बंगाल में वाम मोर्चा का सियासी सफर: 34 साल तक किया एकछत्र राज, अर्श से फर्श तक कैसे पहुंचे?
बंगाल में वाम मोर्चा ने 34 साल तक एकछत्र राज किया, लेकिन अब विधानसभा में उसका कोई प्रतिनिधि नहीं है। ...और पढ़ें

HighLights
वाम मोर्चा ने बंगाल में 34 साल तक एकछत्र शासन किया।
सिंगुर-नंदीग्राम आंदोलन और कैडरों की दादागिरी पतन का कारण बनी।
वर्तमान में बंगाल विधानसभा में वाम मोर्चा का कोई प्रतिनिधि नहीं।
विशाल श्रेष्ठ, कोलकाता। बंगाल में वाम मोर्चा (वामो) का सियासी सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। कैसे एक 'धनवान' रातों रात कंगाल हो जाता है और फिर उसका संघर्ष शुरू होता है।
वामो ने बंगाल में लगातार 34 साल एकछत्र राज किया, लेकिन उसके बाद सत्ता से इस कदर छिटका कि वर्तमान में बंगाल विधानसभा (विस) में उसका एक प्रतिनिधि तक नहीं है। वह वापसी के लिए पिछले 15 वर्षों से संघर्ष कर रहा है।
इस तरह से देखें तो वामो की पिक्चर अभी बाकी है। उसे 'हैप्पी एंडिंग' की तलाश है। देखना है कि यह कब साकार होता है।
टूट से पड़ी मजबूत शासन की नींव
वामपंथी राजनीति के गहन जानकार मनन दास बताते हैं, 1964 में भाकपा में टूट से माकपा का गठन हुआ। माकपा के पुरोधा ज्योति बसु ने श्रमिकों के हित से जुड़े मुद्दों को उठाकर ट्रेड आंदोलन की शुरुआत की।
बसु को आभास हो गया था कि आंदोलन को मजबूत करने के लिए समान विचाराधारा वाले सभी दलों को एक छतरी के नीचे लाना जरुरी है। उनके प्रयास से माकपा के नेतृत्व में भाकपा, फारवर्ड ब्लाक, आरएसपी समेत अन्य दल एकजुट हुए, मिलकर 1977 का विस चुनाव लड़ा और कांग्रेस के दो दशक के शासन का सफाया कर दिया।
भूमि सुधार व पंचायती राज ने किया दीर्घायु
सत्ता पर काबिज होने के बाद वामो ने भूमि सुधार पर विशेष जोर दिया, जिससे वह किसानों व खेतिहर मजदूरों की भी हितैषी बन गया। उसने सत्ता का विकेंद्रीकरण करते हुए त्रि-स्तरीय पंचायत व्यवस्था भी शुरू की और उसकी लगाम मजबूती से पकड़े रखी।
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उसी दौरान वामो ने अपने संगठन को भी जमीनी स्तर पर मजबूत करना शुरू किया। विभिन्न कमेटियों गठित कीं। उस वक्त बंगाल में ऐसा कोई गली-मोहल्ला न था, जहां इन कमेटियों का कार्यालय नहीं था।
कैडरों की दादागिरी ने किया बंटाधार
मनन दास कहते हैं, वामपंथी शासन के पतन का मुख्य कारण वामो सरकार के सिंगुर-नंदीग्राम में जबरन भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध तत्कालीन विपक्ष की नेता ममता बनर्जी का आंदोलन बताया जाता है, हालांकि इसके संकेत 2007 के पंचायत चुनाव में वामो के खराब प्रदर्शन से ही मिल गए थे।
एक तरफ वामपंथी जन प्रतिनिधियों की जनता से दूरी, दूसरी तरफ माकपा कैडरों की बढ़ती दादागिरी से लोग त्रस्त हो चुके थे। वे मजबूत विकल्प की तलाश में थे, जो उन्हें ममता के नेतृत्व वाले तृणमूल में दिखा और 2011 में सत्ता पलट दी।
अर्श से फर्श पर
1977 के विस चुनाव में वामो ने 294 में से 234 सीटें जीतकर लाल शासन की शुरुआत की। ज्योति बसु पहले मुख्यमंत्री बने। उस वक्त माकपा ने अकेले 178 सीटें जीती थीं, जो पांच साल पहले मात्र 14 थीं, वहीं कांग्रेस 20 सीटों पर सिमट गई थी।
1982 में वामो की सीटें और बढ़कर 238 हो गईं। 1987 में उसका दबदबा और बढ़ गया, और 251 सीटों पर कब्जा जमा लिया। बंगाल में उसके बाद का चुनाव लोस चुनाव के साथ 1991 मे हुआ। वामो ने उस बार भी 245 सीटें जीतीं लेकिन 1996 में वामो की सीटें घटकर 203 हो गईं।
2001 में पहली बार वामो की सीटें 200 से उतरकर 199 पर आ गईं और गठन के बाद पहले ही विस चुनाव में तृणमूल 60 सीटें जीतकर कांग्रेस को पीछे छोड़कर मुख्य विपक्षी पार्टी बन गईं, लेकिन वामो ने 2006 में फिर 235 सीटें जीत लीं और तृणमूल 30 पर उतर आई।
2011 में तृणमूल ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और वामो को सत्ता से उखाड़ फेंका। उनके गठजोड़ को 228 सीटें (तृणमूल को 184 व कांग्रेस को 42) मिलीं जबकि वामो को मात्र 40 नसीब हुईं।
2016 में तृणमूल ने अपने बूते चुनाव लड़कर 211 सीटें जीतीं। कांग्रेस ने वामो के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। उसे 44 व वामो को 26 सीटें मिलीं। भाजपा की झोली में भी तीन सीटें आईं। पिछला विस चुनाव भी तृणमूल ने अकेले लड़ा व 215 सीटें जीतीं।
कांग्रेस व वामो ने फिर मिलकर लड़ा लेकिन उस बार उनका खाता भी नहीं खुल पाया जबकि 77 सीटें जीतकर भाजपा मुख्य विरोधी दल बन गई।
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