इंदौर के जंगलों से गायब हो रहे गिद्ध: संख्या में भारी गिरावट, भीषण गर्मी और बदलते पर्यावरण ने बढ़ाई चिंता
इंदौर वनमंडल में महू और रालामंडल जैसे क्षेत्रों से गिद्ध पूरी तरह गायब हो गए हैं, जबकि कभी उनके प्रमुख बसेरे रहे देवगुराड़िया में भी अब केवल एक गिद्ध दिखा।

गिद्ध (प्रतीकात्मक चित्र)

समय कम है?
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डिजिटल डेस्क, इंदौर। प्रदेश में जारी ग्रीष्मकालीन गिद्ध गणना के दौरान इंदौर वनमंडल से चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। शनिवार को हुई गणना में इंदौर-चोरल और मानपुर क्षेत्र को छोड़कर महू और रालामंडल के जंगलों में एक भी गिद्ध दिखाई नहीं दिया। विशेषज्ञ इसे बढ़ती गर्मी, सूखते जलस्रोत और बदलते पर्यावरणीय हालात का असर मान रहे हैं।
गर्मी में नहीं मिल रहा पानी-भोजन
वन विभाग के अनुसार, भीषण गर्मी के चलते जंगलों में पानी की उपलब्धता तेजी से कम हुई है, जिसके कारण गिद्धों ने अन्य क्षेत्रों की ओर पलायन करना शुरू कर दिया है। इसके अलावा जंगलों में मृत मवेशियों की संख्या भी घटने लगी है, जिससे इनके भोजन के स्रोत प्रभावित हुए हैं। अधिकारियों का कहना है कि जंगलों का घनत्व कम होने और प्राकृतिक परिस्थितियों में बदलाव से गिद्धों के लिए अनुकूल वातावरण लगातार सीमित होता जा रहा है।
चार रेंज, 33 स्थान और गिनती में कम दिखे गिद्ध
गिद्धों की गणना के लिए इंदौर वनमंडल की चारों रेंज में कुल 33 स्थान चिह्नित किए गए हैं। तीन दिवसीय इस अभियान के दूसरे दिन इंदौर क्षेत्र में 12 और चोरल क्षेत्र में 46 गिद्ध दर्ज किए गए। वहीं रालामंडल अभयारण्य और महू वनक्षेत्र में सुबह करीब दो घंटे तक खोजबीन की गई, लेकिन वहां एक भी गिद्ध नहीं देखा गया।
जहां कभी गिद्धों का बसेरा था, अब वहां सन्नाटा
करीब पांच-छह वर्ष पहले इंदौर रेंज का देवगुराड़िया क्षेत्र गिद्धों की बड़ी संख्या के लिए जाना जाता था। उस समय ट्रेंचिंग ग्राउंड में कचरा और मृत मवेशियों के अवशेष उपलब्ध होने से यहां गिद्धों की आवाजाही अधिक रहती थी। लेकिन हालात बदलने के साथ इस बार यहां केवल एक गिद्ध दिखाई दिया।
दवा, शहरीकरण और विकास परियोजनाएं भी बनीं वजह
पूर्व वन अधिकारी पीसी दुबे बताते हैं कि पहले पशु चिकित्सकों द्वारा बीमार मवेशियों को दर्द निवारक दवा ‘डाइक्लोफेनेक’ दी जाती थी। ऐसे पशुओं के शव खाने से गिद्धों पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ता था और उनकी किडनी प्रभावित होती थी। इसके अलावा भोजन की कमी और लगातार शारीरिक दबाव ने उनकी प्रजनन क्षमता पर भी असर डाला है।
वहीं, तेजी से बढ़ते शहरीकरण और विकास परियोजनाओं ने भी गिद्धों के प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुंचाया है। ऊंचे पेड़ और चट्टानें, जहां ये घोंसले बनाते हैं, उनकी संख्या घट रही है। सड़क और रेलवे परियोजनाओं के लिए जंगलों की कटाई ने समस्या को और गहरा किया है।
शीतकाल की तुलना में कम हुई संख्या
डीएफओ लाल सुधाकर सिंह के अनुसार, सर्दियों की तुलना में वर्तमान में गिद्धों की संख्या कम दिखाई दे रही है। इसकी प्रमुख वजह जलस्रोतों का सूखना और भीषण गर्मी मानी जा रही है। उन्होंने बताया कि गिद्ध अब ऐसे क्षेत्रों की ओर जा रहे हैं, जहां पानी और भोजन की उपलब्धता बेहतर है।
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