कनाडा में पंजाबी छात्रों का आवेदन खारिज होने पर बढ़ा संकट, सुखबीर बादल ने विदेश मंत्री से हस्तक्षेप की रखी मांग
अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर बादल ने कनाडा में भारतीय छात्रों के पीजीडब्ल्यूपी आवेदन खारिज होने पर केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की। उन्होंने विदेश मंत ...और पढ़ें

अकाली दल अध्यक् सुखबीर बादल।
रोहित कुमार, चंडीगढ़। शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने कनाडा में पोस्ट ग्रेजुएशन वर्क परमिट (पीजीडब्ल्यूपी) के आवेदनों के कथित तौर पर खारिज किए जाने के मुद्दे पर केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा कि इस फैसले से सबसे अधिक प्रभावित भारतीय छात्रों में बड़ी संख्या पंजाब के विद्यार्थियों की है, जिनके भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।
सुखबीर बादल ने इंटरनेट मीडिया मंच 'एक्स' पर लिखा कि कनाडा में पंजाब के छात्रों की संख्या सबसे अधिक है। इन विद्यार्थियों के पीछे ऐसे परिवार हैं जिन्होंने अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसर दिलाने के लिए अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी लगा दी। कई परिवारों ने आर्थिक कठिनाइयों का सामना करते हुए बड़े त्याग किए हैं, इसलिए बीच में नियम बदलने से छात्रों और उनके परिवारों में गहरी चिंता है।
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मानसिक परेशान हो रहे युवा
उन्होंने कहा कि पोस्ट ग्रेजुएशन वर्क परमिट से जुड़े नियमों में बीच सत्र में हुए बदलावों के कारण सैकड़ों भारतीय छात्रों, विशेषकर पंजाब के विद्यार्थियों, के आवेदन कथित तौर पर खारिज हो रहे हैं। इससे वे मानसिक तनाव, आर्थिक संकट और भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति में हैं। ऐसे में केंद्र सरकार को इस मामले को गंभीरता से उठाना चाहिए।
अकाली दल अध्यक्ष ने विदेश मंत्री डाॅ. एस जयशंकर से आग्रह किया कि वह कनाडा सरकार के समक्ष यह मुद्दा तत्काल उठाएं और प्रभावित छात्रों को राहत दिलाने के लिए कूटनीतिक स्तर पर प्रयास करें। उन्होंने कहा कि वह स्वयं भी कनाडा के सभी पंजाबी सांसदों से संपर्क कर इस विषय पर चर्चा करेंगे, ताकि छात्रों के हितों की रक्षा के लिए साझा प्रयास किए जा सकें।
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युवाओं का हो मार्गदर्शन
सुखबीर बादल ने बताया कि शिरोमणि अकाली दल की विदेशों में कार्यरत इकाइयों को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे प्रभावित छात्रों की हरसंभव सहायता करें और उन्हें आवश्यक मार्गदर्शन उपलब्ध कराएं।
उन्होंने कहा कि मेहनती और ईमानदार छात्रों का भविष्य बदलते राजनीतिक हालात या नीतिगत बदलावों की भेंट नहीं चढ़ना चाहिए। सभी पक्षों को मिलकर ऐसा समाधान निकालना चाहिए जिससे विद्यार्थियों के अधिकार सुरक्षित रहें और उनके भविष्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।