गठबंधन के लिए मायावती ने रखी शर्त, 2027 के चुनाव से पहले क्या फिर जिंदा होगा इंडी गठबंधन?
बसपा प्रमुख मायावती ने 2027 विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने की घोषणा की है, लेकिन भविष्य में गठबंधन के लिए एक शर्त रखी है। उन्होंने कहा कि यदि कोई दल बसपा ...और पढ़ें

सपा और कांग्रेस फिर से गठबंधन सहयोगी के रूप में भाजपा के सामने खड़े नजर आ रहे हैं

समय कम है?
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जितेंद्र शर्मा, नई दिल्ली। बसपा प्रमुख मायावती ने स्पष्ट शब्दों में भले ही कह दिया है कि वह 2027 का विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेंगी, लेकिन भविष्य में गठबंधन को लेकर जो शर्त साथ में जोड़ दी है, उसी की छांव में अब 2027 के लिए ही एकजुट विपक्ष की संभावनाएं सांसें लेती रहेंगी।
मायावती के बयान के इतर आईएनडीआईए में शामिल होने के लिए कांग्रेस का खुला न्योता और चिर प्रतिद्वंद्वी बसपा के तीखे प्रहार के बावजूद सपा मुखिया अखिलेश यादव का नरम रुख 'हाथी' के लिए रास्ता बनाने का अभी भी संकेत दे रहा है, ताकि भाजपा के विरुद्ध सामाजिक-जातीय गोलबंदी का रणनीतिक चौसर बिछाने का विकल्प उभरे।
संभावनाओं को कांग्रेस खेमे से हवा मिली
उत्तर प्रदेश में अभी तक के परिदृश्य में अगले विधानसभा चुनाव के लिए सपा और कांग्रेस फिर से गठबंधन सहयोगी के रूप में भाजपा के सामने खड़े नजर आ रहे हैं। लेकिन इस गठबंधन में बसपा को भी साथ लाए जाने की संभावनाओं को सबसे पहले कांग्रेस खेमे से ही हवा मिली। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तर प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडेय ने खुलकर कहा कि राजनीति में संभावनाएं बनी रहती हैं।

मायावती अकेले लड़ने की बात कह भले रही हों, लेकिन आईएनडीआईए में बसपा के लिए द्वार खुले हुए हैं। इस बीच पिछले दिनों अपने जन्मदिन के अवसर पर बसपा प्रमुख मायावती ने हल्के हाथ से ईवीएम और एसआईआर की चर्चा कर आईएनडीआईए यानी सपा और कांग्रेस के प्रमुख मुद्दों से सैद्धांतिक सहमति परोक्ष रूप से जता दी।
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बसपा का अकेले चुनाव लड़ना उचित
फिर कांग्रेस, सपा और भाजपा पर तमाम तरह के आरोपों के साथ कहा कि बसपा को गठबंधन का लाभ नहीं मिलता, इसलिए अकेले चुनाव लड़ना उचित है। लेकिन, साथ में जोड़ दिया कि यदि उन्हें भरोसा हो जाए कि कोई दल उच्च बिरादरी का वोट बसपा को ट्रांसफर करा सकता है तो वह भविष्य में उसके साथ गठबंधन कर सकती हैं।

इस संकेत को कांग्रेस से जोड़कर देखा जा रहा है, क्योंकि सपा के लिए सवर्ण वोट को साधना सहज नहीं है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता तर्क देते हैं कि भाजपा से नाराज सवर्ण वर्ग को कांग्रेस के साथ आने में दिक्कत नहीं। यहां मुस्लिम और दलित भी सहज हैं। कांग्रेस प्रयास कर सकती है कि मायावती को यह भरोसा दिलाया जाए। वहीं, सपा से मनमुटाव के प्रश्न पर कहा कि गेस्ट हाउस कांड को लेकर सपा-बसपा में राजनीतिक शत्रुता जैसी स्थिति रही लेकिन अपने-अपने अस्तित्व को बचाने के लिए 2019 में दोनों साथ आए।
गेस्ट हाउस कांड की याद दिलाकर मायावती एक ओर दलित वोटरों को जोड़े रखना चाहती हैं तो दूसरी तरफ सपा को दबाव में रखना चाहती हैं। दिलचस्प यह है कि बसपा प्रमुख के तीखे प्रहार के बावजूद अखिलेश ने जिस तरह मायावती की प्रेसवार्ता में शॉर्ट सर्किट चिंगारी को लेकर चिंता जताई, उससे समझ सकते हैं कि वह नरम रुख रखना चाहते हैं।