ईरान-अमरिका और इजरायल युद्ध का ग्लोबल एनर्जी पर असर, दुनिया को लंबे समय तक करना होगा ऊर्जा संकट का सामना
ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच संघर्ष के कारण दुनिया को लंबे समय तक ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ेगा। शांति वार्ता विफल रही है। विशेषज्ञों का मानना है ...और पढ़ें

ईरान-अमरिका और इजरायल का ग्लोबल एनर्जी सेक्टर पर असर। (रॉयटर्स)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। ईरान पर अमेरिका और इजरायल के साझा हमले के बाद दुनिया को ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ रहा है। संकट को खत्म करने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान में शांति वार्ता का आयोजन किया गया, जो कि विफल रही।
न तो अस्थायी सीजफायर और न ही ईरान युद्ध की समाप्ति वैश्विक ऊर्जा संकट और कीमतों को तुरंत पुरानी में पहुंचा सकता है। इसके लिए लंबा इंतजार करना पड़ेगा।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर ईरान युद्ध समाप्त भी हो जाए और अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी सीजफायर भी लागू हो जाए तो भी वैश्विक ऊर्जा संकट और तेल की कीमतों को कम करने में काफी वक्त लगेगा। आइए जानते हैं वो 6 कारण जो इस धारणा को और मजबूती दे रहे हैं।
तेल की कमी
ईरान युद्ध के बाद से दुनिया तेल संकट का सामना कर रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जी एजेंसी के प्रमुख फातिह बिरोल का कहना है कि यह स्थिति अप्रैल की स्थिति मार्च के अधिक खराब होगी। क्योंकि फारस की खाड़ी से एक तेल टैंकर को अपने खरीदारों तक पहुंचने में औसतन डेढ़ महीना लगता है, युद्ध ठीक डेढ़ महीना पहले शुरू हुआ था, जिसका वास्तविक असर अब देखने को मिलेगा। इसकी वजह से महंगाई बढ़ेगी और आर्थिक विकास धीमा हो जाएगा।
गंभीर गैस संकट
यु्द्ध के बाद से दुनिया भर में गैस का संकट शुरू हो गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ रहा है। फातिह बिरोल का कहना है कि युद्ध की वजह के पूरे गैस उद्योग की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा है।
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एलएनजी को एक भरोसेमंद और आसानी से मिलने वाले विकल्प से रूप में प्रस्तुत किया गया था, लेकिन दुनिया 2022 में गैस संकट में फंसी और अब कतर की गैस का संकट। एलएनजी की आपूर्ति में तेजी से सुधार संभव नहीं है। फिलहाल भविष्य अनिश्चित है, जिसकी वजह से गैस की कीमतें कई महीनों तक ऊंची बनी रहेंगी।
उत्पादन को नॉर्मल करने में लगेगा लंबा समय
IAEA के अनुसार, युद्ध के दौरान मिडिल ईस्ट में मौजूद 40 से अधिक तेल और गैस संयंत्रों को हमले से नुकसान पहुंचा है। कतर के रास लाफान गैस फील्ड में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। कतर के अधिकारियों के अनुसार, इस तरह के उपकरण खास तौर पर बनाए जाते हैं, जिनका कोई विकल्प नहीं होता है। इसलिए इनकी मरम्मत में महीनों नहीं, कई कई साल लग सकते है, जो तीन से पांच साल तक हो सकता है।
सरकारों को सामने दोहरा संकट
ईरान युद्ध के बाद से सरकारों पर दोहरा संकट है। एक तरफ बढ़ती महंगाई और दूसरी तरफ सार्वजनिक कर्ज और बजट घाटा भी अधिक है। धीमी आर्थिक वृद्धि से सरकारों को टैक्स से होने वाली कमाई कम होती है और आर्थिक सहायता की संभावना सीमित हो जाती है, जबकि महंगाई ब्याज दरों में कटौती को रोकती है।
रणनीतिक तेल भंडार
युद्ध के कारण शुरू हुए तेल संकट के दूर करने के लिए पश्चिमी देशों ने अपने रणनीतिक तेल भंडार से 40 करोड़ बैरल तेल जारी करने का फैसला किया। युद्ध के कारण मिडिल ईस्ट से रोज 10 से 12 करोड़ बैरल तेल बाजार में नहीं पहुंच पाया। रणनीतिक भंडार इसकी भरपाई के लिए रोज 3 से 4 करोड़ बैरल तेल जारी करते हैं। लेकिन ये उपाय केवल 4 से 5 महीनों के लिए ही पर्याप्त है, उसके बाद फिर से इस भंडार को भरना होगा।
दोबारा युद्ध शुरू होने का डर
अमेरिका और ईरान के बीच अस्थायी युद्धविराम हुआ है, युद्ध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। किसी भी देश की उकसावे भरी कार्रवाई इस युद्ध को दोबारा भड़का सकती है। यह समस्या अब सिर्फ होर्मुज तक सीमित नहीं रहेगी, अब लाल सागर पर भी संकट मंडरा रहा है। अगर युद्ध दोबारा शुरू होता है तो दुनिया को बहुत बड़े ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ेगा।