गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज से शुरू हुई राजनीति, अब दूसरी बार बने असम के सीएम... कहानी हिमंत बिस्वा सरमा की
हिमंत बिस्वा सरमा की राजनीतिक यात्रा गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज से शुरू हुई, जहां उन्होंने छात्र राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। ...और पढ़ें

असम में दूसरी बार सीएम बने हिमंत बिस्वा सरमा। (फोटो सोर्स - पीटीआई)
HighLights
कॉटन कॉलेज से शुरू हुई हिमंत की छात्र राजनीति
2021 में पहली बार बने असम के मुख्यमंत्री
2026 में दूसरी बार बने मुख्यमंत्री
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। असम के गुवाहाटी शहर के बीचों-बीच बने कॉटन कॉलेज, पूर्वोत्तर का सबसे पुराना हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूट है। इस कैंपस को बाहर से देखने पर लगता है, जैसे ब्रिटिश काल में बने किसी किले का अवशेष हो लेकिन अंदर घुसो तो किताबों और राजनीति की खुशबू इसके हर कोने में मौजूद है।
कॉटन कॉलेज का असम की राजनीति में कितना दखल है, इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब तक असम के 15 मुख्यमंत्रियों में से 7 इसी एक कॉलेज के छात्र रहे हैं। यहां सिर्फ डिग्री नहीं मिलती है, इसके साथ ही मिलती है राजनीति की हर वह जरूरी सीख जो किसी छात्र को राज्य की राजनीति में सबसे ऊंचे मुकाम तक पहुंचा सकता है।
19 साल की उम्र में राजनीति में रखा कदम
1901 में बना यह कॉलेज, असम को राज्य बनाने से लेकर बांग्ला प्रवासियों के खिलाफ शुरू हुए छात्र आंदोलन का केंद्र रहा है। इस कॉलेज ने जो चेहरे दिए, उनको देखकर लगता है कि असम की राजनीति का आधा इतिहास तो इसी कॉलेज के रजिस्टर में बंद है।

बात 01 फरवरी 1969 की है, असम के जोरहाट में कैलाश नाथ शर्मा और मृणालिनी देवी के घर में एक लड़के का जन्म हुआ। जिसका नाम रखा गया हिमंत बिस्वा सरमा। उस दिन किसे पता था यह लड़का आगे चलकर असम की राजनीति में इतना बड़ा नाम बन जाएगा।
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हिमंत ने अपनी राजनीति की शुरूआत उसी कॉटन कॉलेज से की जहां छात्रसंघ चुनाव भी राज्य के लिए जरूरी खबर बन जाता है। 19 साल के हिमंत जब कॉटन कॉलेज पहुंचे तो उन्होंने एक खास मेहमान की तरह चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू की। धीरे-धीरे हॉस्टल के गलियारों से लेकर चाय की दुकानों तक उनकी चर्चा होने लगी।
राज्य के सबसे ताकतवर संगठन AASU से जीता चुनाव
कॉलेज में सब के जबान पर हिमंत का नाम चढ़ गया था। उनको लेकर उस समय कहा जाता था कि, एक तेज तर्रार लड़का है जो दबंग है और भाषण देने में फायरब्रांड है। छात्रसंघ के चुनाव में सबसे प्रभावशाली पद महासचिव के लिए अपनी दावेदारी पेश कर इस लड़के न सिर्फ राज्य में सबसे ताकतवर संगठन माने जाने वाले AASU से चुनाव जीता। इसके साथ ही माइक्रो लेवल की प्लानिंग का कितना बड़ा असर होता है, यह भी साबित करने का काम किया।
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हिमंत पिछले दो दशक से असम और पूर्वोत्तर की राजनीति में एक धुरी की तरह स्थापित है और कई चुनाव जीत चुके हैं। दूसरों को जिता भी चुके हैं, लेकिन 1987 के उस छात्रसंघ चुनाव को वह अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा इलेक्शन कैम्पेन बताते हैं।
इसके बाद 1992 तक वह तीन बार कॉटन कॉलेज के महासचिव चुने गए। कॉटन कॉलेज का महासचिव बनने के बाद हिमंत बिस्वा सरमा प्रफुल्ल महंत और भृगु फुकन जैसे नेताओं के और करीब आए। महंत और फुकन के साथ हिमंत का जुड़ाव नया नहीं था। महज 10 साल की उम्र से ही हिमंत इन दोनों नेताओं के साथ देखे जाने लगे थे और इसी उम्र में उनकी राजनीतिक यात्रा भी शुरू हो गई थी।
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असम में वंडर बॉय के नाम से है मशहूर
असम छात्र आंदोलन में उन्हें वंडर बॉय कहा जाता है। इन दोनों नेताओं को हिमंत बिस्वा सरमा का शुरुआती राजनीतिक गुरु कहा जाता है। AASU के आंदोलन के दौरान हिमंता ने दोनों नेताओं के सहयोगी के तौर पर काम किया। जोशीले भाषण दिए।
हालांकि, वह कभी असम गण परिषद में शामिल नहीं हुए। अपनी राजनीतिक को आगे बढ़ाने के लिए हिमंत ने आगे चलकर कांग्रेस का दामन थामा और अपना गुरु बनाया तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया को। सैकिया भी, हिमंत और प्रफुल्ल महंत की तरह कॉटन कॉलेज के ही छात्र रहे थे।
1991 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने हितेश्वर सैकिया को एक ऐसे युवा नेता की तलाश थी जो असम आंदोलन के दौरान कांग्रेस से दूर हुए युवाओं को पार्टी से वापस जोड़ सके और उनकी खोज खत्म हुई हिमंता पर। सैकिया ने एक ऐसे युवा पर दांव लगाया था जो महत्वाकांक्षी था और खुलकर मुसीबत लेने को तैयार था।
1996 में लड़ा पहला विधानसभा चुनाव
1994 में हिमंत को छात्र और युवा कल्याण सलाहकार समिति का सदस्य बनाया गया। 1996 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें भृगु फुकन के मुकाबले जालकुबारी से उतार दिया। हिमंता, पहला चुनाव हार गए लेकिन यह पहली और आखिरी हार थी। चुनाव में हार के बाद हिमंता, प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव से मिलने गए। नरसिम्हा राव ने उन्हें एक सलाह दी। हारे हुए उम्मीदवार को अपना क्षेत्र नहीं छोड़ना चाहिए।
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हिमंत ने इसे पूरी गंभीरता से लिया। हारने के बावजूद जालकुबारी विधानसभा में सक्रिय रहे। जिसका नतीजा यह रहा कि, 2001 में कांग्रेस ने उन्हें फिर से गुवाहाटी की जालकुबारी सीट से टिकट दिया। इस बार हिमंत ने अपने गुरु और दिग्गज नेता भृगु फुकन को हराकर उलटफेर कर दिया। इस तरह वह पहली बार विधानसभा पहुंचे और जलकुबारी सीट उनका स्थायी ठिकाना बन गई।
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2001 से लेकर 2021 तक लगातार पांच बार बने विधायक
2001 से 2021 तक लगातार पांच बार हिमंता जालकुबारी सीट से विधायक चुने जा चुके हैं और मार्जिन लगातार बढ़ता ही जा रहा है। पहला चुनाव 10 हजार वोटों से जीतने वाले हिमंत, 2021 में एक लाख 1 हजार वोटों से जीते। इसी सीट से उन्होंने विधायक से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक की यात्रा की लेकिन यह यात्रा आसान नहीं थी।
कभी गोगोई के सबसे खास में से एक थे
1996 में हितेश्वर सैकिया का निधन होने के बाद 2001 में असम में कांग्रेस की सरकार बनी। तरुण गोगोई मुख्यमंत्री बने और पहली बार के विधायक हिमंत बिस्वा सरमा को लाल बत्ती मिली।तरुण गोगोई अगले 15 सालों तक राज्य की सत्ता पर काबिज रहे और हिमंत साल-दर-साल तरक्की की सीढ़ियां चढ़ते रहे। गोगोई सरकार में उन्होंने वित्त, स्वास्थ्य, शिक्षा, जैसे अहम विभागों को संभाला और मुख्यमंत्री के सबसे खास मंत्री बन गए।
ULFA से निपटने, सर्व शिक्षा अभियान मिशन को लागू करने, हेल्थ सेक्टर के विकास और दूसरे डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के लिए वह गोगोई के सबसे भरोसेमंद आदमी थे। वह गोगोई सरकार के लिए संकटमोचक और प्रबंधक की भूमिका में भी थे। हिमंत अपने विधानसभा क्षेत्र में तो सक्रिय रहते ही थे साथ ही सरकार में सक्रिय रहते थे।
2011 में कांग्रेस को दिलाई थी बंपर जीत
यहां तक कि पार्टी के संगठन में भी उनका पूरा दखल रहता था। 2006 के विधानसभा चुनाव में उनकी रणनीतियों की तारीफ हुई। 2011 में भी उन्होंने कांग्रेस के चुनाव अभियान का प्रबंधन किया और पार्टी को 126 में से 78 सीटें जीतने में मदद की।
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इस दौरान उन्हें मुख्यमंत्री के पीछे की असल ताकत के तौर पर देखा जाता था। तरुण गोगोई ही नहीं, पूर्व मुख्यमंत्रियों हितेश्वर सैकिया और प्रफुल्ल महंत भी हिमंता के इस रणनीतिक कौशल को पहचानते थे। तीनों ही मुख्यमंत्रियों के साथ काम करते हुए हिमंता ने खुद को उस पद के लिए तैयार किया जो वह शुरू से चाहते थे।
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गोगोई ने अपने बेटे का नाम आगे किया तब शुरू हुआ टकराव
असम के मुख्यमंत्री का पद और यहीं से टकराव भी शुरू हुआ। वह खुद को तरुण गोगोई की सरकार में नंबर दो की तरह पेश करने लगे। 2011 में सत्ता में वापसी के बाद टकराव खुलकर सामने आ गया।
सरमा को मुख्यमंत्री पद मिलने की उम्मीद थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर भी हिमंता ने इस भरोसे के साथ उम्मीद नहीं छोड़ी कि गोगोई के बाद वही उत्तराधिकारी हैं लेकिन जब तरुण गोगोई ने अपने बेटे गौरव गोगोई को अपने उत्तराधिकारी के तौर पर पेश करना शुरू किया तब यह टकराव, बगावत में बदल गया।
हिमंत की बगावत से बदली तस्वीर
2011 में हुए विधानसभा चुनावों की जिम्मेदारी हिमंत के कंधों पर थी। नतीजे पक्ष में आए तो उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलने की उम्मीद थी लेकिन तरुण गोगोई एक बार फिर असम के मुख्यमंत्री बने। बाद में हिमंत ने कहा कि यह सफलता, गोगोई के सिर चढ़ गई थी। उन्होंने अपने बेटे को आगे बढ़ाना शुरु कर दिया।
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तरुण गोगोई के बेटे गौरव विदेश से पढ़ाई कर लौटे थे। 2011 में वह चुनाव प्रचार में शामिल हुए। 2012 में औपचारिक तौर पर कांग्रेस में शामिल हुए। धीरे-धीरे सीनियर गोगोई ने अपने बेटे को अपने उत्तराधिकारी के तौर पर प्रोजेक्ट करना शुरू कर दिया। यह हिमंत की महत्वाकांक्षाओं को सीधी चुनौती थी।
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2014 में मंत्री पद से दे दिया इस्तीफा
इस बीच हिमंत ने दिल्ली में अर्जी लगाई। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिले। सोनिया गांधी ने उनकी बात सुनी। सोनिया गांधी और अहमद पटेल, नेतृत्व परिवर्तन के पक्ष में थे। यानी असम की सत्ता, हिमंत को देने के पक्ष में थे लेकिन पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को यह मंजूर नहीं था।।
2013-14 के बीच, हिमंत ने सोनिया और राहुल के साथ कई बार बैठकें की। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली आए। मोदी लहर का असर असम में भी हुआ। जहां कांग्रेस को 14 में से महज तीन सीटों पर जीत मिली। इसके बाद हुए नगर निगम चुनावों में भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। हिमंत ने हाईकमान को संदेश दिया कि गोगोई अपनी पकड़ खो रहे हैं।
हालांकि इससे भी कोई बात नहीं बनी और जुलाई 2014 में हिमंत ने 38 विधायकों के साथ मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। हिमंत ने खुलकर गोगोई के नेतृत्व का विरोध किया और कहा, "मुझे तरुण गोगोई के नेतृत्व पर कोई भरोसा नहीं है। हम अपनी पार्टी के लिए लड़ रहे हैं और गोगोई के नेतृत्व में 2016 में कांग्रेस की सीटें घटकर सिंगल डिजिट पर आ जाएंगी।"
भाजपा में अमित शाह ने दिलाई एंट्री
इसके बाद हिमंत की एंट्री बीजेपी में हुई। यह जितना सुनने में आसान लगता है, उतना था नहीं। इन सब के बावजूद अमित शाह उनके नाम पर राजी थे। हिमंत के ऊपर इस दौरान कई आरोप लगाए गए लेकिन उन्होंने सब को खारिज किया और 21 अगस्त 2015 को औपचारिक तौर पर वह बीजेपी में शामिल हो गए।
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इसके बाद 2016 में विधानसभा के चुनाव हुए। अभूतपूर्व जनादेश के साथ बीजेपी ने पहली बार असम में सरकार बनाई। हिमंत का एक लक्ष्य इस दौरान पूरा हुआ। तरुण गोगोई को सत्ता से बेदखल करने का लेकिन अभी उनके हिस्से का इंतजार खत्म नहीं हुआ था। इसके लिए हिमंत को पांच साल और इंतजार करना पड़ा।
2021 में पहली बार बने मुख्यमंत्री
इसके बाद आया उनके जीवन का ऐतिहासिक दिन 10 मई 2021। उनके बरसों की प्रतीक्षा पूरी हुई। गुवाहाटी के श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र में हिमंत बिस्वा सरमा ने असम के 15वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
मुख्यमंत्री बनने के बाद हिमंत का तेजी से उभार हुआ। हिंदूवादी नेता के तौर पर, उनके बयान, कामकाज के तरीकों में इसकी छाप खुलकर दिखने लगी। अब 12 मई 2026 को वह दूसरी बार असम के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने वाले है।