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    अस्पताल के बेड से राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक तक, ऐसे पहुंचीं मुक्केबाज जैस्मीन लैंबोरिया

    Updated: Sat, 01 Aug 2026 08:17 PM (IST)

    राष्ट्रमंडल खेलों की शुरुआत से कुछ हफ्ते पहले 57 किलो वर्ग में मुक्केबाजी की विश्व चैंपियन जैस्मीन लैंबोरिया अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी थीं। ...और पढ़ें

    जैस्मीन लैंबोरिया

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    ग्लास्गो, पीटीआई। राष्ट्रमंडल खेलों की शुरुआत से कुछ हफ्ते पहले 57 किलो वर्ग में मुक्केबाजी की विश्व चैंपियन जैस्मीन लैंबोरिया अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी थीं। बीमारी से जूझ रहीं जैस्मीन राष्ट्रमंडल खेलों में खेलेंगी या नहीं, पक्का नहीं था लेकिन शनिवार को उन्होंने इतिहास रच दिया।

    भिवानी से आने वाली जैस्मीन ने राष्ट्रमंडल खेलों की मौजूदा स्वर्ण पदक धारक उत्तरी आयरलैंड की माइकेला वाल्श को हराकर ये पदक अपने नाम कर लिया। चार साल पहले जैस्मिन ने बर्मिंघम में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक जीता था।

    इस मैच को देखने वालों को पता है कि जैस्मीन यहां वाल्श पर पूरी तरह से हावी रहीं लेकिन इस मैच से पहले कई महीनों तक जैस्मीन के लिए खुद को संभालना मुश्किल हो रखा था। इसी साल मार्च में हुई एशियन चैंपियनशिप के बाद से वह लगातार बीमारियों से जूझ रही थीं।

     

     

    जैस्मीन ने भयंकर बुखार के बावजूद यहां फाइट की और तीन बाउट्स जूझते हुए फाइनल में पहुंचीं, हालांकि यहां उन्हें हार मिली लेकिन इस मैच के जरिए जैस्मीन ने राष्ट्रमंडल खेल 2026 में जगह बना ली। हालांकि, भारी बुखार में लड़ने का नुकसान हुआ और फाइनल के दौरान सिर में लगे मुक्के ने काम और बिगाड़ दिया।

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    कंकशन की पीड़ा से जैस्मीन उबरीं तो बीमारी लौट आई। उन्होंने इस बारे में बताया कि भारत लौटने के बाद मैंने लगभग 20 दिन ट्रेनिंग की और फिर बीमार पड़ गई। तेज बुखार जा ही नहीं रहा था, खूब सारी दवाइयां लेनी पड़ती, कुछ वक्त तो अस्पताल में भी बिताना पड़ा। पता ही नहीं कि बीमारी क्या थी, लेकिन इसके चलते वह जून में बाकी मुक्केबाजों के साथ अभ्यास के लिए चेक गणराज्य नहीं जा पाईं।

     

     

    जैस्मीन के वर्ग की मुक्केबाजी एशियाई खेलों में नहीं होगी, इसलिए उनके लिए राष्ट्रमंडल खेल ही साल का सबसे बड़ा आयोजन थे लेकिन हालात ऐसे कि लग ही नहीं रहा था कि वह इसमें खेल भी पाएंगी। बाद में उन्हें वापसी के दौरान मनोचिकित्सक की मदद भी लेनी पड़ी, धीरे-धीरे जैस्मिन का आत्मविश्वास लौटा और उन्होंने थोड़ा-बहुत अभ्यास शुरू किया।

    हालांकि जैस्मिन जब राष्ट्रमंडल खेलों के लिए ग्लास्गो आईं तो बाकी मुक्केबाजों की तुलना में उन्होंने सबसे कम अभ्यास किया था, लेकिन अंत में वह अपने पदक का रंग बदलने में कामयाब रहीं। जैस्मिन ने सोना जीतने के बाद कहा भी कि इन राष्ट्रमंडल खेलों में उनका लक्ष्य पदक का रंग बदलना ही था।

     

     

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