क्या है दक्षिण चीन सागर विवाद, भारत के फैसले से ड्रैगन को लगी मिर्ची; फिर बढ़ेगा दोनों देशों में तनाव?
भारत की साउथ चाइना सी पर स्पष्ट नीति से चीन असहज हो गया है। यूएनक्लोस के 2016 के फैसले की वर्षगांठ पर भारत के रुख को चीन के राजदूत और ग्लोबल टाइम्स ने ...और पढ़ें
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दक्षिण चीन सागर पर भारत के फैसले से चीन को लगा झटका (जागरण)
HighLights
भारत की साउथ चाइना सी नीति से चीन असहज।
यूएनक्लोस फैसले की वर्षगांठ पर भारत ने रुख दोहराया।
चीन के राजदूत ने भारत को 'अवसरवादी' बताया।
जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। भारत की साउथ चीन सी को लेकर साफ और सशक्त नीति अब चीन को चुभने लगी है। मंगलवार को भारत ने साउथ चाइना सी (दक्षिण चीन सागर) को लेकर समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र की संधि (यूएनक्लोस) के दस साल पुरानी मध्यस्थता संबंधी फैसले की सालगिरह पर अपना रुख दोहराया जो चीन को बहुत पसंद नहीं आया है।
यही वजह है कि बुधवार को भारत में चीन के राजदूत शू फीहोंग ने सोशल मीडिया (एक्स) पर इसका तीखा जवाब दिया है।
साथ ही चीन सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने भी भारत पर 'अवसरवादी' करार करते हुए लिखा है कि, 'भारत को साउथ चाइना सी से कुछ लेना देना नहीं है, यह सिर्फ उसकी भूराजनीतिक महत्व दिखाने की कोशिश है।' यह पहला मौका है जब इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच सीधे-सीधे प्रतिक्रियाएं आई हैं।
साउथ चाइन सी पर भारत का जवाब
वर्ष 2016 में यूएनक्लोस के हेग स्थित मुख्यालय ने अपना ऐतिहासिक फैसला दिया था जिसमें साउथ चाइन सी में चीन के ऐतिहासिक अधिकार के दावे को खारिज कर दिया था। इसकी दसवीं वर्षगांठ पर अमेरिका, ब्रिटेन, फिलीपींस समेत 14 देशों ने एक संयुक्त पत्र लिखते हुए उक्त फैसले को लागू करने की बात कही थी।
इस पर प्रतिक्रिया जताते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने कहा कि, 'साउथ चीन सी मुद्दे पर भारत का रुख जगजाहिर है। हम यूएनक्लोस में वर्णित अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार नौवहन और उड़ान की स्वतंत्रता, समुद्र के अन्य कानूनी उपयोगों तथा बिना रुकावट व्यापार को बनाए रखने पर जोर देते हैं।'
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रंधीर जायसवाल ने आगे कहा, 'हम दोहराते हैं कि समुद्री विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से और यूएनक्लोस के अनुसार सुलझाया जाना चाहिए। 2016 का मध्यस्थता ट्रिब्यूनल का फैसला एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है और यह विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने का आधार है।'
चीन को लगा झटका
अब चीन के राजदूत शू फीहोंग ने एक्स पर लिखा है कि, 'दक्षिण चीन सागर (नान्हाई झुडाओ) पर चीन की संप्रभुता इतिहास की लंबी प्रक्रिया में स्थापित हुई है और कानूनी रूप से ठोस आधार पर है। साउथ चीन सी ऑर्बिट्रेशन अवॉर्ड’ एक कानूनी प्रक्रिया का ढोंग भर है, जो असल में राजनीतिक तमाशा है।'
शू फीहोंग ने आगे लिखा, 'ट्रिब्यूनल ने अपनी सीमा लांघी थी और एक अवैध व व्यर्थ का फैसला दिया था। यह फैसला न तो इतिहास बदल सकता है, न चीन की संकल्प शक्ति हिला सकता है और न ही विवादों को सीधे पक्षकारों के बीच बातचीत से सुलझाने की चीन की नीति को प्रभावित कर सकता है।'
फीहोंग के इस बयान के समय ही ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, 'ध्यान रहे कि भारत साउथ चीन सी का दावेदार तक नहीं है। दस साल पुराने उस अवैध व अमान्य फैसले का उसका समर्थन सिर्फ एक पुरानी आदत है, जहां वह उस थिएटर में भू-राजनीतिक महत्व दिखाने की कोशिश करता है, जिसमें उसका कोई सीधा दांव नहीं। यह एक छोटी और अवसरवादी हरकत है।'
चीन को क्यों लगी मिर्ची?
असलियत में चीन को यह बात कभी पसंद नहीं आई कि यूएनक्लोस के वर्ष 2016 के फैसले के बाद भारत ने हिंद प्रशांत क्षेत्र को लेकर अपनी पूरी रणनीति बदल दी है।
भारत ने साउथ चीन सी पर अपनी आवाज पहले से ज्यादा स्पष्ट और मुखर की है। पहले यह मुद्दा मुख्य रूप से फिलीपींस-चीन विवाद माना जाता था, लेकिन अब भारत इसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की व्यापक सुरक्षा और समुद्री कानून के सम्मान से जोड़कर देखता है।
क्वाड (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) की सक्रियता, हिंद-प्रशांत महासागर में 'फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक' नीति और समुद्री क्षमता निर्माण यही दिशा दिखाते हैं। पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड दौरा भी इसी रणनीतिक मजबूती का हिस्सा माना जा रहा है।