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    दतिया उपचुनाव: केवल सीट नहीं हारी भाजपा, चुनावी रणनीति और संगठन भी कठघरे में

    By balram soniEdited By: Ravindra Soni
    Updated: Mon, 03 Aug 2026 11:40 PM (IST)

    दतिया उपचुनाव में भाजपा की हार ने पार्टी की रणनीति और संगठन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जबकि मुख्यमंत्री सहित कई बड़े नेताओं ने प्रचार किया था। पार ...और पढ़ें

    भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी।

    भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी।

    HighLights

    1. दतिया उपचुनाव में भाजपा को कांग्रेस से लगातार दूसरी हार मिली।

    2. मुख्यमंत्री सहित बड़े नेताओं के प्रचार के बावजूद पार्टी हारी।

    3. हार के बाद भाजपा में भितरघात और टिकट पर सवाल।

    बलराम सोनी, ग्वालियर। दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की हार ने पार्टी के सामने कई राजनीतिक और संगठनात्मक सवाल खड़े कर दिए हैं। यह केवल एक सीट का चुनाव नहीं था, बल्कि भाजपा ने इसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया था। मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल सहित सरकार और संगठन के लगभग सभी बड़े चेहरे चुनाव प्रचार में उतरे, लेकिन इसके बावजूद पार्टी हार गई।

    दिग्गजों की सभाएं भी नहीं बदल सकीं चुनावी हवा

    चुनाव प्रचार के दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बड़ौनी में सभा कर सिंधिया राजघराने और दतिया के पुराने संबंधों का हवाला देते हुए विकास कार्यों का भरोसा दिलाया। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बसई में ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं, विशेषकर दतिया मुख्यालय से दूर बसे गांवों के विकास को प्रमुख मुद्दा बनाया।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उदगवां और उपरायं में सभाएं कर प्रदेश सरकार की योजनाओं के आधार पर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की और कांग्रेस पर तीखे हमले बोले। मतगणना के नतीजों ने संकेत दिया कि इन सभाओं का अपेक्षित चुनावी लाभ भाजपा को नहीं मिल सका।

    हार के बाद भितरघात की चर्चा तेज

    भाजपा की हार के साथ ही संगठन में भितरघात की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं। मतगणना केंद्र पर ही भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी ने इशारों में कहा कि जो लोग भाजपा को मां कहते हैं, उन्हें आत्ममंथन करना चाहिए। इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने भी साफ किया कि पार्टी चुनाव परिणाम की समीक्षा करेगी और यदि किसी स्तर पर अनुशासनहीनता या भितरघात सामने आता है तो संबंधित लोगों पर कार्रवाई की जाएगी।

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    नरोत्तम समर्थकों की निगरानी की बात

    मतगणना के बाद आए परिणाम के बाद हर ओर भीतरघात की चर्चा जोरों पर है। बताया जा रहा है कि मतदान से एक-दो दिन पहले और मतदान के दिन पूर्व गृह मंत्री डा. नरोत्तम मिश्रा के कई समर्थकों निगरानी कराई गई। इनमें भाजपा के कुछ पार्षद, नगर परिषद अध्यक्ष और स्थानीय पदाधिकारी भी शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि इस संबंध में किसी भी स्तर पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन चुनाव परिणाम के बाद संगठन के भीतर यह चर्चा प्रमुखता से चल रही है। माना जा रहा है कि समीक्षा बैठक में यह मुद्दा भी उठ सकता है।

    टिकट बदलने के फैसले पर भी उठे सवाल

    पार्टी नेतृत्व ने डा. नरोत्तम मिश्रा का टिकट बदलने के पीछे अपने आंतरिक सर्वे को प्रमुख आधार बताया था। दावा किया गया था कि सर्वे में नए चेहरे के पक्ष में बेहतर प्रतिक्रिया मिली है लेकिन चुनाव परिणाम ने उस आकलन पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि टिकट परिवर्तन का निर्णय सर्वे के आधार पर लिया गया था और उसके बाद भी पार्टी चुनाव हार गई, तो इसका मतलब है कि या तो पार्टी का आंतरिक सर्वे जमीनी हकीकत को नहीं समझ पाया या फिर संगठन उस आकलन को वोट में बदलने में असफल रहा।

    सरकार-संगठन की पूरी ताकत के बाद भी हार

    चुनाव की एक और खास बात यह रही कि भाजपा ने सरकार और संगठन की पूरी ताकत दतिया में झोंक दी थी। मुख्यमंत्री, दो केंद्रीय मंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, कई मंत्री और संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी लगातार चुनाव प्रचार और बूथ प्रबंधन में सक्रिय रहे। इसके बावजूद पार्टी लगातार दूसरी बार कांग्रेस से पराजित हुई।

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    जनादेश का सबक

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दतिया का जनादेश भाजपा के लिए केवल एक चुनावी हार नहीं, बल्कि संगठनात्मक एकजुटता, टिकट वितरण और स्थानीय नेतृत्व की कार्यशैली पर गंभीर आत्ममंथन का अवसर भी है। दूसरी ओर कांग्रेस इस जीत को 2028 विधानसभा चुनाव से पहले अपने लिए बड़े मनोवैज्ञानिक बढ़त के रूप में प्रस्तुत करने की तैयारी में है।