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    बचपन की आंखों पर भारी पड़ रही स्क्रीन की लत, ओडिशा के सुंदरगढ़ में बीते साल 4376 तो इस साल 4706 बच्चों लगा चश्मा

    Updated: Fri, 17 Apr 2026 05:01 PM (IST)

    सुंदरगढ़ जिले में स्कूली बच्चों की आंखों पर स्क्रीन की लत भारी पड़ रही है। अत्यधिक मोबाइल और टीवी के उपयोग से दृष्टि दोष के मामले तेजी से बढ़े हैं। पि ...और पढ़ें

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    जागरण संवाददाता, राउरकेला। टीवी और मोबाइल फोन की आभासी दुनिया सुंदरगढ़ जिले के स्कूली बच्चों की आंखों की वास्तविक चमक छीन रही है। अत्यधिक स्क्रीन टाइम के कारण हालात इतने चिंताजनक हो गए हैं कि साल-दर-साल कम उम्र के बच्चों की आंखों पर चश्मा चढ़ने का ग्राफ और उसका प्रतिशत तेजी से ऊपर की ओर भाग रहा है।

    स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल जहां 4,376 बच्चों की आंखों में दृष्टि दोष पाया गया था, वहीं इस साल यह आंकड़ा बढ़कर 4,706 तक पहुंच गया है। घंटों स्क्रीन से चिपके रहने के कारण कक्षा में पढ़ाई के दौरान बच्चों के सिर में तेज दर्द होने, आंखों से पानी गिरने और यहां तक कि चक्कर खाकर गिर जाने जैसी शिकायतें अब आम हो गई हैं।

    विशेषकर पहली से आठवीं कक्षा (5 से 13 वर्ष) के मासूम इस डिजिटल लत का सबसे अधिक शिकार हो रहे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त रिपोर्ट से यह खौफनाक सच सामने आया है कि पिछले पांच वर्षों में हर साल औसतन 3,458 स्कूली बच्चों को मजबूरी में अपनी आंखों पर चश्मा चढ़ाना पड़ा है।

    जिले के टांगरपाली, सुंदरगढ़ नगरपालिका क्षेत्र, बालिशंकरा, बड़गांव, राजगांगपुर, नुआगांव, लाठीकटा, लहुणीपाड़ा, कुतरा, कुआरमुंडा, हेमगिरी, कोइड़ा, गुरूंडिया, लेफ्रीपाड़ा, बिसरा ब्लाक तथा राउरकेला महानगर क्षेत्र समेत विभिन्न ब्लॉकों और शहरी क्षेत्रों में पिछले पांच वर्षों (2021-22 से 2025-26) के दौरान कुल 8 लाख 32 हजार 589 स्कूली बच्चों की आंखों की सघन जांच की गई।

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    इस जांच के आंकड़े और उनका प्रतिशत साल-दर-साल बढ़ती इस गंभीर स्वास्थ्य समस्या की स्पष्ट गवाही देते हैं। वर्ष 2021-22 में जब 2,982 बच्चों की जांच की गई, तो उनमें से 1,374 यानी लगभग 46.07 प्रतिशत बच्चों को दृष्टि दोष के कारण चश्मा लगाना पड़ा। इसके बाद जांच का दायरा बढ़ा तो यह आंकड़ा भी रफ्तार पकड़ता गया। वर्ष 2022-23 में 3 लाख 78 हजार 431 बच्चों की जांच में 3,370 (0.89 प्रतिशत) बच्चों की दृष्टि कमजोर पाई गई।

    इसी तरह 2023-24 में 2 लाख 28 हजार 544 बच्चों की जांच हुई, जिनमें से 3,456 (1.51 प्रतिशत) बच्चों को चश्मा लगा। वहीं, 2024-25 में 2 लाख 38 हजार 822 बच्चों की जांच में यह संख्या 4,376 (1.83 प्रतिशत) थी और 2025-26 के नवीनतम आंकड़ों में 2 लाख 22 हजार 444 बच्चों की जांच में 4,706 (2.11 प्रतिशत) बच्चों की आंखों में खराबी पाई गई है।

    इन पांच सालों के भीतर कुल 17,282 स्कूली बच्चों की आंखों पर चश्मा चढ़ चुका है, जो जिले के स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग के लिए एक बड़ा अलर्ट है। स्कूलों में लगने वाले नेत्र जांच शिविरों में डॉक्टरों की टीम लगातार बच्चों और अभिभावकों को मोबाइल से दूर रहने की सख्त हिदायत दे रही है, लेकिन इसका जमीन पर कोई खास असर देखने को नहीं मिल रहा है।

    इस गंभीर होती स्थिति के लिए काफी हद तक अभिभावकों, विशेषकर माताओं की लापरवाही को जिम्मेदार मानते हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि अक्सर बच्चे को
    शांत रखने या खाना खिलाने के लिए उनके हाथों में मोबाइल थमा दिया जाता है। जब तक माताएं इस खतरे के प्रति पूरी तरह जागरूक नहीं होंगी, तब तक यह
    समस्या बनी रहेगी।

    कर्नाटक सरकार के उस फैसले की सराहना करते हुए उसका उदाहरण दिया, जिसमें 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए मोबाइल पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बच्चों के भविष्य और उनकी आंखों की रोशनी बचाने के लिए अब समय आ गया है कि अन्य
    राज्य भी इसी तरह के कड़े और निर्णायक कदम उठाएं।

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    इस गंभीर होती स्थिति के लिए काफी हद तक अभिभावकों, विशेषकर माताओं की लापरवाही को जिम्मेदार मानते हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि अक्सर बच्चे को शांत रखने या खाना खिलाने के लिए उनके हाथों में मोबाइल थमा दिया जाता है। जब तक माताएं इस खतरे के प्रति पूरी तरह जागरूक नहीं होंगी, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। कर्नाटक सरकार के उस फैसले की सराहना करते हुए उसका उदाहरण दिया, जिसमें 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए मोबाइल पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बच्चों के भविष्य और उनकी आंखों की रोशनी बचाने के लिए अब समय आ गया है कि अन्य राज्य भी इसी तरह के कड़े और निर्णायक कदम उठाएं।

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    डॉ. समीर पात्र , नेत्र विशेषज्ञ, आरजीएच।