FCRA संशोधन विधेयक का विरोध करने की तैयारी में विपक्ष, विदेशी फंडिंग बिल पर क्यों उठ रहे सवाल?
विपक्ष मोदी सरकार के FCRA संशोधन विधेयक 2026 का कड़ा विरोध करने की तैयारी में है, जो विदेशी फंड से बनी संपत्तियों पर सरकार का नियंत्रण बढ़ाएगा।
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मोदी सरकार के FCRA संशोधन विधेयक का विरोध करने की तैयारी में विपक्ष(फाइल फोटो)

समय कम है?
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। विपक्ष मोदी सरकार के फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन अमेंडमेंट (FCRA) बिल 2026 का कड़ा विरोध करने की तैयारी कर रहा है, जिसे इस सप्ताह संसद में पेश किए जाने की उम्मीद है। इस संशोधन के अनुसार, यदि किसी संगठन का रजिस्ट्रेशन रद हो जाता है, तो विदेशी फंड से बनी संपत्तियों पर सरकार का नियंत्रण और मजबूत हो जाएगा।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने स्पष्ट किया है कि विपक्ष सरकार के इस कदम को रोकने की योजना बना रहा है, इस पर सोमवार को अंतिम फैसला लिया जाएगा। उन्होंने बताया कि सभी पार्टियों, विशेषकर फ्लोर लीडर्स की बैठक बुलाने के बाद ही आगे की रणनीति तय की जाएगी।
इसी बीच, महत्वपूर्ण मामलों के पेश होने की उम्मीद में कांग्रेस ने राज्यसभा और लोकसभा में अपने सांसदों के लिए व्हिप जारी किया है। इससे 10, 11 और 12 अगस्त को संसद में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित की जा सकेगी। कांग्रेस ने I.N.D.I. गठबंधन के सभी सहयोगियों से भी आग्रह किया है कि वे इन तीन दिनों में अपने सांसदों की मौजूदगी पक्की करें।
दूसरी ओर, एनसीपी(एसपी) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने भी बिल का विरोध करते हुए कहा कि विदेशी फंडिंग को हमेशा शक की नजर से नहीं देखा जा सकता। उन्होंने बिल को वापस लेने या इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने की मांग की है।
हालांकि, संसदीय कार्य राज्य मंत्री द्वारा जारी अगले हफ्ते के संभावित सरकारी कामकाज की सूची में फिलहाल इस बिल का जिक्र नहीं किया गया है।
आखिर क्या है FCRA बिल 2026?
फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल 2026 का मुख्य उद्देश्य फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट 2010 में संशोधन करना है। यह मूल कानून व्यक्तियों, संघों और संगठनों को मिलने वाले विदेशी चंदे को नियंत्रित करता है। इस साल 15 जुलाई के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, देश में 14,449 FCRA रजिस्ट्रेशन सक्रिय थे, जबकि 22,498 रद हो चुके है और 15,212 की समय-सीमा समाप्त हो गई थी।
इस नए बिल में एक डेजिग्नेटेड अथॉरिटी बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। यदि किसी संस्था का FCRA रजिस्ट्रेशन रद होता है, सरेंडर होता है या उसकी समय-सीमा खत्म होती है, तो यह अथॉरिटी विदेशी चंदे का नियंत्रण सीधे अपने हाथ में ले लेगी।
ऐसे विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियां शुरुआत में इसी अथॉरिटी के नियंत्रण में रहेंगी और अगर संस्था तय समय में अपना रजिस्ट्रेशन दोबारा नहीं करा पाती है, तो इन संपत्तियों को पूरी तरह से सरकार को ट्रांसफर किया जा सकेगा। इसके अलावा, अथॉरिटी के पास संपत्तियों को मैनेज करने और जरूरत पड़ने पर ऐसी संस्थाओं की गतिविधियों पर नजर रखने का अधिकार भी होगा।
क्या है विवाद का मुख्य बिंदु?
इस बिल को लेकर सबसे ज्यादा विवाद तीन अहम धाराओं धारा 14B, धारा 16A और धारा 16B को लेकर हो रहा है। धारा 14B मुख्य रूप से FCRA सर्टिफिकेट के रद होने से संबंधित है।
इसके तहत अगर कोई संस्था रिन्यूअल के लिए अप्लाई नहीं करती है, उसका रिन्यूअल खारिज हो जाता है या बिना रिन्यू हुए सर्टिफिकेट की मियाद खत्म हो जाती है, तो उसे हमेशा के लिए समाप्त मान लिया जाएगा।
इसके बाद धारा 16A का प्रस्ताव लागू होगा, जिसके तहत जिस संस्था का सर्टिफिकेशन खत्म हो गया है, उसे मिले विदेशी फंड और उससे जुड़ी संपत्तियां डेजिग्नेटेड अथॉरिटी के पास चली जाएंगी।
वहीं, धारा 16B को सबसे अधिक विवादास्पद माना जा रहा है क्योंकि यह पुराने कानून के तहत पहले से मौजूद संपत्तियों पर भी नए नियमों को लागू करने की अनुमति देती है। इससे उन संस्थाओं पर गहरा असर पड़ने की आशंका है जिनका FCRA रजिस्ट्रेशन काफी पहले खत्म हो गया था, लेकिन अब वे पूरी तरह से घरेलू फंड के सहारे अपना काम कर रही हैं।
विपक्ष के साथ-साथ कई संगठन कर रहे विरोध
विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने इस बिल को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने इसे पूरी तरह से असंवैधानिक करार दिया है। उनका मानना है कि यह नया कानून स्वैच्छिक और सामाजिक सेवा करने वाली संस्थाओं पर शिकंजा कसेगा।
उन्होंने आरोप लगाया कि यह बिल विशेषकर अल्पसंख्यकों और केरल के ईसाई समूहों द्वारा चलाए जा रहे NGO को डराने और नियंत्रित करने की सोची-समझी कोशिश है।
तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने भी बिल को कठोर बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है और कहा है कि इससे शिक्षा और हेल्थकेयर सेक्टर में काम कर रहे NGO पर कार्यपालिका का अत्यधिक नियंत्रण हो जाएगा।
क्या है क्षेत्रीय दलों और धार्मिक संगठनों की चिंता?
रष्ट्रीय दलों के अलावा क्षेत्रीय दल भी इस मुद्दे पर मुखर हैं। मिजोरम कांग्रेस ने इस बिल के विरोध में आइजोल में प्रदर्शन किया और कहा कि इससे कानूनी रास्ता अपनाना और भी मुश्किल हो जाएगा।
इस बीच, मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर अपनी क्षेत्रीय चिंताएं जाहिर की हैं। गृह मंत्री ने ईसाई समुदाय के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की है, जिन्होंने बिल के प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति जताई थी।
दक्षिण भारत में भी इसका व्यापक विरोध हो रहा है। DMK अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने केंद्र सरकार से सीधे तौर पर इस संशोधन बिल को वापस लेने और मूल अधिनियम की धारा 15 को रद करने की मांग की है। इसके साथ ही, केरल के कैथोलिक चर्च ने भी मौजूदा FCRA कानून में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर अपनी गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसका विरोध किया है।
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