ईरान युद्ध के बावजूद समुद्र में काम करने का जोखिम क्यों उठा रहे हैं भारतीय नाविक?
ईरान युद्ध के कारण भारतीय नाविक समुद्र में जानलेवा खतरों का सामना कर रहे हैं, जहां मिसाइल हमलों में कई भारतीय नाविकों की जान जा चुकी है। ...और पढ़ें

समुद्र में काम करने का जोखिम क्यों उठा रहे हैं भारतीय नाविक(फोटो: रॉयटर्स)

समय कम है?
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भूमिहीन भारतीय किसानों के घर जन्मे सुनील पूनिया ने सोचा था कि समुद्र की नौकरी गरीबी के जाल से बाहर निकाल देगी। लेकिन उनकी पहली ही समुद्री यात्रा बुरे सपने में बदल गई, जब ईरान युद्ध के कारण हुए घातक हमले से बचने के लिए उन्हें सीधे समुद्र में छलांग लगानी पड़ी।
भारत के लाखों युवाओं के लिए मर्चेंट नेवी की नौकरियां तमाम खतरों के बावजूद आज भी कमाई का एक बहुत बड़ा और आकर्षक जरिया बनी हुई हैं। पूनिया के जहाज पर हुए इस हमले में उनके दो भारतीय साथियों की जान चली गई। मिडिल ईस्ट में जारी इस युद्ध में मर्चेंट नेवी के हताहत होने वाले नाविकों में सबसे बड़ी संख्या भारतीयों की ही है।
1 मार्च को ओमान के खसाब बंदरगाह के पास एक तेल टैंकर पर मिसाइल दागकर हमला किया गया था। इस संघर्ष में जान गंवाने वाले पहले भारतीय दलीप सिंह और आशीष कुमार सिंह थे।

जहाज पर गिरी मिसाइल
सुनील पूनिया ने उस खौफनाक मंजर को याद करते हुए बताया कि एक बहुत जोरदार आवाज हुई और पूरा जहाज हिल गया। मुझे लगा कि शायद इंजन में कोई खराबी आ गई है, लेकिन असल में हमारे जहाज पर मिसाइल गिरी थी। पूनिया पलाऊ के ध्वज वाले जहाज एमवी स्काईलाइट पर तैनात थे। उन्होंने आगे कहा कि देखते ही देखते पूरा जहाज आग की लपटों में घिर गया।
समाचार एजेंसी एएफपी के अनुसार, 26 वर्षीय पूनिया और दलीप एक साथ ही दुबई गए थे, जहां से वे इस टैंकर पर सवार हुए। अब भारत लौट चुके पूनिया ने बताया कि सबने लाइफ जैकेट पहनी और समुद्र में कूद गए। मैंने दलीप को बहुत आवाजें दीं, लेकिन वह उस भयानक आग की चपेट में आ चुका था।
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मर्चेंट नाविकों की मौत
शिपिंग मंत्रालय के अनुसार, भारत दुनिया भर में मर्चेंट शिपिंग में नाविकों का योगदान देने वाले सबसे बड़े देशों में से एक है। साल 2025 तक दुनिया भर के समुद्रों में 3 लाख 20 हजार से अधिक भारतीय नाविक सक्रिय थे। अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन के मुताबिक, इस संघर्ष में अब तक 11 मर्चेंट नाविकों की मौत हो चुकी है, जिनमें से कम से कम चार भारतीय थे।
दरअसल, संयुक्त राज्य अमेरिका और इजरायल द्वारा 28 फरवरी को किए गए हमलों के बाद से ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाले जहाजों के आवागमन पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। यह वह समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया के कुल तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस की सप्लाई का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। इसके जवाब में अमेरिका ने भी ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकेबंदी कर दी है।

मिसाइलों की बौछार
ब्रिटिश समुद्री सुरक्षा मॉनिटर यूकेएमटीओ के अनुसार, इस क्षेत्र में दर्जनों ऐसी घटनाएं हुई हैं जहां जहाजों पर मिसाइलें दागी गईं या गोलीबारी की गई। बीते 13 मई को सोमालिया से पशुधन ले जा रहे एक भारतीय ध्वज वाले जहाज पर हमला हुआ, जिससे वह ओमान के तट के पास डूब गया।
हालांकि, राहत की बात यह रही कि चालक दल के सभी 14 सदस्यों को सुरक्षित बचा लिया गया। होर्मुज जलडमरूमध्य की इस नाकेबंदी के कारण लगभग 20,000 नाविक समुद्र में फंसे हुए हैं, जिनमें हजारों भारतीय शामिल हैं।
फॉरवर्ड सीमेन यूनियन ऑफ इंडिया के महासचिव मनोज यादव का कहना है कि युवा सिर्फ रोजी-रोटी कमाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि हमारे देश में बेरोजगारी की एक बहुत बड़ी समस्या है।
जहाज पर काम करना कई लोगों के लिए इस दलदल से निकलने का एक आसान रास्ता है, क्योंकि इसमें शैक्षणिक योग्यता के मुकाबले काफी अच्छी सैलरी मिल जाती है।
कर्ज, उम्मीदें और टूटते सपने
राजस्थान से आने वाले 25 वर्षीय दलीप सिंह एक हाई-स्कूल पास युवा थे। वह जहाज पर इंजीनियरिंग सपोर्ट सदस्य के रूप में अपनी दूसरी यात्रा पर थे। उनके छोटे भाई मनोज सिंह ने रोते हुए बताया, "वह सालों तक सरकारी नौकरी की तैयारी करता रहा, लेकिन सफलता नहीं मिली।
अपने परिवार को एक बेहतर जिंदगी देने के लिए बेताब दलीप ने कर्ज लेकर मर्चेंट नेवी के ट्रेनिंग प्रोग्राम में दाखिला लिया और आखिरकार एक मर्चेंट शिप पर नौकरी हासिल कर ली। दलीप की सैलरी 450 डॉलर प्रति माह थी, जो भारत के किसी ग्रामीण परिवार की औसत आय से करीब तीन गुना ज्यादा है।

दिल का दौरा पड़ने से पिता का निधन
पत्थर काटने का काम करने वाले उनके छोटे भाई मनोज सिंह भी दलीप के नक्शेकदम पर चलते हुए मर्चेंट नेवी में जाने की उम्मीद लगाए बैठे थे, लेकिन इस हादसे के बाद इरादा बदल दिया है। मनोज ने कहा कि भाई की मौत की खबर सुनकर मेरे पिता को ऐसा सदमा लगा कि उनका दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। अब मैं अपना घर छोड़कर कहीं नहीं जा सकता।
बिहार के रहने वाले जहाज के कप्तान 38 वर्षीय आशीष कुमार सिंह के परिवार में भी मातम पसरा हुआ है। उनकी पत्नी अंशु कुमारी ने सरकार से गुहार लगाते हुए कहा कि मैं बस इतना चाहती हूं कि सरकार मेरे पति के पार्थिव शरीर को वापस लाने में मेरी मदद करे। इसके बिना मुझे और मेरे परिवार को शांति कैसे मिलेगी?
मौत के साए में भी डटे रहने की जिद
राजस्थान के ही रहने वाले 33 वर्षीय राजू राम अप्रैल से संयुक्त अरब अमीरात के फुजैराह बंदरगाह पर एक टैंकर में सवार हैं और होर्मुज जलडमरूमध्य को पार करने का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने अपने जहाज के पास मिसाइलों की भारी बौछार देखी है।
उन्होंने फोन पर एएफपी को बताया कि बेशक यह बेहद खतरनाक है। लेकिन कम से कम जो पैसा हम घर भेजते हैं, उसकी वजह से हमारे परिवारों को समाज में सम्मान तो मिलता है।
सुनील पूनिया का कहना है कि उनके पास अब कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। उन्होंने कहा कि हमारे जैसे लोगों को भारत में जो नौकरियां मिलती हैं, उनमें आप हमेशा कर्ज के जाल में फंसे रहते हैं। इस काम में कम से कम पैसा तो अच्छा है।