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    क्या FCRA विधेयक किसी खास समुदाय के खिलाफ है? जानिए झूठे दावों में कितनी सच्चाई

    Updated: Mon, 10 Aug 2026 10:01 PM (GMT+05:30)

    भारत सरकार ने प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 को लेकर वैश्विक समुदाय में फैली भ्रांतियों को दूर किया है, स्पष्ट किया है कि यह किसी समुदाय के खिल ...और पढ़ें

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    जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (एफसीआरए), 2026 को लेकर न सिर्फ भारत में राजनीतिक गरमागरम चर्चा छिड़ी हुई है, बल्कि अमेरिका समेत कुछ यूरोपीय देशों के नेताओं की ओर से भी इस विधेयक पर सवाल उठाए गए हैं। इस पृष्ठभूमि में भारत की ओर से विधेयक से जुड़ी भ्रांतियों और वास्तविकताओं का पूरा ब्यौरा जारी किया गया है।

    भारत सरकार ने अपनी बात रखने के लिए अमेरिका स्थित भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा को चुना है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि भारत वैश्विक समुदाय को वस्तुस्थिति से अवगत कराने को प्राथमिकता दे रहा है। उक्त विधेयक पर पहली बार सरकार की तरफ से इस तरह की कोशिश हुई है। क्वात्रा ने साफ किया है कि यह विधेयक किसी खास समुदाय या धर्म के खिलाफ नहीं है। साथ ही, ऐसा करने वाला भारत इकलौता देश नहीं है।

    असलियत में अमेरिका ने काफी पहले एफएआरए (1938) और फैटका (2010) जैसे कानून बनाए थे। ऑस्ट्रेलिया ने 2018 में, कनाडा ने 2024 में और ब्रिटेन ने जुलाई 2025 में ऐसे प्रावधान लागू किए हैं। यूरोपीय संघ भी अभी कानून बना रहा है।

    भ्रांति 1: भारत सिविल सोसायटी (एनजीओ व अन्य एजेंसियां आदि) को विदेशी सहायता बंद करने के लिए नया कानून बना रहा है।

    सच्चाई: सार्वजनिक और राजनीतिक क्षेत्रों में विदेशों से आने वाली राशि का विनियमन राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रख कर उठाया गया एक संप्रभु कदम है। यह आधुनिक लोकतंत्रों में आम बात है। भारत में पहला एफसीआरए 1976 में आया था। इसे 2010 में आधुनिक ढांचे से बदला गया और 2016, 2018 तथा 2020 में संशोधनों से मजबूत किया गया।

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    2026 का विधेयक और नियम इसी दिशा में अगला कदम हैं जो ज्यादा पारदर्शिता, बेहतर शासन और स्पष्ट नियम की बात करता है। इससे भारतीयों को विदेशी दान लेने से नहीं रोका जा रहा और न ही कानून का पालन करने वाले सिविल सोसायटी को बंद करता है। हजारों संगठन एफसीआरए के तहत पंजीकृत हैं और स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत, शोध तथा मानवीय कार्यों के लिए नियमित रूप से विदेशी फंड प्राप्त करते हैं।

    भ्रांति 2: एफसीआरए ने एनजीओ और धर्मार्थ संगठनों के कामकाज को बुरी तरह प्रभावित किया है और नया संशोधन उनकी क्षमता को और सीमित कर देगा।

    सच्चाई: असल में भारत में विदेशी धन का प्रवाह घटने के बजाय बढ़ रहा है। पंजीकृत संगठनों को विदेशी योगदान 2010-11 में लगभग 1.2 अरब डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 2.67 अरब डॉलर हो गया है। भारत में 30 लाख से ज्यादा एनजीओ हैं। इनमें से केवल 14,450 के पास एफसीआरए पंजीकरण है।

    यानी सिविल सोसायटी के अधिकांश संगठन इस कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर हैं। एफसीआरए किसी को विदेशी दान, शोध अनुदान या मानवीय सहायता स्वीकार करने से नहीं रोकता। यह सिर्फ तीन बातें मांगता है, पंजीकरण करो, निर्धारित प्रक्रिया से पैसा लो और बताओ कि उसका इस्तेमाल कैसे किया।

    भ्रांति 3: कानून से एनजीओ, धार्मिक चैरिटी, पूजा स्थल, अस्पताल, स्कूल और विदेशी दान पर निर्भर संगठनों की संपत्ति जब्त हो जाएगी।

    सच्चाई: भारत सही अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों का स्वागत करता है और हमेशा से ऐसा कानूनी ढांचा उपलब्ध कराता रहा है जिसमें ये योगदान प्राप्त और उपयोग किए जा सकें। जब पंजीकरण रद्द या सरेंडर होता है, तो विदेशी योगदान और उससे बनी संपत्ति पहले से ही राज्य सरकार के प्राधिकरण के पास निहित हो जाती है। यह व्यवस्था 2010 से लागू है, नई नहीं है।

    2026 का विधेयक सिर्फ उन संपत्तियों की सुरक्षा के लिए एक नामित प्राधिकरण जोड़ता है और वापसी का रास्ता भी देता है। अगर संगठन अपना पंजीकरण बहाल कर लेता है, तो सारी संपत्ति और अनुपयोगी फंड पूरी तरह वापस मिल जाते हैं। पूजा स्थलों के लिए अलग सुरक्षा है। जहां रद्द संगठन ने पूजा स्थल से जुड़ी संपत्ति बनाई हो, वह उसी धर्म के दूसरे एफसीआरए पंजीकृत संगठन को दी जाती है, ताकि पूजा की निरंतरता बनी रहे।

    भ्रांति 4: एफसीआरए किसी खास धर्म या समुदाय को निशाना बनाता है।

    सच्चाई: इससे ज्यादा दूर की बात और कुछ नहीं हो सकती। अधिनियम धर्म, समुदाय या विचारधारा की परवाह किए बिना सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होता है। हर धर्म के संगठनों द्वारा धार्मिक शिक्षा, पूजा स्थलों का रखरखाव और धर्मार्थ कार्य विदेशी फंडिंग के लिए पात्र बने रहते हैं।

    भ्रांति 5: भारत ऐसा करने वाला अकेला देश है।

    सच्चाई: अमेरिका में 1938 से एफएआरए और 2010 से फैटका लागू है। ऑस्ट्रेलिया ने 2018 में, कनाडा ने 2024 में कानून बनाया। ब्रिटेन की योजना जुलाई 2025 से लागू हुई। यूरोपीय संघ अभी कानून बना रहा है।

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