छोटी बातें परेशान कर देती हैं

    जब बचपन में पेरेंट्स के मुताबिक चीजें न होने पर सजा मिलती हो तो बड़े होने पर भी यह सोच हावी रहती है। छोटी-सी गड़बड़ी भी पैनिक कर देती है और हर समय अलर्ट मोड पर रखती है।

    आत्मविश्वास की कमी

    जब बचपन में उपलब्धियों या भावनाओं को दरकिनार कर दिया हो तो खुद की क्षमताओं पर ही संदेह होना और निर्णय ना ले पाना इस तरह की पेरेंटिंग का दुष्परिणाम है।