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कैंची धाम नहीं, उत्तर प्रदेश का ये गांव है नीम करौली बाबा की पहली तपोभूमि! जानिए कैसे पड़ा उनका ये नाम?

Published: Fri, 11 Sep 2026 02:21 PM (GMT+05:30)

नीम करौली बाबा की पहली तपोभूमि कैंची धाम नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले का एक गांव है।

नीम करौली बाबा को कैसे मिला उनका नाम? (Picture Courtesy: Instagram)

नीम करौली बाबा को कैसे मिला उनका नाम? (Picture Courtesy: Instagram)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। नीम करौली बाबा का नाम सुनते ही, दिमाग में सबसे पहले कैंची धाम आता है। लोग इस पवित्र धाम को बाबा की तपोभूमि मानते हैं, लेकिन इनकी पहली तपोभूमि उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के एक गांव में हैं, जहां हुई एक घटना ने एक नए रेलवे स्टेशन की नींव रखी, जिसका नाम नीब करौरी रखा गया। आइए जानें क्या है ये कहानी। 

कैसे मिला नीम करौली नाम?

उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में एक ब्राह्मण परिवार में जन्में लक्ष्मीनारायण यानी नीम करौली बाबा की बचपन से ही अध्यात्म में रुचि थी। मात्र 12 साल की उम्र में उन्होंने सांसारिक मोह-माया का त्याग कर दिया और प्रभु श्रीराम को पाने के लिए खुद को हनुमान जी की भक्ति में लीन कर लिया। 

इसके बाद भक्ति की राह पर चलते हुए, वह गुजरात में एक महंत की शरण में चले गए, जहां उन्हें लक्ष्मणदास नाम मिला। कुछ सालों तक यहां साधना करने के बाद बाबा उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के एक गांव में पहुंचे। इस गांव का नाम नीब करौरी था। बाबा ने इस जगह पर कई सालों तक साधना की और उनकी आलौकिक शक्तियों के कारण गांव वालों ने उन्हें नीब करौरी बाबा कहना शुरू कर दिया। समय के साथ लोग नीब करौरी बाबा को नीम करौली बाबा कहने लगे और आज भी बाबा को इसी नाम से जाना जाता है।

Neeb karori baba

अंग्रेज ने किया बाबा को अपमानित

ये घटना नीब करौरी बाबा के साधना के दिनों की है। एक बार बाबा एक ट्रेन की फर्स्ट क्लास डिब्बे में ट्रेन से सफर कर रहे थे। जब टीटी चेकिंग के लिए आया, तो बाबा के पास टिकट नहीं था। अंग्रेजी अफसर के कहने पर टीटी ने उन्हें ट्रेन से उतार दिया।

बाबा ट्रेन से उतरने के बाद पास में ही जाकर बैठ गए और अपनी साधना करने लगे, लेकिन इसके बाद एक चमत्कार हुआ। ड्राइवर ने ट्रेन चलाने की कोशिश की, लेकिन ट्रेन एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी। इंजन में दोबारा कोयला भरा गया, जांच की गई, लेकिन ट्रेन टस से मस नहीं हुई। 

अंग्रेजी अफसर ने टेके घुटने

जब ट्रेन नहीं चली, तब उसमें मौजूद यात्रियों ने बाबा से दोबारा ट्रेन में आने की विनती की, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसके बाद यात्रियों ने टीटी को बाबा के चमत्कारों के बारे में बताया और उनसे क्षमा मांगने के लिए कहा। यात्रियों के कहने पर टीटी और अंग्रेज अफसर बाबा के पास पहुंचे और उनसे मांफी मांगी। 

बाबा ट्रेन में दोबारा बैठने को राजी हो गए, लेकिन उन्होंने दो शर्तें रखी। पहली शर्त थी कि कभी भी किसी साधु-संत को अपमानित करके ट्रेन से बाहर नहीं निकाला जाएगा और दूसरी कि नीब करौरी गांव, जहां बाबा को उतारा था, वहां एक रेलवे स्टेशन बनाया जाएगा। बाबा की दोनों शर्तें मान ली गईं और उस जगह पर एक नया रेलवे स्टेशन बनाया गया, जिसे नाम नीब करौरी रेलवे स्टेशन के नाम से जाना जाता है। 



Source: 
  • Shri Kainchi Hanuman Mandir Trust