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    MP में 27% OBC आरक्षण पर हाई कोर्ट में बहस: अधिवक्ता बोले- आरक्षण खत्म करें, सरकारी स्कूलों से पढ़ने वालों को दें नौकरी में प्राथमिकता

    Updated: Tue, 04 Aug 2026 10:22 PM (IST)

    मध्य प्रदेश में 27% OBC आरक्षण मामले की सुनवाई के दौरान अधिवक्ता ने आरक्षण खत्म कर सरकारी स्कूल के छात्रों को नौकरी में प्राथमिकता देने का सुझाव दिया। ...और पढ़ें

    -प्रतीकात्मक चित्र।

    -प्रतीकात्मक चित्र।

    HighLights

    1. OBC आरक्षण पर हाई कोर्ट में 14वें दिन सुनवाई जारी रही।

    2. अधिवक्ता ने सरकारी स्कूल के छात्रों को नौकरी में प्राथमिकता का सुझाव दिया।

    3. न्यायमूर्ति ने सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था पर चिंता व्यक्त की।

    डिजिटल डेस्क, जबलपुर। मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत OBC आरक्षण से जुड़े मामलों की सुनवाई मंगलवार को 14वें दिन भी जारी रही। प्रशासनिक न्यायाधीश आनंद पाठक और न्यायमूर्ति विनय सराफ की विशेष युगलपीठ के समक्ष OBC पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने लंबी बहस की।

    सुनवाई के दौरान उन्होंने एक वैकल्पिक व्यवस्था का सुझाव देते हुए कहा कि यदि आरक्षण किसी वर्ग के लिए परेशानी का कारण बन रहा है तो इसे समाप्त कर दिया जाए और ऐसी व्यवस्था बनाई जाए कि कक्षा पहली से 12वीं तक सरकारी स्कूल में पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों को ही सरकारी नौकरी के लिए पात्र माना जाए।

    उनका तर्क था कि ऐसी व्यवस्था लागू होने पर सभी वर्गों के अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए प्रेरित होंगे और इससे शिक्षा व्यवस्था में समानता लाने में मदद मिल सकती है। मामले में बुधवार को अंतिम बहस होने की संभावना है।

    सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर जज ने भी जताई चिंता

    सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति आनंद पाठक ने सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था और गुणवत्ता को लेकर चिंता जताई। उन्होंने ग्वालियर में अपने कार्यकाल के दौरान शुरू हुई 'विद्या दान' पहल का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इस पहल के तहत प्रशासनिक अधिकारियों, IIT से शिक्षित लोगों और समाज के अन्य शिक्षित वर्ग के लोग सरकारी स्कूलों में जाकर बच्चों को पढ़ाते थे। उनके मुताबिक, उस दौरान इंदौर के कलेक्टर समेत कई अधिकारी और शिक्षित लोग भी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने पहुंचे थे।

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    न्यायमूर्ति पाठक ने बताया कि तत्कालीन न्यायमूर्ति शील नागू ने भी इस पहल से जुड़कर बच्चों को पढ़ाने की इच्छा जताई थी। हालांकि कोरोना महामारी के कारण यह पहल आगे जारी नहीं रह सकी।

    2019 के 555 पेज के जवाब को बनाया आधार

    OBC पक्ष ने अपनी दलीलों के दौरान वर्ष 2019 में तत्कालीन सरकार की ओर से हाई कोर्ट में दाखिल 555 पेज के जवाब का भी हवाला दिया। अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर के अनुसार, अगस्त 2019 में प्रदेश सरकार ने 27 प्रतिशत OBC आरक्षण का कानून बनाया था और अक्टूबर 2019 में हाई कोर्ट में विस्तृत जवाब दाखिल कर इसे उचित ठहराने का प्रयास किया था।

    उन्होंने दावा किया कि इसी जवाब में सरकार ने प्रदेश में OBC आबादी करीब 51 प्रतिशत बताई थी।

    अलग से डेटा जुटाने की जरूरत पर उठाया सवाल

    वरिष्ठ अधिवक्ता ने OBC वर्ग की आबादी और सामाजिक स्थिति के लिए अलग से डेटा जुटाने की आवश्यकता पर भी सवाल उठाया। उन्होंने महाजन आयोग और मंडल आयोग की रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि OBC वर्ग की जातियों और उनकी सामाजिक स्थिति से संबंधित पर्याप्त सामग्री पहले से उपलब्ध है।

    उनके अनुसार, महाजन आयोग की रिपोर्ट में मध्य प्रदेश की 92 OBC जातियों का उल्लेख किया गया है। ऐसे में आरक्षण के लिए सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति के आकलन हेतु पहले से उपलब्ध दस्तावेजों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

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    भर्ती में पद होल्ड होने का भी दावा

    OBC पक्ष की ओर से यह भी दावा किया गया कि वर्ष 2019 से 2025 के बीच विभिन्न सरकारी भर्तियों में करीब 13 प्रतिशत OBC और 13 प्रतिशत सामान्य वर्ग के पद होल्ड किए गए। अधिवक्ता ने इससे करीब 60 से 65 हजार अभ्यर्थियों के प्रभावित होने का दावा किया।

    बहस के अंत में OBC पक्ष ने हाई कोर्ट से मौजूदा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए 27 प्रतिशत OBC आरक्षण को बरकरार रखने का आग्रह किया।