एक फिल्म और पुलिस महकमे में खलबली! 'सतलुज' रिलीज होते ही खालड़ा मर्डर केस के दोषी और पूर्व DSP को ढूंढने के आदेश जारी
फिल्म 'सतलुज' के बाद पंजाब पुलिस ने मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण और हत्या मामले में दोषी पूर्व डीएसपी जसपाल सिंह का पता लगाने की क ...और पढ़ें

दिलजीत दोसांझ ने निभाई जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका (फाइल)
HighLights
फिल्म 'सतलुज' के बाद पूर्व डीएसपी जसपाल सिंह की तलाश
खालड़ा अपहरण-हत्या मामले में दोषी, मई 2023 में मिली थी जमानत
नाभा जेल प्रशासन ने भी पुलिस से मांगी वर्तमान पते की जानकारी
जागरण संवाददाता, पटियाला। फिल्म सतलुज को लेकर शुरू हुई चर्चा के बाद पंजाब पुलिस ने मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण एवं हत्या मामले में उम्रकैद की सजा पाए पूर्व डीएसपी जसपाल सिंह का पता लगाने के लिए गोपनीय स्तर पर कार्रवाई शुरू कर दी है। पुलिस यह वेरिफाई करने में जुटी है कि फिलहाल वह कहां रह रहा है।
जानकारी के अनुसार, जसपाल सिंह को जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण और हत्या मामले में दोषी ठहराया गया था तथा उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। बाद में उसे मई 2023 में अंतरिम जमानत मिली थी। अब फिल्म सतलुज में इस मामले के एक किरदार को दिखाए जाने के बाद उसका मामला फिर चर्चा में आ गया है, जिसके चलते पुलिस ने उसका वर्तमान पता और स्थिति वेरिफाई करने की प्रक्रिया शुरू की है।
वेरिफेकेशन प्रक्रिया तेज
सूत्रों के अनुसार, नाभा ओपन जेल प्रशासन ने भी पूर्व डीएसपी के वर्तमान पते की वेरिफिकेशन के लिए पुलिस अधिकारियों से संपर्क किया है। जेल प्रशासन का कहना है कि हाल ही में कार्यभार संभालने के बाद नियमित वेरिफिकेशन प्रक्रिया के तहत यह कदम उठाया गया है। हालांकि अधिकारियों ने इसे सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बताया है और किसी विशेष कारण से जोड़ने से इनकार किया है।
उधर खालड़ा का केस लड़ने वाले पटियाला के सीनियर एडवोकेट बरजिंदर सिंह सोढ़ी ने कहा कि जसवंत सिंह खालड़ा के मामले में सभी आरोपित पटियाला के जेलों में बंद रह चुके हैं, जिन्हें बाद में अलग-अलग जिलों में शिफ्ट किया गया था। यदि इस मामले में दोषी अधिकारी जमानत के बाद से पुलिस की फाइल में ट्रेस नहीं हो रहा तो यह विभाग की बड़ी लापरवाही है।
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31 साल पुराना है मामला
उल्लेखनीय है कि मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा का 1995 में अपहरण कर उनकी हत्या कर दी गई थी। यह मामला पंजाब के चर्चित मानवाधिकार मामलों में शामिल है और फिल्म सतलुज के रिलीज होने के बाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।
80 के दशक में उग्रवाद के दौरान पंजाब पुलिस द्वारा हजारों अज्ञात लोगों को फर्जी मुठभेड़ों में मार गिराने और बिना पहचान के उनका अंतिम संस्कार करने का भंडाफोड़ करने के कारण उन्हें 1995 में मार दिया गया था।
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