शिव मंदिर की थीम पर सजा Lalbaugcha Raja का दरबार, दिलचस्प है इस पंडाल के शुरू होने की कहानी
मुंबई में 'लालबागचा राजा' का भव्य दरबार भक्तों के लिए खुल गया है, जहां इस बार चांदी की परत चढ़ा एक शानदार मंदिर-थीम वाला पंडाल सजाया गया है।

कैसे शुरू हुआ लालबागचा राजा का दरबार? (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। चारों ओर 'गणपति बप्पा मोरया' का जयघोष, ढोल-नगाड़ों की थाप और आंखों में पूरे साल का इंतजार... जी हां, मुंबई की धड़कन 'लालबागचा राजा' आखिरकार अपने भक्तों के बीच आ गए हैं। 11 सितंबर की शाम 7 बजे जैसे ही बप्पा की भव्य मूरत से पर्दा हटा, पूरा पंडाल आस्था और जश्न के समंदर में तब्दील हो गया।
14 सितंबर से आज गणेशोत्सव का शंखनाद भी हो चुका है। ऐसे में, आइए जानते हैं कि इस बार लालबाग के राजा का दरबार कितना अलौकिक सजा है और आखिर क्या है उनका वो ऐतिहासिक सफर, जिसके लिए भक्त खुशी-खुशी मीलों लंबी कतारों में खड़े रहना अपना सौभाग्य मानते हैं।

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कैसा है इस बार बप्पा का शाही दरबार?
इस साल गणपति बप्पा को एक बेहद ही शानदार शिव मंदिर की थीम वाले पंडाल में विराजमान किया गया है। पंडाल की नक्काशी और बारीकी देखने लायक है। सबसे खास बात यह है कि इस पर चांदी की परत चढ़ाई गई है, जिससे पूरा दरबार किसी शाही महल की तरह जगमगा रहा है।
वहीं अगर बप्पा के रूप की बात करें, तो उन्होंने अपना चिर-परिचित और पारंपरिक अंदाज ही अपनाया है। इस बार लालबाग के राजा ने संतरी रंग की धोती धारण की है। अपने भक्तों पर कृपा बरसाते और आशीर्वाद देते बाप्पा के इस मनमोहक रूप ने हर किसी को मंत्रमुग्ध कर दिया है।
कब से कब तक होंगे बप्पा के दर्शन?
अगर आप भी बप्पा का आशीर्वाद लेना चाहते हैं, तो बता दें कि लालबागचा राजा के दर्शन 14 सितंबर से शुरू होकर 25 सितंबर तक चलेंगे। पूरे 11 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में भक्तों का सैलाब उमड़ने वाला है।

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कैसे शुरू हुआ 'लालबाग के राजा' का दरबार?
मुंबई के पुतलाबाई चॉल में सजने वाले इस पंडाल की कहानी 1900 के दशक से जुड़ती है। उस दौर में परेल का यह लालबाग इलाका कपड़ों की मिलों से भरा हुआ था। यहां 100 से ज्यादा मिलें थीं, जिस कारण इसे 'गिरनगांव' कहा जाता था।
1930 के दशक में जब औद्योगीकरण का दौर आया, तो टेक्सटाइल इंडस्ट्री को बड़ा झटका लगा। यहां का पुराना बाजार बंद हो गया, जिससे स्थानीय व्यापारियों और मछुआरों के सामने रोजी-रोटी का गहरा संकट आ गया। तब परेशान होकर लोगों ने गणपति बाप्पा से मदद की गुहार लगाई। कहते हैं कि बप्पा ने उनकी सुन ली और उन्हें एक नई जगह मिली, जहां आज का मशहूर 'लालबाग मार्केट' बसा हुआ है।
इसी मन्नत के पूरे होने की खुशी में लोगों ने 1934 में 'सार्वजनिक गणेश महोत्सव मंडल' की स्थापना की और बाजार का एक हिस्सा बप्पा की पूजा के लिए समर्पित कर दिया। तभी से लोग इन्हें अपने इलाके का 'राजा' और 'नवसाचा गणपति' यानी मन्नतें पूरी करने वाले गणेश मानते हैं।
मूर्ति बनाने वाले परिवार का है खास पेटेंट
क्या आप जानते हैं कि लालबागचा राजा की ये भव्य मूर्ति हर कोई नहीं बना सकता? शुरुआत से लेकर आज तक इसे सिर्फ 'कंबली परिवार' ही तैयार करता आ रहा है। वही इस मूर्ति का रखरखाव करते हैं और सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस मूर्ति के डिजाइन का पेटेंट भी इसी परिवार के नाम पर दर्ज है।
लालबागचा राजा पर लोगों की इतनी गहरी आस्था है कि वे अपनी मुरादें लेकर नवसाची लाइन में 24 से लेकर 40 घंटे तक बिना थके अपनी बारी का इंतजार करते हैं, ताकि उन्हें अपने राजा की एक झलक करीब से मिल सके।
