दाऊद के 'फाइनेंसर' खनानी ब्रदर्स: अरबों के नकली नोट और हवाला का काला धंधा, जिसे नोटबंदी ने कर दिया कंगाल
कराची की एक गली से निकलकर 16 अरब डॉलर का 'हवाला साम्राज्य' खड़ा करने वाले खनानी ब्रदर्स, आखिर दाऊद के 'मनी मशीन' कैसे बने और फिर एक रात में कैसे अरबों ...और पढ़ें

खनानी ब्रदर्स का वो 'काला साम्राज्य', जिसे नोटबंदी ने मिट्टी में मिला दिया। ग्राफिक्स- अमन कुमार, जागरण।
HighLights
खनानी ब्रदर्स ने दाऊद के लिए नकली नोट, हवाला नेटवर्क चलाया।
अमेरिकी एजेंसियों ने अल्ताफ को गिरफ्तार किया, भारत ने नोटबंदी की।
नोटबंदी से जावेद का नकली नोटों का धंधा पूरी तरह ठप।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। फिल्म धुरंधर-2 यानि Dhurandhar: The Revenge का वो सीन, जहां हमजा अली मजारी यानी रणवीर सिंह, खनानी ब्रदर्स में से एक जावेद खनानी का खात्मा करता है। यह सिर्फ सिनेमाई रोमांच पैदा नहीं करता है, बल्कि एक ऐसी हकीकत की झलक भी दिखाता है, जो पर्दे पर चल रही फिल्म से कहीं ज्यादा स्याह और खतरनाक थी।
'पैसा बैंक से नहीं, रास्तों से चलता है..और वो रास्ते हमारे हैं', धुरंधर-1 में खनानी ब्रदर्स का यह डायलॉग उस असली नेटवर्क की कहानी कहता है, जिसने सरहदों, कानून और सिस्टम को धता बताकर भारत में नकली नोटों की बाढ़ ला दी थी। उनके सिर पर पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी ईएसआई का हाथ था। राजनीतिक संरक्षण था और पाकिस्तानी सरकार उन पर मेहरबान थी।
यही वजह थी कि दोनों भाइयों अल्ताफ खनानी और जावेद खनानी ने दाऊद इब्राहिम के साथ मिलकर नकली करेंसी, हथियार और आतंक का, कराची से दुबई, दिल्ली और अमेरिका तक एक बड़ा नेटवर्क खड़ा कर लिया था। लेकिन 2016 की नोटबंदी ने इस साम्राज्य को एक झटके में हिला दिया था। इसके कुछ दिनों बाद ही जावेद रहस्यमयी तरीके से छत से गिरकर मर गया और उसका भाई कहां है, यह किसी को नहीं पता है।

धुरंधर फिल्म का एक सीन।
खनानी ब्रदर्स कौन थे और गुजरात से उनका क्या कनेक्शन था। कैसे पिता की फॉरेन एक्सचेंज की छोटी सी दुकान को दोनों भाइयों ने एक बड़ा बिजनेस बना लिया? कैसे अल्ताफ खनानी ने विदेश में और जावेद ने पाकिस्तान में हवाला का नेटवर्क खड़ा किया?
खबरें और भी
कैसे अंडरवर्ड डॉन और मुंबई ब्लास्ट के मास्टरमाइंड दाऊद से खनानी ब्रदर्स की दोस्ती हुई और कैसे दोनों ने दाऊद के ड्रग्स और अवैध हथियारों के कारोबार के साम्राज्य को बढ़ाया? कैसे अमेरिकी एजेंसी अल्ताफ खनानी को उसी जाल में फंसाकर उठा ले गई और भारत में हुई नोटबंदी के कुछ ही दिन बाद पाकिस्तान में जावेद खनानी रहस्यमयी तरीके से मरा मिलता है?

भारत से कराची गया था खनानी परिवार
साल 1947 में बंटवारे के बाद दोनों ओर अफरा-तफरी थी। लोग अपना घर, जमीन-जायदाद, पीढ़ियों की कमाई और कारोबार छोड़कर नई बनी सरहद पार कर रहे थे। सदी का सबसे बड़ा पलायन हो रहा था।
इसी दौरान गुजरात का एक व्यापारी परिवार भी पाकिस्तान के कराची शहर पहुंचा था। यह परिवार गुजरात के मेमन समुदाय से था। परिवार के मुखिया का नाम अब्दुल सत्तार खनानी था। मेमन समुदाय के बारे में कहा जाता है कि इनके खून में बिजनेस होता है। ये लोग जुबान के पक्के और सौदे में माहिर होते हैं।
फुटपाथ पर करेंसी एक्सचेंज की दुकान
अब्दुल सत्तार खनानी ने कराची में अपना नया घर बनाया। कराची में उनकी आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी। बावजूद इसके अब्दुल सत्तार ने तय किया कि वो नौकरी नहीं करेंगे, छोटा ही सही लेकिन अपना व्यापार करेंगे।
फिर कराची के बोल्टन बाजार के फुटपाथ पर करेंसी एक्सजेंच की चलती-फिरती दुकान खोल ली। लोग दूसरे देशों की करेंसी लेकर फुटपाथ पर उनके पास आते और वह बदलकर पाकिस्तानी नोट थमा देते थे। यही उनकी कमाई का जरिया बन गया।
2 मई 1961 को अब्दुल सत्तार खनानी के घर दो जुड़वा बेटों का जन्म हुआ। बेटों का नाम जावेद और अल्ताफ रखा गया। अब्दुल सत्तार के दोनों बेटे बड़े हुए तो पिता के साथ काम करने लगे। दोनों ने ज्यादा पढ़ाई-लिखाई नहीं की थी, लेकिन दिमाग तेज था। जावेद और अल्ताफ ने पहले फॉरेन करेंसी एक्सचेंज के काम को बारीकी से समझा। फिर साल 1980 के दशक की शुरुआत में पिता का काम पूरी तरह संभाल लिया।

उसी दौरान कराची के बाजार में एक नाम और तेजी से उभर रहा था। नाम था- हनीफ कालिया। कालिया और सत्तार हम उम्र थे और एक-दूसरे को अच्छे से पहचानते भी थे। हनीफ कालिया का काम भी करेंसी का था, लेकिन अब्दुल के सत्तार के काम से अलग। कालिया प्राइस बॉन्ड ट्रेडिंग करता था। यही कारण था कि कालिया और सत्तार में अच्छी दोस्ती हो गई थी।
प्राइस बॉन्ड ट्रेडिंग क्या होती है?
दरअसल, 1980 के दौर में प्राइस बॉन्ड पाकिस्तान सरकार की एक स्कीम थी, जिसमें लोग एक तय कीमत का बॉन्ड खरीदते थे। बॉन्ड पर कोई ब्याज नहीं मिलता था, लेकिन हर महीने या किसी तय समय पर लकी ड्रॉ होता था।
लकी ड्रॉ में कुछ बॉन्ड नंबर निकलते थे, जिसका बॉन्ड नंबर लकी ड्रॉ से मैच कर जाता था, वह लकी ड्रॉ का विजेता होता था और उसे इनाम के तौर पर बड़ी रकम मिलती था। यानी कि बॉन्ड का पैसा सुरक्षित रहता था। इसके अलावा बॉन्ड खरीदने वालों के पास यह मौका होता था कि वह लकी ड्रॉ के जरिये ज्यादा से ज्यादा रकम जीत सकें।
यह स्कीम थी, हनीफ कालिया का काम नहीं। कालिया प्राइस बॉन्ड ट्रेडिंग का काम करता था। अब आप सोच रहे होंगे कि यह क्या था?
दरअसल, बहुत सारे लोग सिर्फ और सिर्फ लकी ड्रॉ में भाग लेने के लिए बॉन्ड खरीदते थे और बाद में इसे बाजार में बेच देते थे। जब लकी ड्रॉ का समय आता तो हनीफ की तरफ से अफवाह उड़ा दी जाती थी कि फलां बॉन्ड पर प्राइस जीतने के चांस सबसे ज्यादा हैं और वह नंबर हमारे पास है। आप चाहे तो अपने रिस्क पर यह बॉन्ड खरीद सकते हैं।

ऐसे समझिए - बॉन्ड की कीमत 1000 रुपये थी। हनीफ ने 1500 में खरीदा था। बाजार में बॉन्ड का नंबर लकी ड्रॉ से मिलने की अफवाह फैलने के बाद उसकी कीमत आसमान पर पहुंच जाती थी। बॉन्ड की बोली लगने लगती। हनीफ इससे मोटा पैसा कमाता था। इस तरह प्राइस बॉन्ड ट्रेडिंग का काम होता था।
कैसे बनी खनानी एंड कालिया इंटरनेशन कंपनी?
भारत अपना बाजार दुनिया के लिए खोल चुका था। पाकिस्तान भी भारत की देखा-देखी यही कर रहा था। 1990 के दशक की शुरुआत में विदेश से सामान आयात होने लगा था। लोग कमाई के लिए दूसरे देश जाकर काम करने लगे थे। खाड़ी से पाकिस्तानी प्रवासी कामगार खूब पैसा भेज रहे थे। बाजार तेजी से बदल रहा था। करेंसी एक्सचेंज के काम में बड़ा स्कोप नजर आ रहा था।
कालिया और खनानी परिवार पहले से एक-दूसरे को जानते थे। हनीफ कालिया का बेटा हुजैफा कालिया अपने पिता का काम संभाल रहा था। इधर, अब्दुल सत्तार खाननी के बेटे अल्ताफ और जावेद पहले ही पिता के कामकाज में माहिर हो चुके थे।
खनानी ब्रदर्स अपने पिता के काम को बढ़ाना चाहते थे। उनको पैसा और नेटवर्क की जरूरत थी। कालिया परिवार के पास पैसा और नेटवर्क दोनों था। खनानी ब्रदर्स ने हनीफ कालिया और उसके बेटे हुजैफा से बात करके उनको बिजनेस प्लान समझाया। कालिया को प्लान पसंद आया।

स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान (State Bank of Pakistan) ने फॉरेन एक्सचेंज और करेंसी का काम करने वालों को लाइसेंस देना शुरू किया तो अल्ताफ, जावेद और हुजैफा ने मिलकर लाइसेंस के लिए आवेदन ले लिया। फिर खनानी ब्रदर्स और कालिया फैमिली ने मिलकर एक कंपनी बनाई, जिसका नाम खनानी एंड कालिया इंटरनेशनल (KKI) रखा गया।
केकेआई शुरुआत में कोई बड़ी कंपनी नहीं थी। बस कराची के बोल्टन मार्केट में फॉरेन करेंसी बदलने वाली दुकान जैसी थी। लोग यहां दिरहम, डॉलर समेत अन्य देशों की मुद्रा बदलवाने आते थे। शुरुआत में कंपनी यही काम कर रही थी। जावेद और कालिया पाकिस्तान में काम संभाल रहे थे। अल्ताफ दुबई में नेटवर्क बना रहा था, क्योंकि उसके इरादे कुछ और थे।
कुछ ही साल के भीतर केकेआई ने न सिर्फ पाकिस्तान के सभी शहरों में, बल्कि दुबई, लंदन, न्यूयॉर्क और टोरंटो जैसे बड़े शहरों में अपने लोगों को बिठा दिया। कनेक्शन तगड़े कर लिए। पाकिस्तान के फॉरेन एक्सचेंज मार्केट का 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा केकेआई के हाथ में था। हर साल अरबों डॉलर का लेनदेन हो रहा था।
अगर बाहर से देखा जाए तो एक सफल और वैध कंपनी थी, जबकि इसकी असली कहानी वही थी, जो धुरंधर फिल्म में दिखाई गई थी। फॉरेन एक्सचेंज के पैरेलल एक सिस्टम चल रहा था, जिसे हवाला कहते हैं।

हवाला सिस्टम काम कैसे करता है?
किसी इंसान को कराची से दुबई पैसे भेजने हैं। बैंक से भेजेगा तो पहचान बतानी होगी। साइन करने होंगे, डॉक्यूमेंट दिखाने होंगे और टैक्स लगेगा। सरकार के पास रिकॉर्ड भी दर्ज हो जाएगा, जबकि हवाला में ऐसा कुछ नहीं होता है। कराची में एक हवाला एजेंट को नकद पैसे दे दो।
वह एजेंट दुबई में बैठे अपने पार्टनर को खबर देगा और दुबई वाला एजेंट तुरंत उतनी रकम लेकर वहां पहुंच जाएगा, जितनी रकम पहुंचानी है। बाद में कराची और दुबई के एजेंट आपस में हिसाब किताब कर लेते हैं।
छोटे कारोबार से 'मनी मशीन' तक
खनानी ब्रदर्स जमकर हवाला सिस्टम से पैसा यहां-वहां करते और बदले में खूब कमीशन कमाते थे। अल्ताफ ने अपना नेटवर्क इतना बड़ा कर लिया था कि दुबई की अलजूनी एक्सचेंज भी केकेआई की पार्टनर बन गई थी।
पाकिस्तान के ताकतवर लोगों का ध्यान भी खनानी ब्रदर्स के नेटवर्क पर गया। देखते ही देखते नेता, अफसर और बड़े कारोबारी बैंकों से ज्यादा केकेआई पर भरोसा करने लगे, क्योंकि यहां अरबों रुपये का लेनदेन बिना किसी कागजी कार्रवाई के हो जाता था।
काला धन छुपाने के लिए भी खनानी ब्रदर्स का नेटवर्क बेहतर जरिया था। फिर क्या था केकेआई ने कारोबार के तमाम नियम और कायदों ताक पर रखना शुरू कर दिया।
दाऊद से खनानी ब्रदर्स की मुलाकात
साल 1993 में हुए मुंबई ब्लास्ट के बाद दाऊद इब्राहिम भारत से फरार होकर दुबई पहुंच था। भारत के खिलाफ षड़यंत्र रचने के लिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई उसे संरक्षण दे रही थी। कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट की मानें तो आईएसआई दाऊद और डी कंपनी (दाऊद के साथियों) को अपने साथ पाकिस्तान ले गई।
दाऊद के पास ड्रग्स, हथियार और उगाही से बेहिसाब पैसा आ रहा था, लेकिन सवाल यह था कि यह पैसा दूसरे देशों में बैठे अपने लोगों तक कैसे पहुंचाया जाए? दाऊद को अपना पैसा घुमाने के लिए बैंक नहीं, किसी अवैध सिस्टम की जरूरत थी।
तभी दाऊद को खनानी ब्रदर्स - जावेद और अल्ताफ के बारे में पता चला। दाऊद ने इनको अपने काम के बारे में बताया तो दोनों ने तुरंत हामी भर दी। इसके लिए दोनों ने खनानी मनी लॉन्ड्रिंग ऑर्गेनाइजेशन (Khanani MLO) नाम से एक संगठन भी बनाया था।

भारत में आतंक
यह संगठन दाऊद का पैसा यहां-वहां करता और भारत के खिलाफ साजिशों में इस्तेमाल करता। खनानी एमएलओ का नेटवर्क कराची के सदर बाजार से लेकर दुबई, टोरेंटो और ईस्ट अफ्रीका के बंदरगाहों तक फैला हुआ था।
मेक्सिको से आने वाले ड्रग्स के पैसों को बैलेंस करना, खाड़ी देशों से आने वाले आतंकी फंड को रूट करना, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े सिंडिकेट्स के अकाउंट सेटल करना और डी कंपनी के ग्लोबल ऑपरेशंस के लिए पैसा पहुंचाना, ये सारे काम खनानी ब्रदर्स अकेले देख रहे थे।
फिल्मी विलेन से एकदम उलट थे खनानी
पाकिस्तान में बैठा जावेद खनानी और दुबई में बैठा अल्ताफ खनानी हिंदी फिल्मों में आर्थिक तबाही मचाने वाले विलेन जैसे बिल्कुल भी नहीं थे। न ऊंची आवाज, न कोई दिखावा। साधारण सा चश्मा, शांत स्वभाव और एक अकाउंटेंट जैसी सटीक भाषा, लेकिन दिमाग ऐसा शातिर कि दुनिया के सबसे खतरनाक फाइनेंशियल नेटवर्क्स में से एक चला रहे थे। अमेरिकी ट्रेजरी की रिपोर्ट के मुताबिक, ये दोनों भाई हर साल 14 से 16 अरब डॉलर की मनी लॉन्ड्रिंग करते थे।
अमेरिकी और भारतीय एजेंसियों को कब भनक लगी?
साल 2000 तक अल्ताफ खनानी और जावेद खनानी का नेटवर्क पूरी दुनिया में फैल चुका था। ड्रग कार्टेल्स और आतंकी संगठनों का पैसा हवाला के जरिए घुमाया जाता था। जावेद पाकिस्तान से और अल्ताफ दुबई से ऑपरेशन चलाते थे, परिवार भी जुड़ गया था और लीगल दिखने वाली कंपनियों के जरिए मनी लॉन्ड्रिंग होने लगी, लेकिन तब तक भारत और अमेरिका की एजेंसियों को इसकी भनक लग चुकी थी। दोनों देशों की एजेंसियां नेटवर्क तक पहुंचने में जुट चुकी थीं।
भारत में नकली नोटों की बाढ़
इधर, भारत में अचानक फेक इंडियन करेंसी की बाढ़ आ गई। नौकरपेशा से लेकर बड़े-बड़े कारोबारी और किसान तक के हाथ में नकली नोट पहुंच रहे थे। हैरत की बात यह थी कि भारतीय बाजार में धड़ल्ले से तैर रहे नकली नोट लोकल स्तर पर छपे घटिया क्वालिटी के नहीं थे, बल्कि असली के इतने हू-ब-हू थे कि कई बार ये नकली नोट एटीएम सेंसर तक को धोखा दे देते थे। दरअसल, ये सिक्योरिटी ग्रेड पेपर पर छपे होते थे। इनमें वाटर मार्क और खास तरह के फाइबर तक लगे होते थे।

कैसे खुली पाकिस्तान की पोल?
नकली नोटों के सिंडिकेट की कमर तोड़ने के लिए एजेंसियां दिन-रात धर-पकड़ में जुटी थीं। आखिर में दिल्ली पुलिस, एनआईए, डीआरआई और बीएसएफ जैसी कई एजेंसियों की जांच एक ही पैटर्न पर जाकर रुकी। नकली नोटों की छपाई, कागज और सीरियल पैटर्न पाकिस्तान से जुड़ी सप्लाई चेन से मेल खाते थे।
फिर सुरक्षा एजेंसियों ने तस्करी चैनल और अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन ट्रैक कर पाकिस्तान की साजिश का पर्दाफाश किया। जांच एजेंसियों ने भारतीय बाजार में नकली नोट पहुंचाने वाले कुछ ऑपरेटिव्स को दबोचा, जिनमें से एक अब्दुल करीम टुंडा था। इसके बाद फेक करेंसी नेटवर्क को लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे हुए।
जांच एजेंसियों को पता चला कि नकली नोटों की छपाई पाकिस्तान के अंदर सुरक्षित और स्टेट प्रोटेक्टेड फैसिलिटी में होती थी। वहां से यह नोट दुबई, काठमांडू, ढाका और मलेशिया की राजधानी क्वालालम्पुर के रास्ते भारत पहुंचाए जाते थे। फिर यहां से डी कंपनी के लोग,लश्कर-ए-तैयबा के फैसिलिटेटर्स और बॉर्डर पार स्मगलर्स इन नोटों को बाजार में उतारते।
भारत में कितने नकली नोट भेजे गए?
एजेंसियों के मुताबिक, पाकिस्तान से हर साल 1500 से 2000 करोड़ रुपये की फेक करेंसी भारत भेजी जा रही थी। ये नकली नोट एक साथ दो काम कर रहे थे। पहला आतंकी फडिंग और दूसरा रुपये की वैल्यू कमजोर हो रही थी, जिसका अर्थव्यवस्था पर असर पड़ रहा था।
ब्रिटिश कंपनी, भ्रष्ट अधिकारी और साजिशकर्ता पड़ोसी
साल 2010-11 के बीच दुनिया की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित करेंसी पेपर बनाने वाली कंपनी डे-ला-रू (De La Rue) एक बड़े विवाद में फंस गई। यह वही ब्रिटिश कंपनी है जो दुनिया के कई देशों के लिए नोट छापने का कागज, सिक्योरिटी थ्रेड और दूसरे सिक्योरिटी मटेरियल सप्लाई करती है।
देश में जांच एजेंसियां नकली नोटों के नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रही थीं। भारत में भी कंपनी का ऑडिट कराया, जिसमें कई गंभीर गड़बड़ियां मिलीं।
ऑडिट की रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी ने भारत को सब स्टैंडर्ड यानी घटिया क्वालिटी का करेंसी पेपर सप्लाई किया था। क्वालिटी सर्टिफिकेट्स में भी हेराफेरी के सबूत मिले। करीब 2000 टन करेंसी पेपर रिजेक्ट करना पड़ा। इन खुलासों के बाद भारत सरकार ने कंपनी को आधिकारिक तौर पर उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया, लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई।
CBI ने अपने अधिकारियों पर ही क्यों की FIR?
भारतीय सरकारी खरीद का सिस्टम पूरी तरह से खुला और पारदर्शी नहीं था। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर कंपनी अप्रत्यक्ष रास्तों से सप्लाई चेन में बनी रही। दूसरी ओर पाकिस्तान से आने वाले नकली नोट्स की क्वालिटी में अचानक उछाल आया। उनका टेक्सचर, सिक्योरिटी फीचर्स, सब कुछ बेहद एडवांस था।
भारतीय बाजार में असली जैसे दिखने वाले नकली नोट्स को पहुंचाने का काम खनानी जैसे हवाला ऑपरेटर्स बड़ी ही होशियारी से किए जा रहे थे। ऐसे में जांच एजेंसियों को शक हुआ कि कहीं न कहीं ग्लोबल सप्लाई चेन में लीकेज हुआ है।
बढ़ती शंकाओं के बीच सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की। जांच का सीधा सवाल यह था कि क्या कुछ अधिकारियों ने जानबूझकर नियमों को तोड़ मरोड़ कर डे-ला-रू को फायदा पहुंचाया?

जांच कंपनियां खनानी तक कैसे पहुंची?
इसको समझने के लिए वापस साल 2000 में लौटना होगा। भारतीय और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों लगातार इस नेटवर्क की परतें उधेड़ रही थीं। 2008 आते-आते दोनों देशों की जांच एजेंसियां एक ही नाम पर आकर ठहर गईं- वो नाम था खनानी एंड कालिया इंटरनेशनल।
अब तक यह सिर्फ फुटपाथ पर खोली गई एक दुकाननुमा कंपनी नहीं थी, बल्कि पाकिस्तान के डीप स्टेट के तहत चल रहे आतंकी, आपराधिक और राजनीतिक नेटवर्क का फाइनेंशियल स्विच बोर्ड बन चुकी थी।
अगर आईएसआई को बिना फिंगरप्रिंट छोड़े पैसा इधर-उधर करना होता तो यह काम खनानी ब्रदर्स करते थे। खनानी ब्रदर्स ने दाऊद के इशारे पर भारत के खिलाफ एक तरह का आर्थिक युद्ध शुरू कर दिया था। तालिबान और हिजबुल्लाह जैसे आतंकी संगठनों को फंडिंग की जा रही थी।
खुद की अर्थव्यवस्था डगमगाई तब लिया एक्शन
साल 2008 में दुनिया भर में हालात बदल रहे थे। पूरी दुनिया ग्लोबल इकोनॉमिक क्राइसिस से जूझ रही थी। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था भी कमजोर हो रही थी। पाकिस्तानी रुपया तेजी से गिरने लगा और डॉलर महंगा होता रहा था।
स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान को शक हुआ कि देश से बड़ी मात्रा में डॉलर गैर-कानूनी तरीके से बाहर भेजे जा रहे हैं। शक की सुई सीधे खाननी जैसे बड़े हवाला नेटवर्क्स पर आ गई।
नवंबर 2008 में पाकिस्तान की फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) ने लाहौर, कराची और गुंजावाला में केकेआई के दफ्तरों पर एक साथ छापे मारे। जावेद खनानी, अल्ताफ खनानी और मुनाफ कालिया को गिरफ्तार किया गया। स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने केकेआई का लाइसेंस पहले सस्पेंड किया और हमेशा के लिए कैंसिल कर दिया।
सबूत मिट गए, गवाह लापता हो गए.. और आरोपी बरी हुए
खनानी ब्रदर्स और मुनाफ कालिया जेल में थे, लेकिन उनका नेटवर्क इतना सॉलिड था कि धीरे-धीरे केस के सबूत गयाब हो गए। सारे गवाह लापता हो गए। केस कमजोर हो गया और आखिर तीन साल बाद मार्च 2011 में सबूतों की कमी के चलते तीनों बरी हो गए।
केकेआई बैन हो चुकी थी, ऐसे में दोनों भाइयों ने खनानी मनी लॉन्ड्रिंग ऑर्गेनाइजेशन के नेटवर्क में जान फूंकी। तालिबान और हिजबुल्लाह जैसे आतंकी संगठनों के लिए फंडिंग की जाने लगी। पाकिस्तानी सरकार में उनकी पैंठ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो लाइसेंस 2008 में कैंसिल किया गया था, वो 2011 में जेल से रिहा होते ही वापस मिल गया।
अपने ही जाल में फंस गए खनानी ब्रदर्स
यहां से एंट्री होती है अमेरिकी ड्रग एन्फोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (DEA) की। दरअसल, अमेरिका खनानी ब्रदर्स को थ्रेट की तरह देखने लगा था। अब उसका मिशन था कि किसी भी हाल में अल्ताफ खनानी की गिरफ्तारी करनी है।
डीईए ने ऑस्ट्रेलियन पुलिस के साथ मिलकर एक बेहद गोपनीय योजना बनाई। एजेंसियों को अंदाजा था कि अल्ताफ को पकड़ना नामुकिन है। इसलिए उन्होंने खनानी ब्रदर्स को उनके ही जाल में फंसाया।
डीईए एजेंट्स ड्रग स्मगलर्स बनकर पहुंचे। नकली पहचान, नकली नेटवर्क और नकली कहानी के साथ वे अल्ताफ के ड्रग नेटवर्क में घुसपैठ करते हैं। बातचीत शुरू होती है। भरोसा जीता जाता था।
फिर एक दिन एजेंट्स अल्ताफ को बताते हैं-
हमारे पास अरबों डॉलर की ड्रग मनी है, जिसे क्लीन करना है। बदले में भारी कमीशन भी दे देंगे। शर्त बस यह है कि पैसा दुनिया भर में घुमाकर वापस पहुंचाया जाए।

अल्ताफ तुरंत राजी हो जाता है। उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि उससे डील करने वाले ये लोग ड्रग स्मगलर्स नहीं, डीईए के अंडर कवर एजेंट हैं। अल्ताफ से सारी बातें इंक्रिप्टेड ब्लैक बेरी और स्काइप पर होती थी। हर कॉल, हर मैसेज, हर ट्रांजैक्शन को डीईए चुपचाप रिकॉर्ड कर रही थी।
शुरुआत में टेस्ट के लिए छोटे अमाउंट दिए गए। कुछ पैसे दुबई में उसके लोगों को दिए गए। कुछ ऑस्ट्रेलिया और कुछ कनाडा में भी। आखिर में परिणाम वही निकला, जिसका डीईए के एजेंट्स को उम्मीद थी।
कुछ ही दिनों में पैसा उनके पूरे नेटवर्क से घूमता हुआ पूरी तरह क्लीन होकर वापस पहुंच जाता था। अल्ताफ अपना कमीशन काट लेता, लेकिन वो भूल चुका था कि इस बार हर ट्रांजैक्शन सबूत बन चुका है। अब जाल पूरी तरह बिछ चुका था।
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अल्ताफ को जेल में डाल दिया गया
अब बारी थी खनानी ब्रदर्स को जेल में डालने की। डीईए ने एजेंट्स ने कहा कि अगली डील पहले से कहीं बड़ी है, लेकिन इस बार आमने-सामने मिलना होगा; क्योंकि बिना भरोसे के रकम नहीं दी जा सकती। आखिर में मीटिंग की जगह और समय तय हुआ। यह मीटिंग पनामा एयरपोर्ट पर होनी थी।
सितंबर, 2015 में जैसे ही अल्ताफ पनामा एयरपोर्ट उतरा, वैसे ही अमेरिकी एजेंसियों ने उसे गिरफ्तार कर लिया। इस तरह मनी लॉड्रिंग का डॉन अल्ताफ खनानी अमेरिका के हत्थे चढ़ गया। उसे मियामी की जेल में डाल दिया गया।
उसके नेटवर्क को ट्रांजिशनल क्रिमिनल ऑर्गेनाइजेशन घोषित कर दिया गया। खनानी एमएलओ को पूरी तरह बंद कर दिया गया। भारत के लिए यह एक बड़ी कामयाबी का पल था, क्योंकि पूरे ऑपरेशन में भारतीय खुफिया एजेंसियों का अहम योगदान था।
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नोटबंदी भारत में हुई और बर्बादी खनानी ब्रदर्स की
अमेरिका अपना काम कर चुका था। अब भारत की बारी थी। अल्ताफ की गिरफ्तारी के एक साल बाद 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को संबोधित करते हुए एलान किया- भारत में 500 और 1000 के नोट बैन किए जाते हैं। नोटबंदी के दौरान देश में बैंकों के बाहर लंबी-लंबी कतारें लगीं, लेकिन सीमा पार भी देखने का मिला।
कराची में बैठे जावेद खनानी का फेक इंडियन करेंसी का धंधा ठप पड़ गया। पूरा नेटवर्क एक झटके में मिट्टी में मिल गया। हजारों करोड़ों रुपये की फेक इंडियन करेंसी महज कागज का टुकड़ा बनकर रह गई।
बताया जाता है कि उसके स्टॉक में पड़ी फेक इंडियन करेंसी सिर्फ जावेद की नहीं थी, बल्कि दाऊद की डी कंपनी और दूसरे अंडरवर्ल्ड नेटवर्क का था। भारत में हुई नोटबंदी के बाद जावेद खनानी दिवालिया हो गया। डी कंपनी और अंडरवर्ल्ड नेटवर्क अपनी रकम के लिए दबाव बनाने लगे।

अल्ताफ पहले से ही जेल में था। हालत तब और बिगड़ गए, जब जेल में अल्ताफ ने गुनाहों को कबूलने शुरू कर दिया। पैसा कहां से आता है, कौन-कौन लोग शामिल थे? पाकिस्तान के कौन से बड़े चेहरे इस नेटवर्क का हिस्सा थे और नकली भारतीय करेंसी कैसे भारत भेजी जाती थी? यह सब पाकिस्तान के स्टेट स्पोंसर्ड टेरर नेटवर्क के लिए भी बड़ा खतरा बन गया। अमेरिकी एजेंसियां जावेद तक पहुंचने की प्लानिंग कर रही थीं।
नोटबंदी के 26 दिन बाद जावेद की मौत
जावेद पर पैसे मांगने वाले लगातार दबाव बना रहे थे। वह डिप्रेशन में जा चुका था। नोटबंदी हुए 26 दिन हो गए थे। 4 दिसंबर, 2016 को जावेद कराची की मोहम्मद अली जोहर सोसाइटी गया। वहां एक एक निर्माणाधीन इमारत थी। इमारत उस वक्त 8वीं मंजिल तक बनी थी। जावेद इमारत के टॉप फ्लोर पर था, शायद किसी से मिलने वाला था, किसी का इंतजार कर रहा था। क्या बात होने वाली थी, क्यों होने वाली थी, ये तो किसी को नहीं पता।
पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इमारत पर मौजूद श्रमिकों ने बताया कि जावेद परेशान लग रहा था। हम लोग काम कर रहे थे। थोड़ी देर बाद काफी ऊंचाई से जमीन पर कुछ गिरने की आवाज आई। आसपास के लोग दौड़कर पहुंचे। जमीन पर खून-खून था। एक आदमी छत से गिरा था। यह आदमी कोई और नहीं जावेद खनानी था। चारों तरफ हड़कंप मच गया।

हालांकि, यह बात आज तक सामने नहीं आई कि जावेद ने 8वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या की थी या उसे किसी ने धक्का दिया था। अल्ताफ साल 2020 में अमेरिकी जेल से रिहा हुआ है, लेकिन वो कहां है, जिंदा या मर चुका, ये भी किसी नहीं पता। फिल्म धुरंधर में आपने खनानी ब्रदर्स की कुछ झलकियां देखी होंगी, ये दोनों की असली कहानी है।
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Source:
- इंडियन स्टैटिक स्टडीज फोरम
- पाकिस्तानी अखबार डान
- जागरण आर्काइव