कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों के शोषण पर हाई कोर्ट सख्त, कहा- नाम बदलकर नौकरी से नहीं निकाल सकते संस्थान
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने शिक्षण संस्थानों को संविदा कर्मचारियों के साथ ‘यूज एंड थ्रो’ जैसा व्यवहार करने पर फटकार लगाई। कोर्ट ने गेस्ट फैकल्टी को ...और पढ़ें

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट।
HighLights
शिक्षण संस्थानों में 'यूज एंड थ्रो' नीति गलत: हाई कोर्ट।
पद का नाम बदलकर कर्मचारी हटाना अस्वीकार्य है।
याचिकाकर्ता गेस्ट फैकल्टी को तत्काल बहाल करने का आदेश।
दयानंद शर्मा, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने शिक्षण संस्थानों में कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के साथ हो रहे व्यवहार पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि सार्वजनिक संस्थान कर्मचारियों को “यूज एंड थ्रो” की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकते। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यदि किसी संस्थान में काम की आवश्यकता लगातार बनी हुई है तो केवल पद का नाम बदलकर एक संविदा कर्मचारी को हटाकर दूसरे को नियुक्त नहीं किया जा सकता।
जस्टिस संदीप मौदगिल ने यह महत्वपूर्ण फैसला रिम्पी नामक महिला याचिकाकर्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। याचिकाकर्ता वर्ष 2021 से केंद्रीय सरकार के तहत डेवलपमेंट स्टडीज विभाग में गेस्ट फैकल्टी के तौर पर कार्यरत थीं। उनका चयन बाकायदा चयन समिति के माध्यम से हुआ था। वह 4 दिसंबर 2021 से लगातार संस्थान में पढ़ा रही थीं, वह 48 प्रतिशत दिव्यांग श्रेणी से भी संबंधित हैं।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि संस्थान ने वर्ष 2023 में असिस्टेंट प्रोफेसर आन कान्ट्रैक्ट के पदों के लिए दोबारा विज्ञापन जारी किया था और उन्होंने उसमें भी आवेदन किया था। लेकिन चयन प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही संस्थान ने किसी अन्य संविदा कर्मचारी को नियुक्त कर दिया और 9 मार्च 2024 को उन्हें सेवा से मुक्त करने का आदेश जारी कर दिया।
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संविदा कर्मचारयों से लिया गया पूरा काम
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि उनसे नियमित शिक्षकों की तरह पूरा शैक्षणिक कार्य लिया जा रहा था, लेकिन उन्हें केवल 52 हजार रुपये प्रतिमाह फिक्स वेतन दिया जा रहा था। यह भी कहा गया कि संस्थान संविदा कर्मचारियों के साथ शोषण पूर्ण व्यवहार कर रहा है।
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वहीं, संस्थान की ओर से कोर्ट में कहा गया कि याचिकाकर्ता केवल 11 महीने के अनुबंध पर नियुक्त थीं और उन्हें नियमित नियुक्ति या सेवा जारी रखने का कोई अधिकार नहीं है। संस्थान ने यह भी दावा किया कि नई चयन प्रक्रिया में उनका चयन नहीं हुआ तथा नई नियुक्ति एक अलग पद असिस्टेंट प्रोफेसर आन कान्ट्रैक्ट पर की गई है।
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हाईकोर्ट ने संस्थान की दलीलों को किया खारिज
हाई कोर्ट ने संस्थान की इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि न्यायालय केवल पद के नाम को नहीं बल्कि कार्य की वास्तविक प्रकृति को देखता है। रिकार्ड से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता पहले भी वही शिक्षण कार्य कर रही थीं और बाद में नियुक्त व्यक्ति भी उसी शैक्षणिक आवश्यकता को पूरा करने के लिए लगाया गया।
ऐसे में यह साफ तौर पर एक संविदा कर्मचारी को हटाकर दूसरे संविदा कर्मचारी को नियुक्त करने का मामला है। कोर्ट ने यह भी कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में लगातार अल्पकालिक संविदा नियुक्ति न केवल कर्मचारियों के भविष्य को असुरक्षित बनाती हैं, बल्कि इससे शिक्षा का वातावरण भी प्रभावित होता है।
जब छात्रों को पढ़ाने का कार्य लगातार जारी है तो संस्थान शिक्षकों को अस्थिरता में नहीं रख सकता। अंत में हाई कोर्ट ने 9 मार्च 2024 का राहत आदेश रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को तत्काल बहाल करने, सेवा निरंतरता देने और सभी परिणामी लाभ जारी करने के आदेश दिए। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि बकाया वेतन चार सप्ताह के भीतर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अदा किया जाए।