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यूएन के नक्शे में अक्साई चिन और अरुणाचल पर गलत दावा, असम सीमा से नगालैंड भी गायब

Published: Tue, 08 Sep 2026 11:47 AM (IST)

संयुक्त राष्ट्र के करेक्ट द मैप प्रस्ताव के बाद जारी नए नक्शे में भारत के अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।

Photo Credit - un.org/geospatial/content/map-world-1

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र में 4 सितंबर को भारत समर्थित करेक्ट द मैप यानी नक्शा सुधार प्रस्ताव पारित किया गया था। इस प्रस्ताव के दौरान मंजूर किए गए दुनिया के नए नक्शे में भारत के अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है।

इस नक्शे में इन दोनों क्षेत्रों को भारत और चीन की दावा रेखाओं के बीच फंसे हुए अलग-अलग क्षेत्रों के रूप में दिखाया गया है, जबकि भारत हमेशा से इन्हें अपना अभिन्न अंग मानता है।

नक्शे में क्या दिखाया गया है?

यह नक्शा 1 जुलाई को तैयार किया गया था। इसमें असम से सटे अरुणाचल प्रदेश की दक्षिणी सीमा को चीनी रेखा के तौर पर और उत्तरी सीमा को भारतीय रेखा के तौर पर दर्शाया गया है। इसमें नगालैंड के साथ राज्य की सीमा को हटा दिया गया है।

इसी तरह, अक्साई चिन की पूर्वी सीमा को भारतीय रेखा और पश्चिमी सीमा को चीनी रेखा के रूप में दिखाया गया है, जिसे भारत लद्दाख का हिस्सा मानता है। पुराने नक्शों की तरह इसमें ये रेखाएं मौजूद तो हैं, लेकिन 2011 के संयुक्त राष्ट्र के नक्शे के विपरीत, इस नए नक्शे में इन्हें स्पष्ट रूप से दावा रेखा नहीं लिखा गया है।

नक्शे में क्या हैं जम्मू-कश्मीर और एलओसी के बारे में जिक्र?

इस नए नक्शे में जम्मू-कश्मीर को एक बिंदुदार रेखा के साथ दिखाया गया है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा (LoC) को दर्शाती है। नक्शे के बाईं ओर एक नोट में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि यह बिंदुदार रेखा भारत और पाकिस्तान के बीच सहमत नियंत्रण रेखा को दर्शाती है और जम्मू-कश्मीर की अंतिम स्थिति पर अभी दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बनी है।

हालांकि, नक्शे में इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है कि अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन को भारत और चीन के दावों के बीच क्यों फंसा हुआ दिखाया गया है।

क्या है करेक्ट द मैप प्रस्ताव?

इस नक्शे को लेकर चर्चा मार्च 2026 में शुरू हुई थी, जब अफ्रीकन यूनियन ने अफ्रीका को अधिक सटीक रूप से दर्शाने के लिए एक नए तरीके का समर्थन किया था। इसे संज्ञानात्मक न्याय का नाम दिया गया।

इसके बाद टोगो देश ने अप्रैल में इस पर विचार-विमर्श शुरू किया और जुलाई में संयुक्त राष्ट्र द्वारा तैयार किया गया यह नया नक्शा सामने आया। हालांकि यह नक्शा किसी के लिए बाध्यकारी नहीं है, लेकिन दुनिया भर के अंतरराष्ट्रीय संस्थान इसका इस्तेमाल करेंगे।

क्या है भारत सरकार का रुख?

भारतीय विदेश मंत्रालय ने रविवार को स्पष्ट किया कि भारत ने करेक्ट द मैप प्रस्ताव में वोट जरूर दिया था, लेकिन समर्थन सिर्फ नक्शों को समानता के साथ दिखाने के सिद्धांत के लिए था। विदेश मंत्रालय ने कहा कि हमने यह भी स्पष्ट किया था कि इस प्रस्ताव का समर्थन करने का मतलब किसी विशिष्ट नक्शे या राष्ट्रीय सीमाओं के गलत चित्रण को स्वीकार करना नहीं है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सख्त लहजे में कहा कि जम्मू-कश्मीर और अक्साई चिन सहित लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेशों समेत भारत के संप्रभु क्षेत्र को भारत के आधिकारिक नक्शे के अनुसार ही दिखाया जाना चाहिए। कोई भी गलत या भ्रामक चित्रण हमें बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है। भारत का आधिकारिक नक्शा अरुणाचल प्रदेश और पूरे जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख को भारत का संप्रभु हिस्सा दिखाता है।

नेपाल के साथ विवाद में भारत का पलड़ा भारी

इस नए नक्शे में एक बात भारत के पक्ष में भी रही है। नेपाल के साथ चल रहे कालापानी सीमा विवाद के मामले में नक्शा भारत के रुख का समर्थन करता हुआ नजर आता है। इसमें कालापानी-लिपुलेख-लिम्पियाधुरा क्षेत्र पर भारत का नियंत्रण दिखाया गया है, जिस पर नेपाल अपना दावा करता है।

आपको बता दें कि लिपुलेख क्षेत्र का इस्तेमाल भारत द्वारा तिब्बत और कैलाश मानसरोवर जाने वाले तीर्थयात्रियों व व्यापारियों के लिए किया जाता है। नेपाल ने 2019 में जारी किए गए भारत के राजनीतिक नक्शे का विरोध किया था, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के इस नए नक्शे पर नेपाल सरकार की ओर से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

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