Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    तमिलनाडु में मतांतरित मुस्लिमों के आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

    Updated: Fri, 07 Aug 2026 10:29 PM (IST)

    सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की उस अपील पर फैसला सुरक्षित रखा है, जिसमें हिंदू से मुस्लिम बने लोगों के लिए आरक्षण लाभ जारी रखने की मांग की गई है। ...और पढ़ें

    मतांतरित मुस्लिमों के आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला (फोटो-पीटीआई)

    मतांतरित मुस्लिमों के आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला (फोटो-पीटीआई)

    HighLights

    1. सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की अपील पर फैसला सुरक्षित रखा।

    2. हिंदू से मुस्लिम बने लोगों के आरक्षण लाभ का मामला।

    3. मद्रास हाई कोर्ट ने केवल मतांतरण पर आरक्षण नकारा था।

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की इस अपील पर अपना निर्णय सुरक्षित कर लिया है कि हिंदू से मुस्लिम बने सामाजिक रूप से पिछड़ी जाति के लोग आरक्षण का लाभ लेने से चूकें नहीं।

    तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें कहा गया था कि इस्लाम में परिवर्तित व्यक्ति केवल मतांतरण के आधार पर पिछड़ी जाति (मुस्लिम) श्रेणी के तहत आरक्षण का दावा करने का हकदार नहीं है।

    सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

    जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और चंद्रशेखर की पीठ ने तमिलनाडु सरकार के लिए वरिष्ठ अधिवक्ताओं मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ लूथरा की दलीलें सुनीं, जिन्होंने हाई कोर्ट के आदेश को रद करने की मांग की।

    रोहतगी ने कहा कि राज्य सरकार के 9 मार्च, 2024 के आदेश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समुदायों के लोग केवल इस्लाम कुबूल करने के कारण आरक्षण लाभ से वंचित नहीं हों।

    राज्य सरकार का आदेश मतांतरण के बावजूद आरक्षण के लाभों को बनाए रखकर एक समान अवसर प्रदान करता है। राज्य सरकार की अपील में कहा गया कि विवादित निर्णय कार्यकारी नीति में हस्तक्षेप की अनुमति देने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है, जो एक विशेषज्ञ वैधानिक आयोग की सिफारिश के अनुसार तैयार की गई थी।

    खबरें और भी

    वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल संकरनारायणन ने हाई कोर्ट में मूल याचिकाकर्ता के रूप में उत्तरदाता का प्रतिनिधित्व किया।

    हाई कोर्ट का निर्णय समीर अहमद की याचिका पर आया, जिन्होंने 2015 में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम कुबूल किया, जिसका नोटिफिकेशन 2016 में गजट के माध्यम से जारी किया गया। उन्होंने बाद में इस्लामी रीति-रिवाजों से निकाह किया और आरक्षण लाभ प्राप्त करने के लिए "मुस्लिम लेब्बाई" समुदाय से संबंधित होने का प्रमाण पत्र मांगा।

    उनकी याचिका तहसीलदार ने अस्वीकृत कर दी, जिसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया। ,सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार की याचिका पर सभी पक्षों की दलीलों के बाद सुनवाई पूरी कर ली है।

    हाई कोर्ट ने कहा था, '25 जून को हाई कोर्ट ने कहा कि इस्लाम कबूल करने वाला व्यक्ति केवल मतांतरण के आधार पर पिछड़ी जाति (मुस्लिम) श्रेणी के तहत आरक्षण का दावा करने का हकदार नहीं है और 9 मार्च, 2024 को जारी तमिलनाडु सरकार के आदेश (जीओ-संख्या 31) को असंवैधानिक घोषित किया।'

    हाई कोर्ट ने जीओ को रद करते हुए कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के बाध्यकारी न्यायिक पूर्ववृत्तों के विपरीत था। इसने कहा कि इस्लाम कबूल करने वाले को केवल मुस्लिम के रूप में माना जा सकता है।

    (समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)

    यह भी पढ़ें- अभिषेक बनर्जी के PA सुमित रॉय की मुश्किलें बढ़ीं, कलकत्ता हाई कोर्ट ने ठुकराई तत्काल सुनवाई की मांग