MP में अब हिंदी में भी कर सकेंगे यूनानी चिकित्सा की पढ़ाई, गैर-उर्दू छात्रों के लिए खुलेंगे नए अवसर... ऐसा करने वाला पहला राज्य
मध्य प्रदेश यूनानी चिकित्सा की पढ़ाई के लिए किताबें हिंदी में उपलब्ध कराने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। इससे गैर-उर्दू भाषी छात्रों को यूनानी डॉक ...और पढ़ें

HighLights
मध्य प्रदेश यूनानी चिकित्सा पुस्तकें हिंदी में उपलब्ध कराएगा।
गैर-उर्दू भाषी छात्रों को यूनानी डॉक्टर बनने में मदद।
10वीं में उर्दू अनिवार्यता खत्म होने से छात्रों की संख्या बढ़ी।
राज्य ब्यूरो, भोपाल। करियर की राह में भाषा बाधा नहीं बन सकती, इसका बड़ा उदाहरण मध्य प्रदेश के एकमात्र भोपाल स्थित शासकीय यूनानी चिकित्सा महाविद्यालय में देखने को मिल रहा है। यहां स्नातक पाठ्यक्रम (बीयूएमएस) की कुल 75 सीटों में वर्ष 2025-26 में 15 गैर उर्दू भाषी विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। यूनानी चिकित्सा पद्धति का डॉक्टर बनने के लिए किताबें उर्दू में पढ़नी होती हैं। इन 15 विद्यार्थियों ने कभी उर्दू नहीं पढ़ी होने के बाद भी इसे चुना।
नवीन शैक्षणिक सत्र से होगी शुरुआत
इसके पहले वर्ष 2024-25 में सात और 2023-24 में भी इतने ही गैर उर्दू भाषी विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया था। इसी को देखते हुए अब इस शैक्षणिक सत्र से बीयूएमएस की उर्दू पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद करवाकर विद्यार्थियों को उपलब्ध कराया जाएगा। यूनानी चिकित्सा की पुस्तकें हिंदी में उपलब्ध कराने वाला मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य होगा। इसके पहले एमबीबीएस की पुस्तकें हिंदी में उपलब्ध कराने वाला पहला प्रदेश भी मध्य प्रदेश ही बना था।
आयुष विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यूनानी चिकित्सा पद्धति के डॉक्टरों की भर्ती में एससी-एसटी, ओबीसी के अभ्यर्थी नहीं मिलने से पद रिक्त रह जाते हैं। गैर उर्दू भाषी विद्यार्थियों में अधिकतर इन्हीं वर्गों से आ रहे हैं, जिससे यह समस्या भी हल हो जाएगी। दरअसल, भारत सरकार ने वर्ष 2022-23 के बाद प्रवेश नियमों में बदलाव कर दिया है।
अब यह प्रावधान कर दिया गया है कि यूनानी चिकित्सा पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने के लिए दसवीं में उर्दू विषय अनिवार्य नहीं रहेगा। इसके पीछे उद्देश्य यही था कि जो स्कूल में उर्दू की पढ़ाई नहीं करते वे भी यूनानी पद्धति के डाक्टर बन सकें। फिलहाल गैर उर्दू भाषी विद्यार्थियों को प्रथम वर्ष में भाषा के रूप में उर्दू विषय पढ़ाया जाता है। बता दें, यूनानी चिकित्सा पद्धति का एकमात्र शासकीय कालेज भोपाल में हैं, जिसमें स्नातक की 75 सीटें हैं। इंदौर, देवास और बुरहानपुर के तीन निजी कालेजों में कुल 152 सीटें हैं।
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सबसे प्राचीन है यूनानी चिकित्सा पद्धति
यूनानी चिकित्सा पद्धति की शुरुआत आज से लगभग 2500 वर्ष पहले यूनान (ग्रीस) में हुई थी। इसे दुनिया की सबसे पुरानी चिकित्सा पद्धति माना जाता है। सातवीं से 12वीं शताब्दी के बीच अरब देशों और फारस (ईरान) में भी इस पद्धति का विकास हुआ। 11वीं-12वीं शताब्दी के आसपास अरबी और फारसी चिकित्सकों के माध्यम से यह भारत पहुंची।
इस पद्धति को भारत सरकार की आधिकारिक मान्यता है। देश में 10 शासकीय कालेज हैं। शरीर के चार द्रवों रक्त, कफ, पीत पित्त और श्याम पित्त के संतुलन पर यह पद्धति आधारित है। मालिश, भाप, व्यायाम, आहार और औषधि चिकित्सा इस पद्धति में मुख्य हैं।
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चरणबद्ध तरीके से उपलब्ध कराई जाएंगी हिंदी पुस्तकें
यूनानी चिकित्सा की मूल पुस्तकें पहले अरबी भाषा में थीं जिन्हें बाद में फारसी में अनुवादित किया गया। भारत में यह पद्धति आने पर पुस्तकों का अनुवाद उर्दू में कराया गया। अब बीयूएमएस प्रथम वर्ष में लगने वाली तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद किया गया है। इनमें यूनानी चिकित्सा का इतिहास, यूनानी चिकित्सा के सिद्धांत और तर्क एवं दर्शन विज्ञान हैं। शरीर रचना विज्ञान और शरीर क्रिया विज्ञान का हिंदी अनुवाद पहले ही चिकित्सा शिक्षा विभाग कर चुका है, जिसका उपयोग यूनानी चिकित्सा कालेजों में भी किया जा सकेगा।
10वीं कक्षा में उर्दू विषय की अनिवार्यता समाप्त किए जाने के बाद गैर उर्दू भाषी विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है। प्रथम वर्ष में लगने वाली पुस्तकों का उर्दू से हिंदी में अनुवाद भी करा लिया गया है, जिन्हें इसी सत्र से विद्यार्थियों को उपलब्ध कराया जाएगा।
प्रो. (डॉ.) महमूदा बेगम, प्राचार्य, शासकीय यूनानी कॉलेज, भोपाल