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    देश में बच्चों के लिए बैन होगा इंटरनेट मीडिया? सर्वे में सामने आई चौंकाने वाली बातें

    Updated: Thu, 29 Jan 2026 10:38 PM (GMT+05:30)

    आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने बच्चों में बढ़ती डिजिटल लत पर गंभीर चिंता जताई है। रिपोर्ट के अनुसार, इंटरनेट मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बच्चों के मानसिक ...और पढ़ें

    देश में बच्चों के लिए बैन होगा इंटरनेट मीडिया सर्वे में सामने आई चौंकाने वाली बातें (AI द्वारा जनरेटेड फोटो)

    देश में बच्चों के लिए बैन होगा इंटरनेट मीडिया सर्वे में सामने आई चौंकाने वाली बातें (AI द्वारा जनरेटेड फोटो)

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    जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। देश में बढ़ती डिजिटल लत को लेकर सरकार ने गंभीर चिंता जताते हुए इसके नियमन की जरूरत बताई है। संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कहा गया है कि इंटरनेट मीडिया और अन्य ऑनलाइन प्लेटफार्म पर बच्चों और किशोरों की बढ़ती निर्भरता उनके मानसिक स्वास्थ्य, पढ़ाई और सामाजिक जीवन पर बुरा असर डाल रही है।

    इस समस्या से निपटने के लिए सर्वेक्षण ने आनलाइन कंपनियों को उम्र सत्यापन के लिए जिम्मेदार बनाने और बच्चों के लिए सरल व सुरक्षित डिजिटल उपकरणों को बढ़ावा देने की सिफारिश की है। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने आर्थिक सर्वेक्षण में कहा कि बच्चों को डिजिटल लत से बचाने में परिवारों को अहम भूमिका निभानी होगी।

    गौरतलब है कि दुनियाभर में छोटे बच्चों के लिए इंटरनेट मीडिया को खतरनाक बताया जा रहा है। आस्ट्रेलिया और फिनलैंड ने 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इंटरनेट मीडिया पर प्रतिबंध के लिए जहां कानून लागू कर रखा है, वहीं फ्रांस की नेशनल असेंबली में ऐसा कानून लाने पर सहमति बनी है।

    अन्य देश भी कर रहे अध्ययन

    वहीं ब्रिटेन, डेनमार्क और ग्रीस इस मुद्दे पर व्यापक अध्ययन कर रहे हैं। दुनिया के दूसरे नंबर के स्मार्टफोन बाजार, भारत के लिए ये खास चिंता का विषय इसलिए भी है, क्योंकि देश में सालाना 75 करोड़ से ज्यादा स्मार्टफोन बिकते हैं।

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    रिसर्च फर्म डाटारिपोर्टल के अनुसार, देश में एक अरब से ज्यादा इंटरनेट यूजर हैं, 50 करोड़ से ज्यादा यूट्यूब यूजर, 40 करोड से ज्यादा फेसबुक यूजर और 48 करोड़ से अधिक इंस्टाग्राम यूजर हैं। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, इन एप्स पर 75 प्रतिशत से ज्यादा छोटी उम्र के यूजर्स हैं।

    संसद में रखी गई आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार, कम उम्र के यूजर्स डिजिटल कंटेंट के नकारात्मक प्रभावों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं। ऐसे में इंटरनेट मीडिया, आनलाइन गे¨मग, जुआ एप्स, आटो-प्ले वीडियो और टारगेटेड विज्ञापनों तक बच्चों की आसान पहुंच चिंता का विषय बन गई है।

    सर्वेक्षण का कहना है कि उम्र के आधार पर आनलाइन प्लेटफार्म की पहुंच सीमित करने की नीति पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।सर्वेक्षण में साफ कहा गया है कि अब यह जिम्मेदारी केवल माता-पिता या स्कूलों की नहीं रह सकती।

    ऑनलाइन प्लेटफा‌र्म्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि यूजर्स की उम्र सही तरीके से सत्यापित हो और बच्चों के लिए उम्र के हिसाब से सुरक्षित सेटिंग्स पहले से लागू हों।बच्चों को स्मार्टफोन देने के बजाय सरल डिवाइस अपनाने की भी सलाह दी गई है।

    इसमें बेसिक मोबाइल फोन या केवल पढ़ाई के लिए इस्तेमाल होने वाले टैबलेट शामिल हैं, जिनमें कंटेंट फिल्टर और समय-सीमा तय हो। इससे बच्चों को हिंसक, अश्लील या जुए से जुड़े कंटेंट से बचाया जा सकता है। साथ ही स्कूलों से अपील की गई है कि वे आनलाइन पढ़ाई पर निर्भरता कम करें।

    गोवा-आंध्र ने की है पहल सर्वेक्षण में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि आंध्र प्रदेश और गोवा जैसे राज्य अपने यहां छोटे बच्चों के लिए स्मार्टफोन प्रतिबंध लागू करने के लिए आस्ट्रेलिया के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क का अध्ययन कर रहे हैं। नागेश्वरन ने इस बात पर खुशी जताई कि राज्य सरकारों में भी जागरूकता बढ़ रही है।

    प्रतिबंधों के बेअसर होने की भी चिंता

    कुछ एक्टिविस्ट और टेक विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि बच्चों के मामले में शायद उम्र आधारित प्रतिबंध काम न करें, क्योंकि नकली पहचान दस्तावेजों के जरिये सिस्टम को बाइपास करने का जोखिम रहेगा। ऐसे में बच्चों और माता-पिता को इंटरनेट मीडिया के स्वस्थ और सुरक्षित उपयोग को विकसित करने में मदद करने के लिए उपाय किए जाने चाहिए।

    मोटापे बड़ी परेशानी, खानपान सुधार की सख्त जरूरत

    आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि मोटापा खतरनाक दर से बढ़ रहा है और आज भारत में एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। सर्वेक्षण में इस बात पर जोर दिया गया है कि लोगों को अपने आहार में सही पोषण का सेवन करने पर ध्यान देना चाहिए और आहार संबंधी सुधारों को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में लेना चाहिए।

    रिपोर्ट के अनुसार, अस्वास्थ्यकर आहार, गतिहीन जीवनशैली, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता सेवन और पर्यावरणीय कारकों के चलते मोटापा सभी आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित कर रहा है और डायबिटीज, हृदय रोग और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों के जोखिम को बढ़ा रहा है।

    इससे शहरी और ग्रामीण, दोनों आबादी प्रभावित हो रही है। 2019-21 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि 24 प्रतिशत महिलाएं और 23 प्रतिशत पुरुषों का वजन मानक से ज्यादा है। 2020 में 3.3 करोड़ बच्चे मोटापे का शिकार थे, जो 2035 तक 8.3 करोड़ पहुंचने का अनुमान है। हेल्थ सप्लीमेंट्स के अंधाधुंध इस्तेमाल को लेकर भी जागरूकता बढ़ाने की जरूरत बताई गई है।

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