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    पाइपलाइन पहुंची, लेकिन गैस चालू नहीं; पीएनजी विस्तार की रफ्तार क्यों हुई धीमी?

    Updated: Tue, 19 May 2026 08:26 PM (IST)

    भारत में स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने के लिए चल रहे पीएनजी विस्तार अभियान की गति धीमी पड़ गई है। प्रशिक्षित गैस प्लंबरों की कमी, कमजोर उपभोक्ता मांग और ...और पढ़ें

    पाइपलाइन पहुंची, लेकिन गैस चालू नहीं।             (यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है)

    पाइपलाइन पहुंची, लेकिन गैस चालू नहीं। (यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है)

    HighLights

    1. प्रशिक्षित गैस प्लंबरों की भारी कमी बड़ी चुनौती।

    2. 60 लाख से अधिक घरों में पीएनजी कनेक्शन निष्क्रिय।

    3. कमजोर उपभोक्ता मांग और बिखरे ऑर्डर से लागत बढ़ी।

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। देश में स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार बड़े स्तर पर पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) नेटवर्क का विस्तार कर रही है, लेकिन यह महत्वाकांक्षी अभियान अब कई चुनौतियों से जूझता दिखाई दे रहा है।

    शहर गैस वितरण (CGD) कंपनियां फिलहाल प्रतिदिन केवल 8,000 से 10,000 नए पीएनजी कनेक्शन ही जोड़ पा रही हैं, जबकि पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय का लक्ष्य रोजाना एक लाख नए कनेक्शन देने का है।

    उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारियों की भारी कमी, कमजोर उपभोक्ता मांग और कई क्षेत्रों में बिखरे हुए ऑर्डर इस अभियान की गति को धीमा कर रहे हैं।

    प्रशिक्षित गैस प्लंबरों की भारी कमी

    सीजीडी कंपनियों के अधिकारियों के अनुसार सबसे बड़ी समस्या प्रमाणित गैस प्लंबरों की कमी है। पीएनजी इंस्टॉलेशन में विशेष तकनीकी दक्षता और सुरक्षा मानकों का पालन जरूरी होता है, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में प्रशिक्षित कर्मी उपलब्ध नहीं हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सरकार की तेजी समझ में आती है, लेकिन मौजूदा समय में इसके लिए जरूरी इकोसिस्टम तैयार नहीं है।

    दिल्ली-एनसीआर, मुंबई और अहमदाबाद जैसे बड़े शहरों में स्थिति भी और गंभीर हो गई है। चुनावी गतिविधियों और अन्य कारणों से बड़ी संख्या में प्लंबर अपने गृह राज्यों को लौट गए हैं, जिससे कामकाज प्रभावित हुआ है। एक अन्य अधिकारी ने कहा कि वर्तमान हालात में तय लक्ष्य हासिल करना संभव नहीं दिख रहा क्योंकि प्रमाणित गैस प्लंबर उपलब्ध ही नहीं हैं।

    पानी के प्लंबरों को देकर प्रशिक्षण पूरा करने की कोशिश

    कर्मचारियों की कमी को देखते हुए सीजीडी कंपनियां अब पानी के प्लंबरों की भर्ती कर उन्हें तीन से चार सप्ताह के त्वरित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए गैस पाइपलाइन इंस्टॉलेशन का काम सिखा रही हैं।

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    हालांकि कंपनियों का मानना है कि इतने कम समय का प्रशिक्षण सुरक्षा और तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरतों को पूरी तरह पूरा नहीं कर पा रहा। पीएनजी नेटवर्क में किसी भी प्रकार की लापरवाही सुरक्षा के लिहाज से गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है।

    लक्ष्य से काफी पीछे कंपनियां

    अब तक देश में लगभग 1.6 करोड़ पीएनजी कनेक्शन दिए जा चुके हैं, जबकि निर्धारित लक्ष्य के अनुसार यह संख्या करीब 4 करोड़ होनी चाहिए थी। सरकार ने वर्ष 2030 तक 12.5 करोड़ से अधिक पीएनजी कनेक्शन देने का लक्ष्य तय किया है, लेकिन मौजूदा रफ्तार को देखते हुए उद्योग विशेषज्ञ इसे बेहद चुनौतीपूर्ण मान रहे हैं।

    पाइपलाइन पहुंची, लेकिन गैस चालू नहीं

    कंपनियों के सामने केवल कनेक्शन देने की चुनौती नहीं है, बल्कि उपभोक्ताओं को सक्रिय उपयोगकर्ता बनाना भी बड़ी समस्या बनता जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार 60 लाख से अधिक घर ऐसे हैं जहां पाइपलाइन बिछ चुकी है, लेकिन उपभोक्ताओं ने अब तक सेवा शुरू नहीं कराई है। इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे है, जैसे-

    • किराये के मकानों में मकान मालिकों की उदासीनता
    • सिक्योरिटी डिपॉजिट और दस्तावेजी प्रक्रियाएं
    • उपभोक्ताओं की कम रुचि
    • इंस्टॉलेशन में देरी

    एक अधिकारी ने बताया कि मकान मालिक किरायेदारों के लिए अतिरिक्त औपचारिकताएं पूरी करने से बचना चाहते हैं।

    बिखरी मांग से कंपनियों की लागत बढ़ी

    सीजीडी कंपनियों का कहना है कि कई इलाकों में मांग बहुत बिखरी हुई है। यानी कुछ घरों में आवेदन हैं, लेकिन आसपास पर्याप्त संख्या नहीं होने से इंस्टॉलेशन टीम भेजना व्यावसायिक रूप से लाभकारी नहीं रहता। एक अधिकारी ने बताया कि यदि ऑर्डर अलग-अलग जगहों पर हों तो टीम भेजने की लागत बढ़ जाती है, जिससे रोलआउट और धीमा पड़ जाता है।

    स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य पर असर की आशंका

    पीएनजी को सरकार स्वच्छ और अपेक्षाकृत सस्ता ईंधन मानते हुए तेजी से बढ़ावा दे रही है। इसका उद्देश्य एलपीजी और पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता कम करना, प्रदूषण घटाना और गैस आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है।

    लेकिन मौजूदा चुनौतियों ने इस महत्वाकांक्षी योजना की रफ्तार पर सवाल खड़े कर दिए हैं। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशिक्षित मानव संसाधन, उपभोक्ता जागरूकता और स्थानीय स्तर पर मांग को मजबूत करने पर जल्द काम नहीं हुआ, तो 2030 का लक्ष्य हासिल करना कठिन हो सकता है।

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