18 की उम्र के बाद बच्चों के बॉस नहीं, दोस्त बनें; ज्यादा रोकटोक से घटने लगता है उनका आत्मविश्वास
कैम्ब्रिज रिसर्च के अनुसार, दिमागी परिपक्वता 32 साल तक आती है, जिसका मतलब है कि 18 से 25 साल के युवा पूरी तरह मैच्योर नहीं होते। माता-पिता को इस दौरान ...और पढ़ें
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बच्चों को आत्मनिर्भर बनने से रोकती है हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। 18 साल की उम्र में युवा कानूनी तौर पर बालिग हो जाता है, लेकिन दिमागी परिपक्वता यानी मैच्योरिटी की कहानी इससे कहीं आगे तक जाती है। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की रिसर्च बताती है कि इंसानी दिमाग की किशोर अवस्था 32 साल तक बनी रहती है।
इसका मतलब यह है कि 18 से 25 की उम्र के बीच युवा पूरी तरह मैच्योर नहीं होते। यह दौर उनके लिए अवसरों से भरा होता है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं होतीं। ऐसे में पेरेंट्स को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए, ताकि बच्चे आत्मनिर्भर बन सके।
क्यों बढ़ रहा है माता-पिता और बच्चों के बीच टकराव
आज के समय में पैरेंट्स और बच्चों के बीच टकराव की सबसे बड़ी वजह यह है कि कई माता-पिता 18 के बाद भी बच्चों पर नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं। रिसर्च बताती है कि जरूरत से ज्यादा दखल देने वाले पैरेंट्स के बच्चों में आत्मविश्वास की कमी देखी जाती है और वे अपनी अलग पहचान बनाने में पीछे रह जाते हैं।
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(AI Generated Image)
बदलता करियर और आत्मनिर्भरता की चुनौत
आज के दौर में महंगे रहन-सहन और तेजी से बदलते करियर ऑप्शन्स के कारण 18–34 साल के 33% युवा आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। मजबूरी में उन्हें माता-पिता के साथ रहना पड़ रहा है। ऐसे में विशेषज्ञ मानते हैं कि पैरेंट्स को बच्चों के बॉस बनने के बजाय उनके दोस्त की भूमिका निभानी चाहिए, ताकि वे खुद फैसले लेना सीख सकें।
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हर वक्त निगरानी से क्यों घटता है आत्मविश्वास?
कई माता-पिता अनजाने में हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग यानी हर वक्त बच्चों की निगरानी करने लगते हैं। इसका असर बच्चों के आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि जब बच्चा होस्टल से पढ़ाई पूरी कर वयस्क होकर घर लौटे, तो उससे घर के खर्च, कामकाज और प्राइवेसी पर खुलकर बात करनी चाहिए। उन्हें टीनएजर नहीं, बल्कि वयस्क की तरह ट्रीट करना जरूरी है।
जिम्मेदारी सिखाने का सही तरीका
अगर माता-पिता बच्चों के हर फैसले खुद लेते रहेंगे, तो वे कभी जिम्मेदार नहीं बन पाएंगे। पेरेंट्स का असली काम बच्चे को अपने ऊपर निर्भर बनाना नहीं, बल्कि उसे इतना सक्षम बनाना है कि वह खुद अपना रास्ता चुन सके। मतभेद होने पर बहस जीतने के बजाय उनके नजरिए को समझना रिश्ते में तनाव आने से बचा सकता है।
आपसी समझ से बनता है सुखी परिवार
रिश्तों में जरूरत से ज्यादा निर्भरता को अक्सर गलत माना जाता है, लेकिन हर निर्भरता खराब नहीं होती। इसे हेल्दी डिपेंडेंसी कहा जाता है। अकेले रहकर हम अपनी पसंद समझना या अपनी बात मजबूती से रखना नहीं सीख सकते। ये गुण रिश्तों के साथ ही विकसित होते हैं।