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    भोपाल के रहवासी क्षेत्र में अवैध दुकानों पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त प्रहार, सरकार की बनाई समिति भंग; हाईकोर्ट की राहत भी खत्म

    Updated: Thu, 06 Aug 2026 01:19 AM (IST)

    रहवासी इलाके में दो दुकानों पर तालाबंदी कर नगर निगम ने बताया- 100 दुकानों को किया सील, 1000 को भेजे नोटिस। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा - ऐसा नहीं चलेगा, ...और पढ़ें

    सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

    सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

    HighLights

    1. सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल में अवैध व्यावसायिक गतिविधियों पर रोक लगाई।

    2. राज्य सरकार की 10 सदस्यीय समीक्षा समिति भंग, हाईकोर्ट का स्टे रद्द।

    3. नगर निगम को पांच सप्ताह में स्थिति सुधारने का निर्देश दिया।

    डिजिटल डेस्क, भोपाल। राजधानी के रिहायशी इलाकों में बिना अनुमति धड़ल्ले से चल रहीं कमर्शियल गतिविधियों पर सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह ब्रेक लगा दिया है। आवासीय भूखंडों पर अवैध व्यावसायिक निर्माण और नियमों के उल्लंघन पर कड़ा संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च अदालत ने राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री स्तर पर गठित 10 सदस्यीय समीक्षा समिति को भंग कर दिया। साथ ही मप्र हाईकोर्ट द्वारा दुकान संचालकों को दी गई राहत स्टे आर्डर को भी निरस्त कर दिया।

    शीर्ष अदालत ने सख्त लहजे में साफ कर दिया कि जब मामले की सीधी निगरानी सुप्रीम कोर्ट कर रहा है, तो इसके समानांतर कोई अन्य जांच या सरकारी राहत समिति बनाकर कार्रवाई को प्रभावित नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन ने इस मामले में कड़ी नाराजगी व्यक्त की वहीं, अमेकस क्युरी अधिवक्ता एके सिन्हा ने बताया कि नगर निगम निगम द्वारा बंद करवाए गए व्यावसायिक प्रतिष्ठान पुनः खोल दिए गए हैं।

    कागजों पर 100 दुकानें सील, जमीन पर सिर्फ दो

    सुनवाई के दौरान नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उस समय सवाल खड़े हो गए, जब उसकी रिपोर्ट में भारी हेरफेर सामने आया। निगम ने कागजों में 100 दुकानों को सील करने का दावा किया था, जबकि हकीकत यह थी कि महज दो दुकानों पर ही ताले लगाए गए थे। वहीं, एक हजार दुकान संचालकों को नोटिस देने की दलील रखी। इस पर शीर्ष अदालत ने मप्र शासन के अधिवक्ता को फटकार लगाई।

    जब निगम की ओर से हाथ बंधे होने और कार्रवाई न कर पाने की लाचारी जताई गई, तो कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा नहीं चलेगा और कानून का पालन कराने में कोई भी ढिलाई स्वीकार नहीं की जाएगी। पीठ ने भोपाल नगर निगम को पूरे मामले की वास्तविक स्थिति सुधारने के लिए पांच सप्ताह का समय दिया है। अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी।

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    जनता की जीत, व्यापारियों को मास्टर प्लान न बनने का मलाल

    कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अरेरा कालोनी, रोहित नगर और बावड़ियाकलां जैसे इलाकों के रहवासियों में खुशी की लहर है। संयुक्त रहवासी संघर्ष समिति के बैनर तले लंबे समय से आंदोलन कर रहे नागरिकों का कहना है कि आवासीय क्षेत्रों में दुकानें और दफ्तर खुलने से ट्रैफिक जाम, पार्किंग संकट और सुरक्षा संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा हो रही थीं।

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    दूसरी ओर व्यापारी महासंघ ने इस संकट के लिए प्रशासनिक विफलता को जिम्मेदार ठहराया है। व्यापारियों का तर्क है कि बीते 21 सालों से शहर का मास्टर प्लान लागू नहीं हो सका, जिसके चलते व्यावसायिक भूखंड उपलब्ध नहीं हुए और मजबूरी में आवासीय परिसरों से व्यापार चलाना पड़ा।

    नगर निगम माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पूरी तरह पालन करेगा और नियमानुसार ही आगे की कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
    - संस्कृति जैन, आयुक्त, नगर निगम भोपाल

    सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हमारा पक्ष ठीक से प्रस्तुत नहीं किया। यदि सरकार यह तथ्य मजबूती से रखती कि भोपाल में बीते 21 वर्षों से मास्टर प्लान लागू नहीं हुआ है, तो हमें राहत और समय अवश्य मिलता। सरकार को सख्त कार्रवाई से पहले गुजरात माडल या नया मास्टर प्लान लागू करना चाहिए।
    - आनंद सोनी, अध्यक्ष, 10 नंबर व्यापारी महासंघ

    इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त है और कोर्ट ने रहवासी क्षेत्र में व्यावसायिक ठिकाने हटाने की दिशा में आगे बात बढ़ाई है। यह तय हो गया है कि रिहायशी क्षेत्र में कमर्शियल गतिविधियां नहीं होगी।
    पूर्णेंदु शुक्ला, याचिकाकर्ता

    रहवासियों में खुशी की लहर है। सुनवाई में नगर निगम ने अपनी झूटी रिपोर्ट दी। दो दुकानों को सील किया और 100 को सील करने की जानकारी दी। इस पर उनको फटकार पड़ी।
    विवेक त्रिपाठी, रहवासी अरेरा कालोनी