नए Cold War की आहट! US गारंटी फेल, ईरान-खाड़ी संकट और हथियारों की होड़; क्या बारूद ही नई सुरक्षा है?
खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका-इजरायल के बीच सीधी टक्कर से दुनिया में 'नए शीत युद्ध' की आहट है। अमेरिका की सुरक्षा गारंटी कमजोर पड़ रही ...और पढ़ें
HighLights
अमेरिकी सुरक्षा गारंटी कमजोर, खाड़ी संकट बढ़ा
वैश्विक सैन्य खर्च रिकॉर्ड स्तर पर, हथियारों की होड़
जागरण टीम, नई दिल्ली। रात का वक्त है… खाड़ी क्षेत्र का आसमान अचानक चमक उठता है। ये कोई आतिशबाजी नहीं, बल्कि मिसाइलों और उन्हें रोकने की कोशिश करती इंटरसेप्टर प्रणालियों की टकराहट है।
कुछ हमले रोके जाते हैं, लेकिन कुछ सीधे अपने निशाने तक पहुंचते हैं। कहीं तेल ठिकाने जल उठते हैं, कहीं सैन्य अड्डे मलबे में बदल जाते हैं। और इस पूरे सीन के पीछे छिपी है एक बड़ी कहानी। ईरान-अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ती सीधी टक्कर।
यह सिर्फ हवाई हमलों तक सीमित नहीं है। अमेरिका खार्ग द्वीप पर हमला कर चुका है। वही छोटा-सा द्वीप, जहां से ईरान का करीब 90% तेल निर्यात होता है। अब चर्चा इस बात की है कि क्या अगला कदम ‘बूट्स ऑन ग्राउंड’ यानी जमीनी हमला हो सकता है।
तस्वीर यहीं और खतरनाक हो जाती है। अमेरिका ने इलाके में हजारों सैनिक तैनात करने शुरू कर दिए हैं। मरीन यूनिट्स, एयरबोर्न फोर्स, और भारी सैन्य तैयारी। दूसरी तरफ ईरान भी खार्ग द्वीप को किले में बदल रहा है।
ट्रैप बिछाए जा रहे हैं, मिसाइल सिस्टम तैनात किए जा रहे हैं। यानी अगर जमीनी युद्ध हुआ, तो यह आसान नहीं होगा। विशेषज्ञ साफ कह रहे हैं। यह एक हाई-रिस्क गेम है, जिसमें भारी जान-माल का नुकसान हो सकता है।
और शायद यही वो मोड़ है, जहां से एक और खतरनाक ट्रेंड शुरू होता दिख रहा है। हथियारों की होड़। जब देशों को लगता है कि कोई भी उन्हें पूरी तरह सुरक्षित नहीं रख सकता, तो वे खुद को मजबूत करने की दौड़ में उतर जाते हैं। और यहीं से शुरू होती है असुरक्षा के नए दौर की असली कहानी।
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दुनिया बदल रही है… और बहुत तेजी से बदल रही है।
रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, और अमेरिका की बदलती भूमिका... इन सबने मिलकर एक नया सवाल खड़ा कर दिया है…
क्या अब दुनिया भरोसे से नहीं, बल्कि हथियारों से चलेगी?
आज हालात ये हैं कि देश दोस्त कम और डिफेंस पार्टनर ज्यादा ढूंढ रहे हैं।
टैंक, मिसाइल और फाइटर जेट, अब सिर्फ युद्ध के औज़ार नहीं, बल्कि ताकत दिखाने का जरिया बन चुके हैं।
ग्लोबल मिलिट्री स्पेंड रिकॉर्ड तोड़ रहा है।
हथियारों की होड़ तेज हो रही है।
और दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां हर देश खुद से पूछ रहा है।
अगर कल युद्ध हुआ… तो क्या हम तैयार हैं?
यही है आज की सबसे बड़ी कहानी
एक ऐसी दुनिया की जहां सुरक्षा अब भरोसे से नहीं, बल्कि ताकत से तय हो रही है।
US सुरक्षा कवच फेल!
कभी दुनिया अमेरिका को एक ऐसे ‘सुरक्षा गारंटर’ के तौर पर देखती थी, जो संकट में साथ खड़ा होगा। यूरोप हो या खाड़ी देश... कई देशों ने अपनी डिफेंस पॉलिसी इसी भरोसे पर बनाई। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। पश्चिम एशिया के संघर्ष में यह साफतौर पर दिख रहा है कि अत्याधुनिक सिस्टम, जैसे; आयरन डोम, THAAD और पैट्रियट... भी हर हमले को रोकने में सक्षम नहीं हैं।
इससे यह धारणा कमजोर पड़ रही है कि सिर्फ महंगे हथियार और दूसरे देशों की सुरक्षा पर भरोसा ही काफी है। अगर थोड़ा पीछे जाएं तो 1990 में सोवियत संघ के टूटने के बाद दुनिया लगभग यूनिपोलर हो गई थी, जहां अमेरिका का दबदबा था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। चीन, रूस, भारत... सभी अपने-अपने तरीके से ताकतवर बन रहे हैं। यह एक मल्टीपोलर दुनिया है। सुनने में यह संतुलित लगता है, लेकिन खतरा भी उतना ही बड़ा है।
2035 तक 6 ट्रिलियन डॉलर सैन्य खर्च
दुनिया का सैन्य खर्च रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। Stockholm International Peace Research Institute के मुताबिक, 2024 में यह करीब 2.4 ट्रिलियन डॉलर रहा। और अनुमान है कि 2035 तक यह 6 ट्रिलियन डॉलर से भी ऊपर जा सकता है। दिलचस्प बात यह है कि यह खर्च संयुक्त राष्ट्र के सालाना बजट से सैकड़ों गुना ज्यादा है।
यानी दुनिया अब शांति से ज्यादा युद्ध की तैयारी पर पैसा खर्च कर रही है। इकॉनोमिक अफेयर्स के एक्सपर्ट डॉ. विकास सिंह कहते हैं, ‘युद्ध अब बजट का स्थायी हिस्सा बन चुका है।'
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अब सवाल यह है कि अचानक दुनिया इतनी असुरक्षित क्यों महसूस करने लगी?
पूरी कहानी की जड़ है रूस-यूक्रेन युद्ध... 2022 के बाद यूरोप की सुरक्षा सोच पूरी तरह बदल गई। यूक्रेन को बड़े पैमाने पर सैन्य सहायता मिली, लेकिन असली बदलाव यह है कि बाकी यूरोपीय देशों ने भी तेजी से हथियार खरीदना शुरू कर दिया। पोलैंड, यूके और कई नाटो देश अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहे हैं।
इस ट्रेंड का सबसे बड़ा फायदा संयुक्त राज्य अमेरिका को हुआ। आज वैश्विक हथियार निर्यात में उसकी हिस्सेदारी 42% है। पहले अमेरिका के सबसे बड़े खरीदार मिडिल ईस्ट में होते थे, लेकिन अब यूरोप टॉप पर आ गया है। इसका मतलब साफ है… हथियार अब कूटनीति का हिस्सा बन चुके हैं। जो देश अमेरिका से हथियार लेते हैं, वे अपनी रणनीतिक साझेदारी भी मजबूत करते हैं।
लेकिन यह सिर्फ हथियार खरीदने की कहानी नहीं है, यह अर्थव्यवस्था की भी कहानी है। आज ‘सिक्योरोनॉमिक्स’ का दौर है जहां हर आर्थिक फैसला सुरक्षा के नजरिये से लिया जा रहा है। कौन-सी तकनीक अपने पास रखनी है, कौन-सी सप्लाई चेन सुरक्षित है यह सब रणनीतिक मुद्दे बन चुके हैं।
अमेरिका, यूरोप और चीन सभी अपने उद्योग को मजबूत करने के साथ-साथ रक्षा उत्पादन बढ़ा रहे हैं। इजरायल इसका बड़ा उदाहरण है, जहां मिलिट्री रिसर्च ने टेक्नोलॉजी सेक्टर को ताकत दी।
लेकिन इस दौड़ की एक कीमत भी है। सरकारों के पास सीमित पैसा होता है। अगर रक्षा पर खर्च बढ़ेगा तो कहीं न कहीं शिक्षा, स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर पर असर पड़ेगा। डॉ. विकास सिंह इसे बहुत सीधे शब्दों में कहते हैं, 'हर मिसाइल, एक स्कूल या अस्पताल की कीमत पर आती है।' यानी हथियारों की यह दौड़ सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता भी बढ़ा सकती है।
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भारत सबसे बड़ा डिफेंस इम्पोर्टर
आज का युद्ध भी बदल चुका है। अब सिर्फ टैंक और सैनिक ही सब कुछ नहीं तय करते। ड्रोन, साइबर अटैक, सैटेलाइट.... ये सब युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं। चीन कई नई तकनीकों में तेजी से आगे बढ़ रहा है, और भारत भी इस दिशा में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। इसका मतलब साफ है कि भविष्य के युद्धों में जीत सिर्फ ताकत से नहीं, तकनीक से तय होगी।
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भारत के लिए यह एक बड़ा मौका भी है। लंबे समय तक भारत दुनिया का बड़ा रक्षा आयातक रहा है, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत देश खुद हथियार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ड्रोन से लेकर मिसाइल और नौसैनिक सिस्टम तक कई क्षेत्रों में काम हो रहा है। डॉ. हरिबाबू श्रीवास्तव कहते हैं, 'किसी दूसरे देश पर सुरक्षा के लिए निर्भर रहना खतरनाक है।' लेकिन असली चुनौती सिर्फ उत्पादन नहीं, बल्कि तकनीक और डिजाइन में आत्मनिर्भर बनना है।
अगर युद्ध लंबा चला तो क्या होगा?
इस पूरे संघर्ष का एक बड़ा असर ऊर्जा पर भी पड़ रहा है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ते ही तेल की कीमतें हिलने लगती हैं। अगर युद्ध लंबा चला, तो दुनिया को बड़ी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ेगी। यानी इसका असर सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम आदमी की जेब तक पहुंचेगा।
और इसी के साथ एक और सवाल उठता है। क्या वैश्विक संस्थाएं अब कमजोर हो रही हैं? संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठनों की भूमिका पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि वे बड़े संघर्ष रोकने में प्रभावी नहीं दिखे। इससे एक संदेश साफ गया है। अब दुनिया नियमों से नहीं, ताकत से चल रही है।
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आगे क्या होगा? विशेषज्ञ मानते हैं कि हथियारों की होड़ और तेज होगी। छोटे-बड़े सभी देश अपनी सैन्य ताकत बढ़ाएंगे। 2035 तक वैश्विक सैन्य खर्च कई गुना बढ़ सकता है। लेकिन यह रास्ता आसान नहीं है। क्योंकि अंत में हर देश को एक संतुलन बनाना होगा। सुरक्षा और विकास के बीच।
आखिरकार, सबसे बड़ा सवाल यही है। देश बंदूक को प्राथमिकता देंगे या दाल को? क्योंकि एक मजबूत सेना तभी टिकती है, जब उसके पीछे एक मजबूत अर्थव्यवस्था और समाज खड़ा हो। और शायद आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती यही होगी। इस संतुलन को कैसे बनाए रखा जाए।
Source: Jagran Network Research, Stockholm International Peace Research Institute (SIPRI), 2025